गोड्डा जिले के महागामा में करीब 600 साल पुराने मां दुर्गा मंदिर और लोहंडिया के दुर्गा मंदिर में नवरात्रि की महासप्तमी पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी। सुबह से ही श्रद्धालु मां दुर्गा के दर्शन के लिए पहुंचे। मंदिर परिसर ‘जय माता दी’ के नारों से गूंज उठा। महासप्तमी पर यहां ‘छरा’ (झाड़ू देने) और ‘बेलभरनी’ की पुरानी रस्म निभाई गई। इस अनूठी परंपरा को देखने दूर-दराज से बड़ी संख्या में श्रद्धालु महागामा आए। ये मंदिर अपनी खास धार्मिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। मान्यता है कि षष्ठी को बेल के पेड़ के पास बेलभरनी पूजा कर मां दुर्गा को आमंत्रित किया जाता है। महासप्तमी की सुबह बेलभरनी को विधि-विधान से मंदिर लाया जाता है। माता के आने से पहले श्रद्धालु अरहर की डालियों से बने छरा (पारंपरिक झाड़ू) से रास्ते की सफाई करते हैं। यह उन भक्तों द्वारा किया जाता है जिनकी मन्नतें पूरी होती हैं। इस परंपरा में करीब 40 से 50 हजार श्रद्धालु शामिल होते हैं। भक्त रास्ते की पवित्रता के लिए दूध, गंगाजल, फल, लावा और बेलपत्र भी चढ़ाते हैं, जिससे मां प्रसन्न होती हैं और कष्ट दूर करती हैं। मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना नवरात्रि की सप्तमी तिथि पर मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां कालरात्रि दुष्ट शक्तियों का संहार करने वाली और अपने भक्तों को भय से मुक्ति दिलाने वाली हैं। इस दिन श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा कर सुख, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं। लोहंडिया दुर्गा मंदिर में पंडित पंकज चतुर्वेदी और राघवेंद्र चौबे ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मां दुर्गा की पूजा-अर्चना संपन्न कराई। इस दौरान श्रद्धालुओं ने पुष्प, अक्षत, चंदन और अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर माता से अपनी मनोकामनाएं पूरी करने की प्रार्थना की।
सुरक्षा के लिए प्रशासन अलर्ट महासप्तमी पर श्रद्धालुओं की संभावित भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन, पुलिस और नगर पंचायत की ओर से सुरक्षा एवं व्यवस्था के इंतजाम किए गए। महागामा का पुरानी बाजार से मंदिर परिसर तक कई स्थानों पर बैरिकेडिंग की गई। इसके साथ ही साफ-सफाई, प्रकाश व्यवस्था और शांति व्यवस्था बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया गया। छरा और बेलभरनी की परंपरा संपन्न होने के बाद मां दुर्गा को मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कराया जाता है। इसके बाद रात्रि में माता को 56 प्रकार के भोग अर्पित किए जाने की परंपरा है। महागामा के इस प्राचीन दुर्गा मंदिर में महासप्तमी का पर्व केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सदियों से चली आ रही लोक आस्था, परंपरा और श्रद्धा का प्रतीक भी है। गोड्डा जिले के महागामा में करीब 600 साल पुराने मां दुर्गा मंदिर और लोहंडिया के दुर्गा मंदिर में नवरात्रि की महासप्तमी पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी। सुबह से ही श्रद्धालु मां दुर्गा के दर्शन के लिए पहुंचे। मंदिर परिसर ‘जय माता दी’ के नारों से गूंज उठा। महासप्तमी पर यहां ‘छरा’ (झाड़ू देने) और ‘बेलभरनी’ की पुरानी रस्म निभाई गई। इस अनूठी परंपरा को देखने दूर-दराज से बड़ी संख्या में श्रद्धालु महागामा आए। ये मंदिर अपनी खास धार्मिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। मान्यता है कि षष्ठी को बेल के पेड़ के पास बेलभरनी पूजा कर मां दुर्गा को आमंत्रित किया जाता है। महासप्तमी की सुबह बेलभरनी को विधि-विधान से मंदिर लाया जाता है। माता के आने से पहले श्रद्धालु अरहर की डालियों से बने छरा (पारंपरिक झाड़ू) से रास्ते की सफाई करते हैं। यह उन भक्तों द्वारा किया जाता है जिनकी मन्नतें पूरी होती हैं। इस परंपरा में करीब 40 से 50 हजार श्रद्धालु शामिल होते हैं। भक्त रास्ते की पवित्रता के लिए दूध, गंगाजल, फल, लावा और बेलपत्र भी चढ़ाते हैं, जिससे मां प्रसन्न होती हैं और कष्ट दूर करती हैं। मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना नवरात्रि की सप्तमी तिथि पर मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां कालरात्रि दुष्ट शक्तियों का संहार करने वाली और अपने भक्तों को भय से मुक्ति दिलाने वाली हैं। इस दिन श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा कर सुख, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं। लोहंडिया दुर्गा मंदिर में पंडित पंकज चतुर्वेदी और राघवेंद्र चौबे ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मां दुर्गा की पूजा-अर्चना संपन्न कराई। इस दौरान श्रद्धालुओं ने पुष्प, अक्षत, चंदन और अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर माता से अपनी मनोकामनाएं पूरी करने की प्रार्थना की।
सुरक्षा के लिए प्रशासन अलर्ट महासप्तमी पर श्रद्धालुओं की संभावित भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन, पुलिस और नगर पंचायत की ओर से सुरक्षा एवं व्यवस्था के इंतजाम किए गए। महागामा का पुरानी बाजार से मंदिर परिसर तक कई स्थानों पर बैरिकेडिंग की गई। इसके साथ ही साफ-सफाई, प्रकाश व्यवस्था और शांति व्यवस्था बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया गया। छरा और बेलभरनी की परंपरा संपन्न होने के बाद मां दुर्गा को मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कराया जाता है। इसके बाद रात्रि में माता को 56 प्रकार के भोग अर्पित किए जाने की परंपरा है। महागामा के इस प्राचीन दुर्गा मंदिर में महासप्तमी का पर्व केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सदियों से चली आ रही लोक आस्था, परंपरा और श्रद्धा का प्रतीक भी है।

