भारत और इजराइल के बीच राजनयिक संबंधों को अब एक नई शैक्षणिक मजबूती मिलने जा रही है। राजगीर स्थित प्रतिष्ठित नालंदा विश्वविद्यालय और इजराइल की हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ जेरूसलम के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए हैं। यह समझौता दोनों देशों के बीच ज्ञान, शोध और नवाचार के क्षेत्र में एक नया अध्याय शुरू करने वाला माना जा रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने कहा कि दोनों राष्ट्रों के बीच की गहरी साझेदारी अब शैक्षणिक क्षेत्र में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रही है। यह एमओयू दोनों संस्थानों के बीच पिछले कुछ समय से चल रहे सार्थक और निरंतर शैक्षणिक संवादों का सुखद परिणाम है। इसी कड़ी में, इस माह के प्रारंभ में हिब्रू विश्वविद्यालय के बौद्ध अध्ययन निदेशक प्रो. एवीअतार शुलमैन ने नालंदा विश्वविद्यालय में एक विशिष्ट व्याख्यान भी दिया था, जिसने इस साझेदारी की नींव को और अधिक मजबूती प्रदान की। इस एमओयू का मुख्य उद्देश्य संकाय (फैकल्टी) और छात्रों के बीच आदान-प्रदान के लिए एक महत्वपूर्ण प्रेरक के तौर पर काम करना है। इसके माध्यम से दोनों संस्थान संयुक्त शोध पहल, अकादमिक विनिमय और समेकित अध्यापन के क्षेत्र में मिलकर काम करेंगे। यह समझौता दोनों देशों के बीच गहन सभ्यतागत संवाद को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ विद्यार्थियों के शोध कौशल और नवाचार क्षमताओं को नई दिशा प्रदान करेगा। करियर की संभावनाओं का भी विस्तार नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने इस ऐतिहासिक पहल की सराहना करते हुए कहा कि हिब्रू विश्वविद्यालय के साथ यह समझौता दोनों देशों के प्राचीन संबंधों को और सुदृढ़ करेगा। इससे संकाय और विद्यार्थियों के लिए न केवल बेहतर शोध अवसर सृजित होंगे, बल्कि उनके करियर की संभावनाओं का भी विस्तार होगा। फिलहाल, नालंदा विश्वविद्यालय शोध उत्कृष्टता को आगे बढ़ाने और दोनों देशों के बीच एक स्थायी शैक्षणिक सेतु के निर्माण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध नजर आ रहा है। भारत और इजराइल के बीच राजनयिक संबंधों को अब एक नई शैक्षणिक मजबूती मिलने जा रही है। राजगीर स्थित प्रतिष्ठित नालंदा विश्वविद्यालय और इजराइल की हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ जेरूसलम के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए हैं। यह समझौता दोनों देशों के बीच ज्ञान, शोध और नवाचार के क्षेत्र में एक नया अध्याय शुरू करने वाला माना जा रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने कहा कि दोनों राष्ट्रों के बीच की गहरी साझेदारी अब शैक्षणिक क्षेत्र में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रही है। यह एमओयू दोनों संस्थानों के बीच पिछले कुछ समय से चल रहे सार्थक और निरंतर शैक्षणिक संवादों का सुखद परिणाम है। इसी कड़ी में, इस माह के प्रारंभ में हिब्रू विश्वविद्यालय के बौद्ध अध्ययन निदेशक प्रो. एवीअतार शुलमैन ने नालंदा विश्वविद्यालय में एक विशिष्ट व्याख्यान भी दिया था, जिसने इस साझेदारी की नींव को और अधिक मजबूती प्रदान की। इस एमओयू का मुख्य उद्देश्य संकाय (फैकल्टी) और छात्रों के बीच आदान-प्रदान के लिए एक महत्वपूर्ण प्रेरक के तौर पर काम करना है। इसके माध्यम से दोनों संस्थान संयुक्त शोध पहल, अकादमिक विनिमय और समेकित अध्यापन के क्षेत्र में मिलकर काम करेंगे। यह समझौता दोनों देशों के बीच गहन सभ्यतागत संवाद को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ विद्यार्थियों के शोध कौशल और नवाचार क्षमताओं को नई दिशा प्रदान करेगा। करियर की संभावनाओं का भी विस्तार नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने इस ऐतिहासिक पहल की सराहना करते हुए कहा कि हिब्रू विश्वविद्यालय के साथ यह समझौता दोनों देशों के प्राचीन संबंधों को और सुदृढ़ करेगा। इससे संकाय और विद्यार्थियों के लिए न केवल बेहतर शोध अवसर सृजित होंगे, बल्कि उनके करियर की संभावनाओं का भी विस्तार होगा। फिलहाल, नालंदा विश्वविद्यालय शोध उत्कृष्टता को आगे बढ़ाने और दोनों देशों के बीच एक स्थायी शैक्षणिक सेतु के निर्माण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध नजर आ रहा है।


