होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने के बाद अब Bab-el-Mandeb पर ईरान की नजर! क्या दुनिया की सप्लाई चेन ठप होने वाली है?

होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने के बाद अब Bab-el-Mandeb पर ईरान की नजर! क्या दुनिया की सप्लाई चेन ठप होने वाली है?

Iran US Israel Conflict: इजरायल और अमेरिका द्वारा हमला करने के बाद ईरान ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को बंद कर दिया। इसके बाद दुनिया भर में ऊर्जा संकट आ गया। अब ईरान ने एक और अहम समुद्री रास्ता अल-मंडेब जलडमरूमध्य पर नजरें गड़ा दी हैं। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबफ ने इशारों-इशारों में यह संकेत दे दिया है। 

स्पीकर गालिबफ ने एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि ईरान अपनी समुद्री रणनीति का दायरा बढ़ाने पर विचर कर रहा है। उन्होंने पोस्ट में बाब-अल-मंडेब की वैश्विक अहमियत का भी जिक्र किया। 

एक्स पर पोस्ट करते हुए उन्होंने सवाल किया कि दुनिया का तेल, एलएनजी, गेहूं, चावल और खाद का कितना हिस्सा इस रास्ते से गुजरता है? इसके साथ ही, उन्होंने यह भी पूछा कि किन देशों और कंपनियों की इस मार्ग पर सबसे ज्यादा निर्भरता है। 

स्पीकर के इस ट्विट के बाद दुनियाभर में हलचल तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान इस तरह अपने आर्थिक दबाव के नए टारगेट पॉइंट तलाश रहा है।

क्यों अहम है बाब-अल-मंडेब?

दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में बाल-अल-मंडेब एक है। इस संकरे मार्ग से रोजाना करीब 88 लाख बैरल तेल का परिवहन होता है। इसके अलावा, वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग 10-12 प्रतिशत हिस्सा भी इसी मार्ग से होकर गुजरता है।

भौगोलिक रूप से यह जलडमरूमध्य यमन और जिबूती के बीच स्थित है और लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है। इसकी चौड़ाई महज 30 किलोमीटर की है। इस रास्ते से एशिया और यूरोप के बीच व्यापार होता है। 

इस रास्ते से सऊदी अरब का तेल भी पश्चिमी तट तक पहुंचता है, और यूरोप, उत्तरी अमेरिका को मध्य एशिया से तेल की सप्लाई भी बाब-अल-मंडेब से ही होती है। 

बढ़ सकता है वैश्विक संकट

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अगर होर्मुज जलडमरूमध्य के बाद बाब-अल-मंदेब में भी बाधा आती है, तो इसका सीधा असर तेल, एलएनजी गतिविधियां और वैश्विक व्यापार पर पड़ेगा। इससे वैश्विक में महंगाई और गतिविधियां चेन संकट और गहरा हो सकता है।

कुल मिलाकर, ईरान के ताजा रुझानों ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में समुद्री मार्गों पर भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ सकता है, जिसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है।

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