प्रयागराज में उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद की नकली वेबसाइट बनाकर छात्रों और अभिभावकों से ठगी करने वाले रैकेट के दो और सदस्य सोमवार को गिरफ्तार किए गए। इनमें से राशिद मुजफ्फरनगर और समीर बागपत का रहने वाला है। राशिद गिरोह के सरगना शशि प्रकार राय का गुर्गा है जो बाद में दिल्ली में रहकर फर्जी मार्कशीट, सटिफिकेट का रैकेट संचालित कर रहा था। क्या बरामद हुआ
इनके कब्जे से 190 फर्जी मार्कशीट, डिप्लोमा और माइग्रेशन सर्टिफिकेट, चार एंड्रॉयड मोबाइल फोन और सात सिम कार्ड, एक लैपटॉप और पेनड्राइव चार फर्जी मुहर और 98 होलोग्राम, बैंक पासबुक और दो चेकबुक शामिल हैं। इस गिरोह के पांच सदस्य पहले ही जेल भेजे जा चुके हैं जिनमें सरगना भी शामिल है। पश्चिम बंगाल में भी नेटवर्क
इस गिरोह का नेटवर्क न सिर्फ यूपी बल्कि पश्चिम बंगाल समेत अन्य राज्यों तक फैला था। यह खुलासा तब हुआ था जब इस रैकेट के पांचवें सदस्य मंगेश कुमार को गिरफ्तार किया गया था। यह आजमगढ़ का एक बीफार्मा कॉलेज संचालक है जिसके कब्जे से फर्जी मार्कशीट के लिफाफे मिले थे। इन लिफाफों को अलग-अलग जनपदों में भेजा जाना था और इनमें से एक पर पश्चिम बंगाल का एड्रेस था।
क्या बताया दोनों ने
उधर सोमवार को गिरफ्तार आरोपियों ने पूछताछ में बताया कि वह रैकेट के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर यूपी व अन्य प्रदेशों के भिन्न- 2 विश्वविद्यालय व तकनीकि शिक्षा बोर्ड की फेक मार्कशीट, डिग्री, डिप्लोमा व प्रमाणपत्र बनाकर छात्रों व अभिभावकों से ठगी की वारदात अंजाम देते हैं। मांग के अनुरूप फर्जी मार्कशीट बनाकर व कलर प्रिंटआउट निकालकर इस पर फर्जी मोहर लगाकर यह खेल किया जाता था।
नकली वेबसाइट कर ली थी तैयार
बता दें कि इस गिरोह ने असली वेबसाइट www.upmsp.edu.in की हूबहू नकल करते हुए www.upmsp-edu.in नाम से फर्जी वेबसाइट तैयार की। फिर इसके जरिए हजारों छात्रों और अभिभावकों से ठगी की। 12 सालों में करीब सात हजार फर्जी मार्कशीट बेच डाली।
ऐसे फंसाते थे जाल में
इससे पहले शशि प्रकाश राय उर्फ राजन शर्मा और मनीष कुमार राय समेत पांच आरोपी इस मामले में जेल भेजे जा चुके हैं। यह दोनों भी आजमगढ़ के रहने वाले हैं। गिरफ्तारी के बाद दोनों आरोपियों ने पूछताछ में पूरी मॉडस ऑपरेंडी बयां की। बताया था कि, हम 2014 से इस काम में लगे हुए हैं। हम पहले फेसबुक पर “मार्कशीट में नंबर बढ़वाएं” और “डिग्री-मार्कशीट बनवाएं” जैसे विज्ञापन डालते थे। इन विज्ञापनों में संपर्क के लिए मोबाइल नंबर भी देते थे जो फर्जी आईडी पर लिए गए होते हैं।
जैसे ही कोई संपर्क करता था तो उसे फर्जी वेबसाइट को दिखाकर उन्हें भरोसे में लेते थे। यह बताते थे कि हम बोर्ड के ही कर्मचारी हैं जो पैसे खर्च करने पर नंबर बढ़वा सकते हैं। इसके बाद डील तय करते थे। पहले 10-15 हजार रुपये मांगते थे और मोलभाव करते हुए चार से पांच हजार में डील फाइनल करते थे। फिर फर्जी मार्कशीट या डिग्री तैयार कर देते थे।
तैयार करते थे फर्जी मार्कशीट-डिग्री
गिरफ्तार किए गए शशि प्रकाश राय ने पूछताछ में बताया था, मैं और मेरा साथी पहले छात्र या अभिभावक से कॉलेज, परीक्षा वर्ष, जनपद समेत अन्य जानकारियां ले लेते थे। इसके बाद उससे कहते थे कि 10-15 दिन में उनका काम हो जाएगा। हमारे पास यूपी बोर्ड के साथ ही कई अन्य बोर्ड की मार्कशीट व सर्टिफिकेट, डिग्रियां डिजिटल फार्मैट में स्टोर रहती हैं। जैसे ही डील फाइनल होती है, हम आल इन वन एडिट सॉफ्टवेयर के जरिए नाम, पिता का नाम, रोल नंबर जैसी जानकारियों को एडिट करके फर्जी डॉक्युमेंट तैयार कर देते हैं। डॉक्युमेंट कोरियर से भेजते ताकि शक कम हो
डॉक्युमेंट तैयार होने के बाद इसकी डिलीवरी के लिए आरोपी कभी खुद नहीं जाते थे। वह क्लाइंट से उसका पता ले लेते थे और फिर इसे कोरियर कर देते थे।
पुलिस अफसरों का कहना है कि पूछताछ में सामने आया कि यह खेल कोई नया नहीं था। मुख्य आरोपी शशि प्रकाश राय उर्फ राजन शर्मा पिछले करीब 12 साल से इस धंधे में था। अब तक 7000 से ज्यादा फर्जी अंकपत्र और डिग्रियां बाजार में खपाई जा चुकी हैं। गिरोह ने अलग-अलग विश्वविद्यालयों की नकली मोहर, होलोग्राम और डिजाइन तैयार कर रखे थे।


