पेरेंटिंग- हम दोनों जॉब करते हैं, बच्चे को कौन देखे:3 साल के बेटे को डे-केयर में भेजना चाहते हैं, क्या ये सही फैसला होगा?

पेरेंटिंग- हम दोनों जॉब करते हैं, बच्चे को कौन देखे:3 साल के बेटे को डे-केयर में भेजना चाहते हैं, क्या ये सही फैसला होगा?

सवाल- मैं 32 साल की हूं। मैं और मेरे पति जॉब करते हैं। मेरा 3 साल का बेटा है और ऑफिस जाने के बाद उसकी देखभाल के लिए हमारे पास परिवार का कोई सदस्य नहीं है। इसलिए हम उसे डे-केयर में भेजने के बारे में सोच रहे हैं। लेकिन मन में डर है कि इतने छोटे बच्चे को पूरे दिन घर से बाहर रखने से उस पर कोई बुरा असर तो नहीं पड़ेगा। पति मानते हैं कि अच्छी सुविधा वाला डे-केयर बच्चे के लिए ठीक है। लेकिन मैं थोड़ा चिंतित रहती हूं। कृपया बताएं कि छोटे बच्चे को डे-केयर में छोड़ने का फैसला लेते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? एक्सपर्ट- रिद्धि दोषी पटेल, चाइल्ड एंड पेरेंटिंग साइकोलॉजिस्ट, मुंबई सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। डे-केयर में छोटे बच्चे की देखभाल को लेकर पेरेंट्स का चिंतित होना स्वाभाविक है। ऐसे में पेरेंट्स के मन में सवाल आ सकते हैं कि बच्चा वहां ठीक से खाएगा या नहीं, रोने पर कोई उसे चुप कराएगा या नहीं और उसे पेरेंट्स की कमी तो नहीं महसूस होगी। बच्चे की चिंता या अपराधबोध? आपको अपने इमोशंस को समझने की भी जरूरत है। आपको सिर्फ बच्चे की फिक्र है या गिल्ट भी है। यहां यह समझना जरूरी है कि डे-केयर चुनने की चिंता और बच्चे से दूर रहने का अपराधबोध दो अलग बातें हैं। ध्यान रखें- काम करना और बच्चे की अच्छी परवरिश करना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। इसलिए खुद को दोष देने की बजाय यह देखें कि बच्चे की जरूरतों और परिवार की परिस्थितियों के बीच संतुलन कैसे बनाया जा सकता है। डे-केयर के फायदे-नुकसान दो साल की उम्र में बच्चे अपने आसपास की दुनिया को समझने लगते हैं। वे- इस दौरान उन्हें प्यार, स्थिरता, नियमित दिनचर्या और भरोसेमंद देखभाल की जरूरत होती है। ऐसे में अच्छी क्वालिटी वाला डे-केयर बच्चों को खेलने, नई चीजें सीखने और दूसरे बच्चों के साथ घुलने-मिलने के अवसर दे सकता है। लेकिन डे-केयर चुनते समय केवल उसके फायदे देखना काफी नहीं है। यह भी समझना जरूरी है कि- डे-केयर में शुरुआत के दिनों में बच्चा रो सकता है, माता-पिता से दूर रहने पर परेशान हो सकता है या नई दिनचर्या अपनाने में समय ले सकता है। लेकिन धीरे–धीरे बच्चा माहौल में ढल भी जाता है, लेकिन इसके लिए बहुत जरूरी है कि– इसलिए बच्चे को डे-केयर भेजने का फैसला लेने से पहले उसके संभावित फायदे और नुकसान, डे-केयर की क्वालिटी और बच्चे की जरूरतों का आकलन करना जरूरी है। बच्चे के लिए डे-केयर का चुनाव कैसे करें? साथ ही इन जरूरी बातों का ध्यान रखें- बच्चे को डे-केयर की आदत कैसे डालें? तीन साल की उम्र में माता-पिता से दूर होने पर बच्चे का रोना या बेचैन होना सामान्य है। इसे ‘सेपरेशन एंग्जाइटी’ कहते हैं। इस उम्र में बच्चा माता-पिता से अलग होने पर असुरक्षित महसूस कर सकता है। इसलिए- साथ ही कुछ बातों का ध्यान रखें- डे-केयर का बच्चे पर प्रभाव ‘अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स’ के अनुसार, डे-केयर का बच्चे पर असर वहां मिलने वाली केयर और घर पर माता-पिता के साथ उसके रिश्ते जैसे कई पहलुओं पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए– ऐसी स्थिति में डे-केयर जाना अपने आप में बच्चे के लिए नुकसानदायक नहीं है। वहीं, उपेक्षा, कठोर व्यवहार या असुरक्षित माहौल बच्चे के भावनात्मक विकास पर नकारात्मक असर डाल सकता है। इन संकेतों को न करें इग्नोर शुरुआत में बच्चे का रोना या दिनचर्या में बदलाव दिखना संभव है। लेकिन बदलाव लगातार दिखे, बच्चा असामान्य रूप से डरा हुआ लगे या किसी खास व्यक्ति से मिलने पर घबराए तो सतर्क हो जाएं। बच्चे के व्यवहार पर नजर रखें और जरूरत होने पर चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट से सलाह लें। नौकरी और बच्चे के बीच संतुलन कैसे बनाएं? वर्किंग पेरेंट्स के मन में अक्सर गिल्ट रहता है कि वे बच्चे को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे। लेकिन बच्चे के इमोशनल ग्रोथ के लिए घंटों से ज्यादा पेरेंट्स का अटेंशन मायने रखता है। ऑफिस टाइम के बाद बच्चे के साथ रोज कुछ समय बिताएं। इस दौरान मोबाइल और ऑफिस के काम से दूर रहें और पूरा ध्यान बच्चे पर दें। उसके साथ खेलें, किताब पढ़ें, बातें करें और उसकी छोटी-छोटी जरूरतों पर ध्यान दें। अंतिम बात आपके बेटे की उम्र अभी तीन साल है। इस उम्र में उसे प्यार, सुरक्षा, नियमित दिनचर्या और भरोसेमंद देखभाल की जरूरत है। अगर आपके पास दिन में उसकी देखभाल का दूसरा व्यावहारिक विकल्प नहीं है, तो अच्छी क्वालिटी वाले डे-केयर पर विचार किया जा सकता है। याद रखें, अच्छी परवरिश का मतलब हर समय बच्चे के साथ रहना नहीं, बल्कि उसकी जरूरतों को समझना और उसे सुरक्षित, प्यार भरा माहौल देना है। ………………… ग्राफिक्स– विपुल शर्मा ……………….. ये खबर भी पढ़ें पेरेंटिंग- बेटा किताबें नहीं छूता: हर वक्त मोबाइल, लैपटॉप या टीवी, उसे सिर्फ स्क्रीन चाहिए, उसमें रीडिंग हैबिट कैसे डेवलप करें आज के समय में बच्चों की पढ़ाई के लिए डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल होता है। इस वजह से कई बच्चों का अटेंशन स्पैन (एकाग्रता) प्रभावित होता है। दरअसल, लगातार बदलने वाला कंटेंट उनके ब्रेन को तुरंत स्टिमुलेट करता है। पूरी खबर पढ़ें…

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