कांग्रेस और INDIA गठबंधन आज दिल्ली में एक अनोखी राजनीतिक कवायद कर रहे हैं। इस कवायद के तहत विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ‘पब्लिक इम्पीचमेंट’ यानी जन महाभियोग का आयोजन किया है। इस आयोजन में पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार अध्यक्षता करेंगी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे प्रस्ताव रखेंगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी समापन वक्तव्य देंगे। कार्यक्रम को संसदीय कार्यवाही की तर्ज पर आयोजित किया जा रहा है और इसे मॉक पार्लियामेंट का नाम दिया गया है।
लेकिन इस आयोजन ने कांग्रेस की राजनीति और संवैधानिक मूल्यों के प्रति उसकी सोच को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि क्या संसद की गरिमा और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के सिद्धांत राजनीतिक परिस्थितियों के हिसाब से बदल जाते हैं? जिस मॉक संसद को कांग्रेस ने कभी संसदीय परंपराओं के विरुद्ध बताया था, आज वही गतिविधि उसके राजनीतिक विरोध का नया हथियार क्यों बन रही है? साथ ही इस सवाल के केंद्र में हैं पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार। दिलचस्प बात यह है कि अगस्त 2010 में जब वह लोकसभा अध्यक्ष थीं, तब संसद परिसर में आयोजित मॉक पार्लियामेंट पर उन्होंने कड़ी नाराजगी जताई थी। यही नहीं, उस समय भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी अपनी पार्टी के सांसदों को इस गतिविधि में शामिल होने पर फटकार लगाई थी।
इसे भी पढ़ें: ब्रिक्स संसदीय मंच है शांति और न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था का संकल्प
2010 का वह घटनाक्रम, जब मीरा कुमार ने जताई थी नाराजगी
हम आपको याद दिला दें कि 20 अगस्त 2010 को सांसदों के वेतन-भत्ते बढ़ाने और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) विधेयक को बिना पर्याप्त चर्चा के पारित किए जाने को लेकर लोकसभा में भारी हंगामा हुआ था। सांसदों के वेतन को 80,001 रुपये करने की मांग भी उठ रही थी, जबकि सरकार ने 50 हजार रुपये का प्रस्ताव रखा था। सदन स्थगित होने के बाद करीब 70 सांसदों ने सदन के वेल में ही अपनी अलग मॉक पार्लियामेंट शुरू कर दी थी। इसमें लालू प्रसाद यादव प्रधानमंत्री बन गए थे, मुलायम सिंह यादव को सदन की कार्यवाही सुचारु रखने की जिम्मेदारी मिली और भाजपा के तत्कालीन उपनेता गोपीनाथ मुंडे स्पीकर बन गए थे। कीर्ति आजाद को नेता प्रतिपक्ष की भूमिका दी गई थी। इस नकली सदन में विधेयकों पर बहस तक हुई थी।
इस घटनाक्रम से मीरा कुमार बेहद नाराज हुई थीं। उन्होंने संसद को लोकतंत्र का मंदिर बताते हुए उसकी गरिमा और मर्यादा बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया था। उनका स्पष्ट संदेश था कि संसद के साथ इस तरह का व्यवहार स्वीकार्य नहीं है।
आडवाणी ने अपनी पार्टी के सांसद को भी नहीं बख्शा
इस प्रकरण का एक और महत्वपूर्ण पहलू भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का रवैया था। उन्होंने अपनी ही पार्टी के सांसद गोपीनाथ मुंडे के मॉक पार्लियामेंट में शामिल होने पर नाराजगी जताते हुए उन्हें फटकार लगाई थी। भाजपा नेतृत्व ने भी इस गतिविधि को उचित नहीं माना था। इसके बाद 25 अगस्त 2010 को मीरा कुमार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। इसमें सोनिया गांधी, लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज और अन्य दलों के नेताओं ने भाग लिया था। बैठक में सांसदों ने मॉक पार्लियामेंट की घटना पर खेद भी व्यक्त किया था। यानी उस समय राजनीतिक मतभेदों के बावजूद संसद की गरिमा को लेकर दलों के शीर्ष नेतृत्व ने एक साझा चिंता दिखाई थी।
आज मीरा कुमार की भूमिका पर सवाल क्यों?
अब सबसे बड़ा सवाल मीरा कुमार से ही है। 2010 में जब वह लोकसभा अध्यक्ष थीं, तब संसद की मर्यादा के नाम पर मॉक पार्लियामेंट का विरोध कर रही थीं। आज जब वह संवैधानिक पद पर नहीं हैं और उनकी पार्टी लगातार चुनावी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब वह खुद एक ऐसे आयोजन की अध्यक्षता कर रही हैं, जिसकी शुरुआती परिकल्पना मॉक पार्लियामेंट के रूप में की गई थी। सवाल उठता है कि क्या संसद की गरिमा का सिद्धांत पद के साथ बदल जाता है? अगर 2010 में मॉक पार्लियामेंट लोकतंत्र के मंदिर की मर्यादा के विरुद्ध थी तो आज उसके समानांतर राजनीतिक कार्यवाही आयोजित करने का औचित्य क्या है?
संसद में हंगामा और बाहर संसद का मंचन, आखिर यह कैसी राजनीति?
