भारतीय जनता पार्टी में ‘अयोध्या’ के पेटेंट’ की लड़ाई के संकते मिलने लगे हैं। ‘अयोध्या’ ही भारतीय जनता पार्टी की हिंदुत्व की वह नर्सरी है जिसके सहारे केंद्र में सरकार बनाने में सफल हुई। पेटेंट का आशय उस कॉपीराइट से है जिस आधार पर भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व पूरे देश में राम मंदिर के नाम पर वोट मांगता है। वहीं राम मंदिर आंदोलन से जुड़े लोगों के योगदान पर भुलाकर उनको हाशिए पर पहुंचा दिया गया। भाजपा नेतृत्व की भी उनके प्रति दिलचस्प नहीं रही।
पूर्व राज्यसभा सदस्य विनय कटियार का श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को स्वयंभू बताकर गत माह बोला गया हमला एवं इसके बाद इसी माह अयोध्या लोकसभा और विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की बात कहीं उसी का हिस्सा तो नहीं है। यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि जिस तरह राम मंदिर आंदोलन के नायक एक-एक करके हाशिए पर देखे जा रहे हैं। बजरंगी नाम से पहचान रखने वाले विनय कटियार भी उसमें शामिल हैं।
2 रोज पहले भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व राज्यसभा सदस्य लक्ष्मीकांत बाजपेई की कटियार के आवास हिंदू धाम पर मुलाकात कराने के लिए पार्टी के जिला उपाध्यक्ष कृष्ण कुमार पांडेय खुन्नू व कमला शंकर पांडेय हनुमानगढ़ी से दर्शन के बाद ले गये थे। चर्चा है कि कटियार व बाजपेई की अंदर कमरे में मिले।यह मुलाकात लगभग 25 मिनट चली। इस दौरान खुन्नू पांडेय व कमलाशंकर बाहर के कमरे में थे।खुन्नू पांडेय ने इसे शिष्टाचार भेंट बताया है।वे कटियार के बेहद करीबी माने जाते हैं।
अब लौटते हैं राम मंदिर आंदोलन के योगदान पर।लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती जैसे ना जाने कितने अनगिनत नाम है जो राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे अब गुमनामी के अंधेरे में है।राम मंदिर के पड़ोसी जिले के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह का वायरल वीडियो भी इसी और इशारा करता है। वीडियो में कहते हैं कि राम मंदिर आंदोलन में शामिल होने के बाद भी निमंत्रण नहीं दिया गया। वह बाबरी ध्वंस में चार्जशीटेड रहे। आडवाणी की रथ यात्रा में भी शामिल रहे। कटियार हो या बृजभूषण शरण सिंह का गुबार फूटना पार्टी में कइयों को असहज करने वाला है। पार्टी के एक स्थानीय क्षत्रप कटियार के कद को कभी पचा नहीं पाये। आमंत्रण न दिए जाने को कैमरे पर सार्वजनिक किया जाने लगा है
वर्ष 2014 के 11 वर्ष बाद ऐसा पहला मौका आया है जब राम मंदिर के आंदोलन से जुड़ा होने के बावजूद उसके कार्यक्रमों में आमंत्रण न दिए जाने को कैमरे पर सार्वजनिक किया जाने लगा है। यही संकेत है जो लखनऊ दिल्ली के बीच अंदरूनी जंग की ओर इशारा करते हैं। सवाल है कि इसके लिए पर्दे के पीछे कुछ ना कुछ तो है जो अब सार्वजनिक होने लगा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे। अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल में वह हिंदुत्व के बड़े ब्रांड बनकर उभरे हैं जिसे दिल्ली को रास नहीं आने की खबरें सुर्खियां बनती रहीं।अयोध्या के विकास में दिल्ली से उनका कम योगदान भी नहीं माना जाता है।
2024 के लोकसभा चुनाव में उसे झटका जरूर लगा जब पार्टी प्रत्याशी लल्लू सिंह को सपा प्रत्याशी अवधेश प्रसाद के सामने हार हो गई।अब भाजपा आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में अयोध्या की हार से बचने के लिए मथन कर रही है।


