NEET छात्रा हत्या-रेप मामले में CBI की टीम शनिवार को शंभू गर्ल्स हॉस्टल पहुंची। CBI के साथ SIT की टीम और केस की आईओ सचिवालय SDPO डॉक्टर अन्नू साथ हैं। टीम हॉस्टल के अंदर पहुंची और सबसे पहले उस कमरे में गई, जहां छात्रा रहती थी। कमरे की छानबीन की जा रही है। एक्जिट और एंट्रेंश गेट का भी निरीक्षण किया गया। CCTV फुटेज के आधार पर CBI की टीम को एघऊ ब्रीफ कर रही है। क्राइम सीन के हिसाब से सीबीआई लोकेशन देख रही कैसे छात्रा आई थी?, ऑटो से कहां उतरी थी?, हॉस्टल के अंदर कब गई थी?, फिर उसकी तबीयत कब बिगड़ी?, हॉस्टल से कब उसे बाहर निकाला गया और कहां सबसे पहले उसे ले जाया गया? इन सब पहलुओं की जानकारी सीबीआई को दी जा रही है। CBI की टीम लोकेशन को क्राइम सीन के लिहाज से देख रही है। लोकेशन के मुताबिक काफी भीड़-भाड़ वाले इलाके में ये हॉस्टल है। हॉस्टल से सटे पीछे घर है। सामने दुकानें हैं, फिर लिंक रोड है। आवाजाही भी काफी रहती है। 31 जनवरी को जांच CBI से कराने की अनुशंसा हुई थी बिहार सरकार ने 31 जनवरी को मामले की जांच CBI से कराने की अनुशंसा की थी। अनुशंसा के 12 दिन बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मंजूरी दी। इसके बाद 12 फरवरी को पटना में CBI ने केस दर्ज किया और जांच की जिम्मेदारी ASP पवन कुमार श्रीवास्तव को सौंपी गई। अब जानिए इस पूरे मामले में CBI के सामने क्या चुनौतियां होंगी 1. समय बीतने से साक्ष्य कमजोर होते जा रहे CBI को सबसे बड़ी चुनौती समय की देरी से मिलेगी। घटना को कई हफ्ते बीत चुके हैं। डिजिटल डेटा ओवरराइट हो सकता है, गवाहों के बयानों में अंतर आ सकता है, फिजिकल साक्ष्य की ताजगी कम हो चुकी है। CBI को अब रीकंस्ट्रक्शन के आधार पर केस बनाना होगा, जो हमेशा मुश्किल होता है। 2. एसआईटी की जांच की कमियों को दूर करना CBI को SIT की शुरुआती गलतियों के बावजूद केस को दोबारा खड़ा करना होगा। सीन ऑफ क्राइम, सैंपलिंग और टाइमलाइन की खामियों को बचाव पक्ष कोर्ट में हथियार बनाएगा। CBI को यह दिखाना होगा कि नई जांच कैसे निष्पक्ष और वैज्ञानिक है, ताकि पुरानी थ्योरी केस को न डुबो दें। 3. परिवार-गवाहों का भरोसा जीतना परिवार और कुछ गवाह पहले ही दबाव और डर की बात कह चुके हैं। CBI के लिए जरूरी होगा कि वह गवाहों की सुरक्षा और परिवार का विश्वास बहाल करे। बिना भरोसे के कोई भी गवाह खुलकर बयान नहीं देगा। यह सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौती है, सिर्फ कानूनी नहीं। 4. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और एम्स रिपोर्ट का कंपरीजन CBI को पोस्टमॉर्टम, FSL और एम्स ओपिनियन सबको साइंटिफिक तरीके से जोड़ना होगा। मेडिकल राय में जरा-सी गड़बड़ी बचाव पक्ष को संदेह का लाभ दे सकती है। यह सबसे तकनीकी और संवेदनशील चुनौती होगी। CCTV, कॉल डिटेल, टावर डंप और मोबाइल डेटा इन सबका टाइम-सिंक जरूरी है। अगर एक भी डेटा सेट मेल नहीं खाया, तो पूरी डिजिटल थ्योरी कमजोर पड़ जाएगी। अब जानिए SIT की सबसे कमजोर थ्योरी 1. आत्महत्या थ्योरी पर शुरु से ही लगी रही SIT की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि उसने शुरुआत से ही केस को आत्महत्या के फ्रेम में देखना शुरू कर दिया। जबकि अस्पताल के शुरुआती संकेत, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में दर्ज संघर्ष के निशान और बाद में FSL रिपोर्ट इस थ्योरी से मेल नहीं खाते थे। आत्महत्या मान लेने से जांच की दिशा सीमित हो गई और कई अहम साक्ष्य उसी नजरिए से इकट्ठा किए गए। कानून कहता है कि जब तक सभी संभावनाएं खारिज न हों, किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जाना चाहिए। यहां उल्टा होता दिखाई दिया। निष्कर्ष पहले, जांच बाद में होती रही। 