10 साल नौकरी के बाद कंसलटेंसी शुरू की, जितना वेतन मिलता था उससे तीन गुना फायदा मिला

10 साल नौकरी के बाद कंसलटेंसी शुरू की, जितना वेतन मिलता था उससे तीन गुना फायदा मिला

भिवाड़ी. केशोराम शर्मा (केआर शर्मा) का जन्म 1954 में एलम मुजफ्फरनगर में हुआ। पिता सीताराम शर्मा सरकारी अस्पताल में वैद्य थे। 1982 में आईआईटी दिल्ली से केमिकल में एमटेक की। 1983 में रायबरेली में सल्फरिक एसिड और सुपर फास्फेट खाद बनाने की कंपनी में सुपरिंटेंडेंट के पद पर नियुक्ति हुई। चार हजार रूपये महीना वेतन मिला। 1985 में धारूहेड़ा स्थित मल्टीटेक इंटरनेशनल कंपनी में काम करना शुरू किया। 1988 में रेडिको खेतान रामपुर में सेवाएं शुरू की। 1990 में जूबिलेंट गजरौला में काम किया। चार फैक्ट्रियों में उच्च पदों पर काम करने के बाद मन में हमेशा यही रहता था कि अपना काम शुरू किया जाए। दिसंबर 1993 में इंजीनियरिंग कंसलटेंसी का काम गाजियाबाद से शुरू किया। करीब एक दर्जन फैक्ट्री लगवाई। जब नौकरी छोड़ी थी तब यूनिट हेड के पद पर था। कंसल्टेंसी का काम शुरू किया, नौकरी में जितना वेतन मिलता था उससे तीन गुना अधिक कमाया। सात साल तक कंसल्टेंसी का काम ही करता रहा। फिर कुछ साथी लोग मिले उन्होंने कहा की साझेदारी में अपनी फैक्ट्री लगा लेते हैं। 2001 में मेरठ में हमने प्लांट लगाया। प्लांट एवं मशीनरी निर्माण कर विदेश भेजने लगे। टर्नओवर करोड़ों में पहुंच गया। 2010 में साझेदारी टूट गई। इसके बाद मैं भिवाड़ी खुशखेड़ा आ गया और रीको से भूखंड आवंटित कराया। पुराना जमा हुआ काम था, शहर बदल गया था लेकिन ग्राहकों से अच्छे संबंध थे, फैक्ट्री निर्माण में जितना समय लगा, उसके बाद निर्माण शुरू होने के बाद अच्छे आर्डर मिलते गए। पहले साल में ही टर्न ओवर सात करोड रुपए पहुंच गया। बाद में रीको से बराबर में स्थित एक और भूखंड खरीद लिया और काम का विस्तार किया। अब मेरी फैक्ट्री में 50 लोग काम करते हैं और उन्हें महीने का 16 लाख वेतन दिया जाता है।

परेशानियां भी आई
नौकरी छोडऩे के बाद कंसल्टेंसी का काम शुरू किया, एक दर्जन फैक्ट्रियां लगवाई। काम नहीं होने पर यहां भी दिक्कतें आती थी। क्योंकि बड़े प्लांट रोज-रोज नहीं लगते, काम आने पर आप सालों के लिए व्यस्त हो जाते थे, नहीं आने पर महीनो खाली बैठे रहते थे। इसी तरह साझेदारी टूटने पर अचानक से अपना काम शुरू करना पड़ा। सारी जमा पूंजी एक साथ लग गई। केशोराम बताते हैं कि सफलता का श्रेय ईमानदारी और कठिन परिश्रम को जाता है। अब बेटा पार्थ शर्मा बीटेक करने के बाद फैक्ट्री को संभाल रहा है। वह प्रतिदिन कुछ घंटे के लिए ही फैक्ट्री में देखभाल और मार्गदर्शन के लिए जाते हैं।

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