उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों और भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) तकनीक की मदद से मेघालय में तीन लाख 40 हजार हेक्टेयर से अधिक कृषि योग्य ऐसी भूमि की पहचान की गई है जहां लंबे समय से खेती नहीं की गई है और यह राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 15.2 प्रतिशत है। एक अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है। इस महीने की शुरुआत में ‘जर्नल ऑफ जियोग्राफी, एनवॉयरमेंट एंड अर्थ साइंस इंटरनेशनल’ में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, कृषि के लिए भूमि को दोबारा उपयोगी बनाने और टिकाऊ भूमि उपयोग की योजना तैयार करने के लिहाज से कुल 3,40,673.36 हेक्टेयर भूमि का आकलन किया जा सकता है।
अध्ययन में पाया गया कि चिह्नित क्षेत्र में सबसे बड़ा हिस्सा ‘स्पार्स स्क्रबलैंड’ का है। ‘स्पार्स स्क्रबलैंड’ एक ऐसा प्राकृतिक और पारिस्थितिक क्षेत्र है जहां वनस्पति बहुत कम, बिखरी हुई और छोटी होती है। ‘स्पार्स स्क्रबलैंड’ का क्षेत्रफल सबसे बढ़ा, 2,06,595.18 हेक्टेयर है, जो कुल चिह्नित क्षेत्र का 60.64 प्रतिशत है।
इसके बाद ‘डेंस स्क्रबलैंड का क्षेत्रफल 99,488.89 हेक्टेयर यानी 29.20 प्रतिशत है। ‘डेंस स्क्रबलैंड’ में घने पेड़ और घनी पत्तियों वाली वनस्पति होती है। वहीं, झूम खेती (शिफ्टिंग कल्टिवेशन) के अंतर्गत आने वाला क्षेत्र 34,331.34 हेक्टेयर (10.08 प्रतिशत) है, जबकि घास के मैदान और चरागाह 257.94 हेक्टेयर यानी 0.08 प्रतिशत क्षेत्र में फैले हैं।
यह शोध नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी, तुरा और उमियाम स्थित नॉर्थ ईस्टर्न स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर (एनईएसएसी) से जुड़े रौनक मीना, चंदन गोस्वामी, सी पी सुरेश और अकमौल हक ने किया। शोधकर्ताओं ने वर्ष 2025-26 की ‘एलआईएसएस-4’ सेंसर से प्राप्त बहुवर्णक्रमीय उपग्रह तस्वीरों का इस्तेमाल कर भूमि को चार श्रेणियों में बांटा। इनमें घनी झाड़ियों वाली भूमि, कम घनी झाड़ियों वाली भूमि, घास के मैदान एवं चरागाह और झूम खेती वाले क्षेत्र शामिल हैं।
अध्ययन में भूमि को दोबारा खेती योग्य बनाने की प्राथमिकता के आधार पर अंक भी दिए गए। कम घनी झाड़ियों वाली भूमि को 100 में से 95 अंक मिले, जो सबसे अधिक हैं। घनी झाड़ियों वाली भूमि को 80, झूम खेती वाले क्षेत्रों को 60 और घास के मैदानों एवं चरागाहों को 25 अंक दिए गए।
शोधकर्ताओं ने कहा कि अध्ययन के निष्कर्ष भूमि उपयोग की योजना बनाने, संसाधनों के प्रबंधन और कृषि विकास के लिए आधार तैयार कर सकते हैं। हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि चिह्नित क्षेत्रों को खेती के लिए उपयोगी बनाने से पहले उनका विस्तृत आकलन करना जरूरी होगा। अध्ययन में हालांकि आगाह किया गया कि नक्शे में चिह्नित पूरी भूमि को तुरंत खेती के लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता।
इसमें मिट्टी की विशेषताओं, भूमि की ढलान, पानी की उपलब्धता, पहुंच और आर्थिक व्यवहार्यता जैसे पहलुओं का आकलन नहीं किया गया है।