2. DNA को ही निर्णायक मान लेना SIT ने DNA मिलान को लगभग “फाइनल टेस्ट” मान चल रही थी। 18 सैंपल फेल होने के बाद जांच ठहर सी गई। क्योंकि एसआईटी को लग रहा था कि DNA एक मजबूत साक्ष्य है, इसमें किसी न किसी का सैंपल मैच कर जाएगा और उसी पर मामला खोल दिया जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इससे यह भी पता चल रहा है कि एसआईटी सही संदिग्धों तक पहुंच ही नहीं हुई। 3. अस्पताल से मिले सबूतों को देर से जोड़ना इलाज के दौरान अस्पताल स्टाफ को यौन हिंसा के संकेत मिले थे। लेकिन SIT ने इन्हें शुरुआती थ्योरी का हिस्सा नहीं बनाया। मेडिकल इनपुट को जांच में देर से शामिल किया गया, जिससे साक्ष्य कमजोर होते गए। इसके बाद पुलिस ने आनन फानन में प्रेस कांफ्रेंस कर दी कि रेप हुआ ही नहीं। बाद में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने सारे मामले को उलट दिया। अगर अस्पताल से मिले संकेत से ही पुलिस एक्टिव होती तो केस की दिशा कुछ और ही होती। 4. हाॅस्टल के बजाए, परिवार पर लगातार शक परिवार का आरोप है कि SIT ने बाहरी संदिग्धों की बजाय परिवार और रिश्तेदारों पर ज्यादा फोकस किया। DNA, बार-बार पूछताछ और दबाव की शिकायतों ने जांच की दिशा पर सवाल उठाए। कानून के मुताबिक पीड़ित पक्ष को सहयोगी माना जाता है, न कि प्राथमिक संदिग्ध। इस असंतुलन ने SIT की थ्योरी को कमजोर हो गई। NEET छात्रा हत्या-रेप मामले में CBI की टीम शनिवार को शंभू गर्ल्स हॉस्टल पहुंची। CBI के साथ SIT की टीम और केस की आईओ सचिवालय SDPO डॉक्टर अन्नू साथ हैं। टीम हॉस्टल के अंदर पहुंची और सबसे पहले उस कमरे में गई, जहां छात्रा रहती थी। कमरे की छानबीन की जा रही है। एक्जिट और एंट्रेंश गेट का भी निरीक्षण किया गया। CCTV फुटेज के आधार पर CBI की टीम को एघऊ ब्रीफ कर रही है। क्राइम सीन के हिसाब से सीबीआई लोकेशन देख रही कैसे छात्रा आई थी?, ऑटो से कहां उतरी थी?, हॉस्टल के अंदर कब गई थी?, फिर उसकी तबीयत कब बिगड़ी?, हॉस्टल से कब उसे बाहर निकाला गया और कहां सबसे पहले उसे ले जाया गया? इन सब पहलुओं की जानकारी सीबीआई को दी जा रही है। CBI की टीम लोकेशन को क्राइम सीन के लिहाज से देख रही है। लोकेशन के मुताबिक काफी भीड़-भाड़ वाले इलाके में ये हॉस्टल है। हॉस्टल से सटे पीछे घर है। सामने दुकानें हैं, फिर लिंक रोड है। आवाजाही भी काफी रहती है। 31 जनवरी को जांच CBI से कराने की अनुशंसा हुई थी बिहार सरकार ने 31 जनवरी को मामले की जांच CBI से कराने की अनुशंसा की थी। अनुशंसा के 12 दिन बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मंजूरी दी। इसके बाद 12 फरवरी को पटना में CBI ने केस दर्ज किया और जांच की जिम्मेदारी ASP पवन कुमार श्रीवास्तव को सौंपी गई। अब जानिए इस पूरे मामले में CBI के सामने क्या चुनौतियां होंगी 1. समय बीतने से साक्ष्य कमजोर होते जा रहे CBI को सबसे बड़ी चुनौती समय की देरी से मिलेगी। घटना को कई हफ्ते बीत चुके हैं। डिजिटल डेटा ओवरराइट हो सकता है, गवाहों के बयानों में अंतर आ सकता है, फिजिकल साक्ष्य की ताजगी कम हो चुकी है। CBI को अब रीकंस्ट्रक्शन के आधार पर केस बनाना होगा, जो हमेशा मुश्किल होता है। 