मिथिलांचल की पावन धरती पर कुंभ संक्रांति का विशेष महत्व है। 13 फरवरी को जब सूर्य देव मकर राशि से निकलकर कुंभ राशि में प्रवेश कर गए हैं, तो इसका साक्षी बनने के लिए बेगूसराय का प्रसिद्ध सिमरिया गंगा घाट श्रद्धा के रंग में सराबोर हो उठा है। पिछले चार दिनों से यहां मिथिलांचल के विभिन्न जिलों से आए हजारों श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ा है। मुंडन और ग्रुप में पूजा की अनोखी झलक सिमरिया घाट पर इस बार का नजारा बेहद खास है। अमूमन संक्रांति पर व्यक्तिगत स्नान होता है, लेकिन यहां सैकड़ों लोग टोलियों (ग्रुप) में पहुंच रहे हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इन समूहों के सभी पुरुषों ने अपना सिर मुंडवा रखा है। उमड़ने वाली भीड़ में महिलाओं की भी काफी संख्या है। महिलाएं भी सामूहिक रूप से पूजा कर रही है। पंडितों के अनुसार मिथिला की परंपरा में कुंभ संक्रांति के अवसर पर पितरों की शांति और किसी विशेष मन्नत की पूर्ति के लिए सामूहिक मुंडन कराकर गंगा पूजन करने का विधान है। घाट के किनारे कतारबद्ध होकर बैठे श्रद्धालु मंत्रोच्चार के बीच गंगा मैया की आराधना कर रहे हैं। चारों ओर हर-हर गंगे और जय गंगा मैया के जयघोष से वातावरण गूंज रहा है। मिथिला में कुंभ संक्रांति का महत्व मिथिला पंचांग के अनुसार कुंभ संक्रांति से ही ऋतु परिवर्तन की आहट तेज हो जाती है। इस दिन दान-पुण्य का फल अनंत गुना बढ़ जाता है। सूर्य के कुंभ राशि में प्रवेश काल के दौरान गंगा की धारा में खड़े होकर अर्घ्य देने से आरोग्य की प्राप्ति होती है। सिमरिया घाट को उत्तर वाहिनी गंगा होने के कारण मोक्षदायिनी माना जाता है। श्रद्धालु रामेश्वर झा का कहना है कि हम लोग मिथिला की सदियों पुरानी परंपरा को निभा रहे हैं। कुंभ संक्रांति के दौरान गंगा स्नान और मुंडन संस्कार का हमारे कुल में विशेष महत्व है। हम यहां सुख-शांति की कामना लेकर आए हैं। सिमरिया केवल एक घाट नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक राजधानी जैसा महसूस होता है। अर्धकुंभ के आयोजन के बाद से यहां की महत्ता और बढ़ गई है। अलर्ट मोड में प्रशासन भक्तों की भीड़ को देखते हुए प्रशासन अलर्ट मोड में हैं। घाट पर गोताखोरों की टीम भी मौजूद है। लोग चार दिनों से यहां जुटे हुए हैं, इसलिए घाट पर ही भजन-कीर्तन और रात्रि विश्राम की व्यवस्था देखी जा रही है। दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर और सहरसा से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या सबसे अधिक है। मिथिलांचल की पावन धरती पर कुंभ संक्रांति का विशेष महत्व है। 13 फरवरी को जब सूर्य देव मकर राशि से निकलकर कुंभ राशि में प्रवेश कर गए हैं, तो इसका साक्षी बनने के लिए बेगूसराय का प्रसिद्ध सिमरिया गंगा घाट श्रद्धा के रंग में सराबोर हो उठा है। पिछले चार दिनों से यहां मिथिलांचल के विभिन्न जिलों से आए हजारों श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ा है। मुंडन और ग्रुप में पूजा की अनोखी झलक सिमरिया घाट पर इस बार का नजारा बेहद खास है। अमूमन संक्रांति पर व्यक्तिगत स्नान होता है, लेकिन यहां सैकड़ों लोग टोलियों (ग्रुप) में पहुंच रहे हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इन समूहों के सभी पुरुषों ने अपना सिर मुंडवा रखा है। उमड़ने वाली भीड़ में महिलाओं की भी काफी संख्या है। महिलाएं भी सामूहिक रूप से पूजा कर रही है। पंडितों के अनुसार मिथिला की परंपरा में कुंभ संक्रांति के अवसर पर पितरों की शांति और किसी विशेष मन्नत की पूर्ति के लिए सामूहिक मुंडन कराकर गंगा पूजन करने का विधान है। घाट के किनारे कतारबद्ध होकर बैठे श्रद्धालु मंत्रोच्चार के बीच गंगा मैया की आराधना कर रहे हैं। चारों ओर हर-हर गंगे और जय गंगा मैया के जयघोष से वातावरण गूंज रहा है। मिथिला में कुंभ संक्रांति का महत्व मिथिला पंचांग के अनुसार कुंभ संक्रांति से ही ऋतु परिवर्तन की आहट तेज हो जाती है। इस दिन दान-पुण्य का फल अनंत गुना बढ़ जाता है। सूर्य के कुंभ राशि में प्रवेश काल के दौरान गंगा की धारा में खड़े होकर अर्घ्य देने से आरोग्य की प्राप्ति होती है। सिमरिया घाट को उत्तर वाहिनी गंगा होने के कारण मोक्षदायिनी माना जाता है। श्रद्धालु रामेश्वर झा का कहना है कि हम लोग मिथिला की सदियों पुरानी परंपरा को निभा रहे हैं। कुंभ संक्रांति के दौरान गंगा स्नान और मुंडन संस्कार का हमारे कुल में विशेष महत्व है। हम यहां सुख-शांति की कामना लेकर आए हैं। सिमरिया केवल एक घाट नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक राजधानी जैसा महसूस होता है। अर्धकुंभ के आयोजन के बाद से यहां की महत्ता और बढ़ गई है। अलर्ट मोड में प्रशासन भक्तों की भीड़ को देखते हुए प्रशासन अलर्ट मोड में हैं। घाट पर गोताखोरों की टीम भी मौजूद है। लोग चार दिनों से यहां जुटे हुए हैं, इसलिए घाट पर ही भजन-कीर्तन और रात्रि विश्राम की व्यवस्था देखी जा रही है। दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर और सहरसा से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या सबसे अधिक है।


