Yes Milord: अस्पतालों में महंगी दवाओं के जरिए डकैती सरकार कैसे होने दे रही है? SC की फटकार के बाद क्या इलाज सस्ता हो जाएगा?

Yes Milord: अस्पतालों में महंगी दवाओं के जरिए डकैती सरकार कैसे होने दे रही है? SC की फटकार के बाद क्या इलाज सस्ता हो जाएगा?

आईसीयू के बाहर की ठंडी फर्श पर बैठा एक बेबस पति अपनी कांपती उंगलियों से बिल का पर्चा थामे हुए था। कमरे के भीतर उसकी पत्नी जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी, और बाहर चल रहा था एक बेदर्द सौदा। जिस कीमोथेरेपी के एक इंजेक्शन को वह खुद बाहर से महज ₹11,000 में खरीदकर ला सकता था, वही इंजेक्शन लगाने के लिए उस नामी अस्पताल ने उसकी जेब से ₹1,30,000 ऐंठ लिए। उसने हाथ जोड़े, गिड़गिड़ाया, मिन्नतें कीं कि बाहर की वही दवा उसकी पत्नी को चढ़ा दी जाए। मगर संगमरमर की उन ऊंची दीवारों और मुनाफाखोर फार्मेसी के कानों तक उस लाचार पति की सिसकियां नहीं पहुंचीं। नियम का हवाला देकर उसे भीतर से ही तेरह गुना महंगी दवा खरीदने पर मजबूर कर दिया गया। यह सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि हर उस आम इंसान की खामोश चीख है जो अपनों की सांसें बचाने के लिए अपनी जिंदगी भर की जमा-पूंजी इन इलाज के बाजारों में लुटा देता है। जब यह दर्द देश की सबसे बड़ी अदालत के सामने पहुंचा, तो इंसाफ की चौखट भी कांप उठी। सुप्रीम कोर्ट का दिल इस बेबसी पर पसीज गया और उनका गुस्सा एक कठोर सवाल बनकर गूंजा-यह इलाज नहीं, सफेद कोट की आड़ में मरीजों के साथ खुलेआम डकैती है! अदालत ने तल्ख लहजे में पूछा कि आखिर एक बेबस इंसान की मजबूरी का फायदा उठाकर मुनाफाखोरी का यह खेल किसकी शह पर चल रहा है? जिस दवा की असल कीमत 11 हजार है, उसे 1.30 लाख में बेचकर एक मरते हुए इंसान की सांसों का सौदा करने की इजाजत किसने दी? अदालत के ये तीखे सवाल सिर्फ एक अस्पताल के लिए नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था और खामोश बैठी सरकार के लिए आईना हैं कि आखिर कब तक अपनों को बचाने की जंग लड़ते परिवारों को व्यवस्था के इस बेरहम चक्रव्यूह में यूं ही लुटने दिया जाएगा?

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15 रुपए के मेडिकल ट्यूब के 250 रुपए वसूल रहे

अदालत ने कहा कि जिस मेडिकल ट्यूब की कीमत खुदरा विक्रेता के लिए 15 रुपये है, उसके लिए मरीज से 250 रुपये तक वसूले जाते हैं। कोर्ट ने सवाल किया कि कीमतों में इतना बड़ा अंतर क्यों है? अदालत ने कहा कि कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30 प्रतिशत तक सीमित करने के केंद्र के हालिया फैसले के बावजूद बाजार में करीब 90 प्रतिशत दवाएं मूल्य नियंत्रण आदेश (DPCO) के दायरे से बाहर हैं। पीठ ने सवाल किया कि यदि कीमतों को नियंत्रित करने के लिए DPCO बनाया गया है, तो इतनी बड़ी संख्या में दवाओं को इसके दायरे से बाहर क्यों रखा गया है? पीठ ने कहा कि इस मुद्दे पर तीन संसदीय समितियां भी विचार कर चुकी हैं, लेकिन उनकी सिफारिशों के नतीजे उन लोगों के अनुकूल नहीं हैं जो व्यवस्था को प्रभावित करते हैं। कोर्ट ने कहा, पांच लाख रुपये तक के सरकारी हेल्थ कवरेज (आयुष्मान भारत योजना) के बाद भी आम परिवारों को भारी अस्पताल बिलों का बोझ उठाना पड़ता है। हम चाहते हैं कि हर दवा को जेनेरिक दवा माना जाए। कोर्ट ने गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण, जेनेरिक दवाएं लिखना अनिवार्य करने और मेडिकल उपकरणों के मुनाफे की वैधानिक सीमा तय करने की मांग वाली याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया।