2. एसआईटी की जांच की कमियों को दूर करना CBI को SIT की शुरुआती गलतियों के बावजूद केस को दोबारा खड़ा करना होगा। सीन ऑफ क्राइम, सैंपलिंग और टाइमलाइन की खामियों को बचाव पक्ष कोर्ट में हथियार बनाएगा। CBI को यह दिखाना होगा कि नई जांच कैसे निष्पक्ष और वैज्ञानिक है, ताकि पुरानी थ्योरी केस को न डुबो दें। 3. परिवार-गवाहों का भरोसा जीतना परिवार और कुछ गवाह पहले ही दबाव और डर की बात कह चुके हैं। CBI के लिए जरूरी होगा कि वह गवाहों की सुरक्षा और परिवार का विश्वास बहाल करे। बिना भरोसे के कोई भी गवाह खुलकर बयान नहीं देगा। यह सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौती है, सिर्फ कानूनी नहीं। 4. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और एम्स रिपोर्ट का कंपरीजन CBI को पोस्टमॉर्टम, FSL और एम्स ओपिनियन सबको साइंटिफिक तरीके से जोड़ना होगा। मेडिकल राय में जरा-सी गड़बड़ी बचाव पक्ष को संदेह का लाभ दे सकती है। यह सबसे तकनीकी और संवेदनशील चुनौती होगी। CCTV, कॉल डिटेल, टावर डंप और मोबाइल डेटा इन सबका टाइम-सिंक जरूरी है। अगर एक भी डेटा सेट मेल नहीं खाया, तो पूरी डिजिटल थ्योरी कमजोर पड़ जाएगी। अब जानिए SIT की सबसे कमजोर थ्योरी 1. आत्महत्या थ्योरी पर शुरु से ही लगी रही SIT की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि उसने शुरुआत से ही केस को आत्महत्या के फ्रेम में देखना शुरू कर दिया। जबकि अस्पताल के शुरुआती संकेत, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में दर्ज संघर्ष के निशान और बाद में FSL रिपोर्ट इस थ्योरी से मेल नहीं खाते थे। आत्महत्या मान लेने से जांच की दिशा सीमित हो गई और कई अहम साक्ष्य उसी नजरिए से इकट्ठा किए गए। कानून कहता है कि जब तक सभी संभावनाएं खारिज न हों, किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जाना चाहिए। यहां उल्टा होता दिखाई दिया। निष्कर्ष पहले, जांच बाद में होती रही। 2. DNA को ही निर्णायक मान लेना SIT ने DNA मिलान को लगभग “फाइनल टेस्ट” मान चल रही थी। 18 सैंपल फेल होने के बाद जांच ठहर सी गई। क्योंकि एसआईटी को लग रहा था कि DNA एक मजबूत साक्ष्य है, इसमें किसी न किसी का सैंपल मैच कर जाएगा और उसी पर मामला खोल दिया जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इससे यह भी पता चल रहा है कि एसआईटी सही संदिग्धों तक पहुंच ही नहीं हुई। 3. अस्पताल से मिले सबूतों को देर से जोड़ना इलाज के दौरान अस्पताल स्टाफ को यौन हिंसा के संकेत मिले थे। लेकिन SIT ने इन्हें शुरुआती थ्योरी का हिस्सा नहीं बनाया। मेडिकल इनपुट को जांच में देर से शामिल किया गया, जिससे साक्ष्य कमजोर होते गए। इसके बाद पुलिस ने आनन फानन में प्रेस कांफ्रेंस कर दी कि रेप हुआ ही नहीं। बाद में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने सारे मामले को उलट दिया। अगर अस्पताल से मिले संकेत से ही पुलिस एक्टिव होती तो केस की दिशा कुछ और ही होती। 4. हाॅस्टल के बजाए, परिवार पर लगातार शक परिवार का आरोप है कि SIT ने बाहरी संदिग्धों की बजाय परिवार और रिश्तेदारों पर ज्यादा फोकस किया। DNA, बार-बार पूछताछ और दबाव की शिकायतों ने जांच की दिशा पर सवाल उठाए। कानून के मुताबिक पीड़ित पक्ष को सहयोगी माना जाता है, न कि प्राथमिक संदिग्ध। इस असंतुलन ने SIT की थ्योरी को कमजोर हो गई।


