अविनाश बाकोलिया
जयपुर, एक नवंबर राजस्थान के जयपुर जिले में गाय के गोबर से तैयार 10 लाख पर्यावरण अनुकूल दीपकों से इस बार मॉरीशस में दिवाली मनाई जाएगी, जबकि करीब साढ़े छह लाख ऐसे दीये देश के 16 राज्यों में पहुंचाए गए हैं। इस पहल के जरिए भारतीय परंपरा और स्वदेशी उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने के साथ ही 70 से अधिक स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं और युवा स्वरोजगार से जुड़ रहे हैं। अखिल भारतीय गोशाला सहयोग परिषद के अंतरराष्ट्रीय संयोजक डॉ. अतुल गुप्ता ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘‘इस पहल में चैरिटेबल मिशन सोसाइटी, ऑर्गेनिक फार्मर प्रोड्यूसर एसोसिएशन ऑफ इंडिया और 70 से अधिक स्वयं सहायता समूह सहयोग कर रहे हैं।
टोंक, कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़, मालपुरा और निवाई सहित विभिन्न क्षेत्रों की महिलाएं और युवा इन दीपकों का निर्माण कर रहे हैं।’’
उन्होंने बताया कि अब तक करीब साढ़े सोलह लाख दीपकों का उत्पादन और विपणन किया जा चुका है तथा बढ़ती मांग को देखते हुए प्रतिदिन करीब 10 हजार दीपक तैयार किए जा रहे हैं। उनके अनुसार, निर्माण से लेकर पैकेजिंग तक की प्रक्रिया में महिलाओं की महत्वपूर्ण भागीदारी है। परिषद की अंतरराष्ट्रीय सह-संयोजक एवं हैनीमैन चैरिटेबल मिशन सोसाइटी की सचिव मोनिका गुप्ता ने बताया कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है।
मोनिका ने कहा कि गोबर आधारित कुटीर उद्योगों के माध्यम से महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए रोजगार के नए अवसर विकसित किए जा रहे हैं। इसी क्रम में टोंक, निवाई, बस्सी, मालपुरा, भरतपुर और जयपुर के 10 महिला स्वयं सहायता समूहों की 100 से अधिक महिलाओं ने पिछले करीब छह माह में साढ़े सोलह लाख दीपक और गोबर से बने अन्य उत्पाद तैयार किए हैं। उन्होंने कहा कि प्रयास महिलाओं को केवल कामगार बनाने का नहीं, बल्कि उन्हें सफल उद्यमी के रूप में विकसित करने का है।
मोनिका ने बताया, ‘‘इन दीपकों में अश्वगंधा, शतावरी, मोरिंगा और तुलसी जैसे औषधीय पौधों के बीज भी डाले गए हैं। दीपक के उपयोग के बाद उसे मिट्टी या गमले में लगाया जा सकता है, जहां अनुकूल परिस्थितियों में बीज अंकुरित होकर पौधे बन सकते हैं। इससे दीपावली के दौरान निकलने वाले कचरे को कम करने और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।’’
उन्होंने बताया, ‘‘विशेष निर्माण प्रक्रिया के कारण इन दीपकों से तेल का रिसाव नहीं होता और सामान्य उपयोग के दौरान इनका पात्र भी नहीं जलता।
गोबर से दीपकों के अलावा जैविक खाद, धूपबत्ती, गमले, गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां, गोमाता की प्रतिमाएं, आदियोगी, शुभ-लाभ, ओम, श्री, ब्रेसलेट और मालाएं सहित कई अन्य उत्पाद भी बनाए जा रहे हैं। इन उत्पादों के माध्यम से प्राकृतिक सामग्री के इस्तेमाल को बढ़ावा देने और प्लास्टिक आधारित सजावटी वस्तुओं पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया जा रहा है।’’
इससे पहले अतुल गुप्ता ने बताया कि राजस्थान में पाली, जोधपुर, सिरोही, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, टोंक, भरतपुर और अलवर सहित कई स्थानों पर गोशालाओं में गोबर के दीपकों के निर्माण और बिक्री की व्यवस्था की जा रही है। उन्होंने कहा कि इसके अलावा गुजरात, महाराष्ट्र और हरियाणा में भी ऐसे केंद्र संचालित हैं।
गुप्ता के मुताबिक इस पहल का उद्देश्य गोशालाओं को केवल गोवंश के आश्रय स्थल तक सीमित न रखकर ग्रामीण उद्योग, महिला रोजगार और कौशल विकास के केंद्र के रूप में विकसित करना है। गुप्ता ने कहा कि इससे महिलाओं को कम निवेश में स्वरोजगार के अवसर मिलेंगे और गोशालाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा मिलेगा।