निजी अस्पतालों की दलील भी नहीं मानी

निजी अस्पतालों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि सरकारी स्वास्थ्य ढांचे पर अत्यधिक दबाव है और निजी अस्पतालों को 24 घंटे चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध रखने के लिए भारी खर्च उठाना पड़ता है। दवाओं पर मुनाफा घटाने से अस्पतालों का संचालन प्रभावित हो सकता है। पीठ ने कहा, कि अस्पताल दूसरे तरीकों से भी खर्च चला सकते हैं। जब सवाल मरीज की जिंदगी का हो तो क्या कैसर दवाओं की कीमत को लेकर पूंजीवादी नजरिया अपनाना चाहिए? अंदर की बात शीर्ष अदालत का यह सवाल अहम है। वैसे, यह बात सही है कि डीलर और अस्पताल में कैंसर की एक ही दवा की कीमत में फर्क हो सकता है। लेकिन अस्पताल में दवा की ऊंची कीमत की वजह साफ-साफ बताई जानी चाहिए। असल में, दवा के दाम तय करने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की जरूरत है।

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इलाज पर खर्च की मार 

इलाज पर जो खर्च होता है उसकी स्थिति अगर आप देखेंगे कि उसका इंपैक्ट क्या पड़ता है। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट कहती है कि हर साल 6 करोड़ भारतीय गरीब बन रहे हैं। महंगे इलाज की वजह से हर साल यह वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट कह रही है। छह बड़े अस्पताल का प्रॉफिट 2वित्तीय वर्ष 2025 में 5100 करोड़ का था। 2026 में यह आंकड़ा बढ़कर 6100 करोड़ चला गया है। यानी सालाना 20% की बढ़ोतरी हो रही है प्रॉफिट में अस्पतालों की। एक आम आदमी जब बीमारी के जंजाल में फंसता है, कोई बीवी के गहने बेच रहा है, कोई जमीन बेचता है, कोई खेत बेचता है इलाज कराने के लिए। इसी महीने आई एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी शेयर बाजार के बड़े इन्वेस्टर भारतीय अस्पतालों में निवेश के मौके देखकर हजारों करोड़ के दांव लगा रहे हैं। अस्पतालों में बाजार के इस बढ़ते दखल से मिडिल क्लास को नुकसान हो रहा है। क्योंकि अस्पतालों के अंदर होने वाले खेल से मरीजों की जेब पर डाका डालने का आरोप लगता है। कंसलटेंसी फर्म ईवाई के आंकड़ों के मुताबिक बीते 5 सालों में ब्लैकस्टोन केकेआर, टीपीजी, टेस टेमसेक और जनरल अटलांटिक जैसे ग्लोबल प्राइवेट इन्वेस्टमेंट फंड्स ने भारतीय अस्पतालों में हिस्सेदारी खरीदने के लिए लगभग 10 अरब डॉलर यानी 95,000 करोड़ निवेश किए। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार इस विदेशी पूंजी ने देश में अत्याधुनिक चिकित्सा उपकरण, नए बेड और बड़े अस्पतालों को बढ़ावा तो दिया लेकिन इसने भारत के मिडिल क्लास के लिए इलाज को पहुंच से बाहर कर दिया है। उधर बीमा कंपनियों का आरोप है कि इन्वेस्टमेंट हासिल करने वाले यह अस्पताल अपने मुनाफे को चमकाने के लिए बिलों को बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रहे हैं। मरीजों पर गैर जरूरी इलाज, टेस्ट और महंगी रोबोटिक सर्जरी को थोप रहे हैं।
 

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