बक्सर के कुकुढ़ा गांव में दशहरे के पांच दिन बाद रावण वध किया गया। देशभर से अलग यहां करीब ढाई सौ साल से यह परंपरा चली आ रही है। सोमवार, 26 अक्टूबर को असकामनी मैदान में रामलीला के अंतिम दिन राम और रावण के बीच युद्ध हुआ। अंत में भगवान राम ने रावण का वध किया और पुतले का दहन किया। इस आयोजन को देखने के लिए हजारों लोग पहुंचे। 15 दिन तक अलग-अलग जगहों पर होती है रामलीला कुकुढ़ा की रामलीला किसी स्थायी मंच पर नहीं, बल्कि खुले मैदान और गांव के अलग-अलग स्थानों पर होती है। करीब 15 दिनों तक चलने वाली इस रामलीला में गांव की अलग-अलग जगहों को अयोध्या, चित्रकूट, पंपापुरी और लंका के रूप में दिखाया जाता है। अंतिम दिन असकामनी मैदान में राम-रावण युद्ध और रावण वध का आयोजन होता है। इस दौरान मैदान में हजारों लोगों की भीड़ जुटी। मेले में कई दुकानें भी सजी थीं। कब शुरू हुई, इसकी पक्की जानकारी नहीं रामलीला से जुड़े भरत बारी के अनुसार, इस आयोजन की शुरुआत कब हुई, इसकी निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालांकि, गांव की कई पीढ़ियां इसे होते देखती आई हैं। इसी आधार पर इस परंपरा को करीब ढाई सौ साल पुराना माना जाता है। ग्रामीण आज भी पुराने तरीके से रामलीला का आयोजन कर इसे जीवित रखे हुए हैं। हिंदू-मुस्लिम मिलकर निभाते रहे हैं किरदार कुकुढ़ा की रामलीला सामाजिक सद्भाव की मिसाल भी रही है। यहां हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर आयोजन में भाग लेते रहे हैं। अतीत में सुलेमान मियां ने करीब 20 वर्षों तक रावण की भूमिका निभाई थी, जबकि हाफिज साईं भरत के किरदार के लिए जाने जाते थे। कलाकारों की कमी बनी चुनौती वर्तमान समय में कलाकारों की कमी और युवाओं की घटती रुचि इस परंपरा के सामने चुनौती बन रही है। इसके बावजूद ग्रामीण रामलीला की ऐतिहासिक परंपरा को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। सोमवार को हजारों लोगों की मौजूदगी ने दिखाया कि कुकुढ़ा की रामलीला आज भी गांव की सांस्कृतिक पहचान और आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बक्सर के कुकुढ़ा गांव में दशहरे के पांच दिन बाद रावण वध किया गया। देशभर से अलग यहां करीब ढाई सौ साल से यह परंपरा चली आ रही है। सोमवार, 26 अक्टूबर को असकामनी मैदान में रामलीला के अंतिम दिन राम और रावण के बीच युद्ध हुआ। अंत में भगवान राम ने रावण का वध किया और पुतले का दहन किया। इस आयोजन को देखने के लिए हजारों लोग पहुंचे। 15 दिन तक अलग-अलग जगहों पर होती है रामलीला कुकुढ़ा की रामलीला किसी स्थायी मंच पर नहीं, बल्कि खुले मैदान और गांव के अलग-अलग स्थानों पर होती है। करीब 15 दिनों तक चलने वाली इस रामलीला में गांव की अलग-अलग जगहों को अयोध्या, चित्रकूट, पंपापुरी और लंका के रूप में दिखाया जाता है। अंतिम दिन असकामनी मैदान में राम-रावण युद्ध और रावण वध का आयोजन होता है। इस दौरान मैदान में हजारों लोगों की भीड़ जुटी। मेले में कई दुकानें भी सजी थीं। कब शुरू हुई, इसकी पक्की जानकारी नहीं रामलीला से जुड़े भरत बारी के अनुसार, इस आयोजन की शुरुआत कब हुई, इसकी निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालांकि, गांव की कई पीढ़ियां इसे होते देखती आई हैं। इसी आधार पर इस परंपरा को करीब ढाई सौ साल पुराना माना जाता है। ग्रामीण आज भी पुराने तरीके से रामलीला का आयोजन कर इसे जीवित रखे हुए हैं। हिंदू-मुस्लिम मिलकर निभाते रहे हैं किरदार कुकुढ़ा की रामलीला सामाजिक सद्भाव की मिसाल भी रही है। यहां हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर आयोजन में भाग लेते रहे हैं। अतीत में सुलेमान मियां ने करीब 20 वर्षों तक रावण की भूमिका निभाई थी, जबकि हाफिज साईं भरत के किरदार के लिए जाने जाते थे। कलाकारों की कमी बनी चुनौती वर्तमान समय में कलाकारों की कमी और युवाओं की घटती रुचि इस परंपरा के सामने चुनौती बन रही है। इसके बावजूद ग्रामीण रामलीला की ऐतिहासिक परंपरा को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। सोमवार को हजारों लोगों की मौजूदगी ने दिखाया कि कुकुढ़ा की रामलीला आज भी गांव की सांस्कृतिक पहचान और आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