साथ ही विपक्ष की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास संसद के कामकाज को लेकर दिखाई देता है। संसद में विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने का अधिकार है। उसे नीतियों का विरोध करना चाहिए, विधेयकों पर बहस करनी चाहिए और सरकार को जवाबदेह बनाना चाहिए। लेकिन इसके लिए संसद को बार-बार ठप कर देना कहां तक उचित है? हम आपको याद दिला दें कि हाल के वर्षों से संसद की कार्यवाही में लगातार विपक्ष की ओर से व्यवधान पैदा किया जाता रहा है। इसलिए सवाल उठता है कि जो विपक्ष सदन के भीतर अपनी बात रखने, विधेयकों पर बहस करने और सरकार को घेरने के लिए उपलब्ध संसदीय मंच का प्रभावी इस्तेमाल नहीं कर पाता, वह बाहर उसी संसद की प्रतिकृति तैयार करके क्या हासिल करना चाहता है?
अगर चुनाव आयोग के कामकाज पर आपत्ति है तो संसद में चर्चा करिए। अगर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ आरोप हैं तो संविधान में उपलब्ध प्रक्रिया अपनाइए। अगर चुनाव सुधार की जरूरत है तो प्रस्ताव लाइए। लेकिन किसी राजनीतिक आयोजन में प्रस्ताव पारित करके किसी संवैधानिक पदाधिकारी के खिलाफ राजनीतिक फैसला सुना देना संवैधानिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता।
संविधान सिर्फ राजनीतिक नारा नहीं, आचरण की कसौटी है
साथ ही कांग्रेस और उसके सहयोगी दल लगातार संविधान बचाने की बात करते हैं। राहुल गांधी से लेकर मल्लिकार्जुन खरगे तक लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं की रक्षा को अपनी राजनीति का प्रमुख मुद्दा बताते रहे हैं। लेकिन संविधान की रक्षा केवल भाषणों, रैलियों और राजनीतिक प्रदर्शनों से नहीं होती। उसके लिए संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा, स्थापित प्रक्रियाओं और लोकतांत्रिक परंपराओं का सम्मान भी जरूरी है। लालकृष्ण आडवाणी का 2010 का उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण है कि उन्होंने अपनी पार्टी के सांसद को भी संसदीय मर्यादा के विरुद्ध जाने पर नहीं बख्शा था। मीरा कुमार ने भी तब अध्यक्ष के रूप में स्पष्ट संदेश दिया था कि संसद कोई राजनीतिक मनोरंजन का मंच नहीं है। इसलिए आज कांग्रेस के सामने सवाल है कि क्या वह अपने पुराने सिद्धांतों पर कायम है या राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार लोकतांत्रिक मर्यादाओं की नई परिभाषा गढ़ रही है?
लगातार चुनावी पराजयों के बाद विपक्ष की राजनीतिक बेचैनी समझी जा सकती है। सरकार को घेरना भी विपक्ष का लोकतांत्रिक दायित्व है। लेकिन सत्ता से बाहर होने का अर्थ यह नहीं हो सकता कि संवैधानिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं के समानांतर राजनीतिक मंच खड़े किए जाएं। देखा जाये तो लोकतंत्र में विपक्ष की ताकत उसके हंगामे से नहीं, उसके तर्कों से मापी जाती है। संविधान की रक्षा का दावा करने वालों को सबसे पहले अपने आचरण में संवैधानिक मर्यादा दिखानी होगी। वरना जनता पूछेगी कि संविधान आपके लिए सिद्धांत है या सिर्फ सत्ता से बाहर रहने के बाद इस्तेमाल किया जाने वाला राजनीतिक हथियार?
सवाल यह भी है कि किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ राजनीतिक दलों की बैठक में प्रतीकात्मक महाभियोग चलाने से क्या संवैधानिक प्रक्रिया पूरी हो जाती है? सवाल यह भी है कि क्या किसी राजनीतिक गठबंधन को यह अधिकार है कि वह अपनी बैठक में किसी संवैधानिक पदाधिकारी को दोषी ठहराकर उसके खिलाफ जनादेश घोषित कर दे? लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन विरोध और संवैधानिक संस्थाओं के समानांतर अपनी राजनीतिक अदालत खड़ी करने के बीच एक स्पष्ट अंतर है।
बहरहाल, आज महाभियोग के नाम पर राजनीतिक आयोजन कर रहे विपक्ष को अगर वास्तव में लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं की चिंता है तो उसे ऐसे राजनीतिक प्रदर्शनों के बजाय जनता का विश्वास जीतने और जनादेश हासिल करने पर ध्यान देना चाहिए। लोकतंत्र में सत्ता का रास्ता जनता की अदालत से होकर गुजरता है, किसी प्रतीकात्मक महाभियोग या मॉक पार्लियामेंट के मंच से नहीं। ऐसे राजनीतिक आयोजनों से भले ही कुछ देर के लिए सुर्खियां मिल जाएं, सोशल मीडिया पर व्यूज और लाइक्स की संख्या बढ़ जाए, लेकिन इससे न तो जनसमर्थन हासिल होता है और न ही संवैधानिक व्यवस्था में कोई बदलाव आता है। चिंता की बात यह है कि अगर राजनीतिक विरोध के नाम पर मॉक पार्लियामेंट को ही समानांतर संसदीय व्यवस्था की तरह प्रस्तुत करने का चलन बढ़ा, तो कल को क्या विपक्ष इसी मंच से देश का बजट पारित करने और कानून बनाने का दावा भी करेगा? आखिर संसद की अपनी संवैधानिक गरिमा और अधिकार हैं, जिनका कोई राजनीतिक विकल्प नहीं हो सकता। अब फैसला जनता को करना है कि वह लोकतंत्र की वास्तविक संसदीय व्यवस्था की गरिमा बनाए रखने के पक्ष में खड़ी होती है या राजनीतिक मंचन को संसद की कार्यवाही का विकल्प बनाने की कोशिशों को स्वीकार करती है।

