अररिया कोर्ट रेलवे स्टेशन परिसर में शारदीय नवरात्र के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी। यहां पिछले 43 सालों से मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जा रही है। सुबह से देर शाम तक श्रद्धालु पूजा करने पहुंचते रहे। 1983 में तस्वीर स्थापित कर शुरू हुई थी पूजा स्थानीय लोगों कृष्णानंद विश्वास, कमलेश्वरी चौधरी, दीपक मंडल, कन्हाई विश्वास और हरिश्चंद्र पासवान के अनुसार, इस पूजा की शुरुआत 1983 में तत्कालीन स्टेशन मास्टर श्रीवास्तव जी ने मां दुर्गा की तस्वीर स्थापित कर की थी। धीरे-धीरे स्थानीय लोगों के सहयोग से पूजा भव्य रूप लेती गई। पहले लोगों को मेला देखने के लिए जिला मुख्यालय से करीब 5 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। इसके बाद ग्रामीणों ने रेलवे प्रशासन की अनुमति से स्टेशन परिसर में ही पूजा शुरू की। स्टेशन मास्टर के तबादले के बाद भी स्थानीय लोगों और रेलवे कर्मचारियों ने इस परंपरा को जारी रखा। युवा पीढ़ी ने संभाली पूजा की जिम्मेदारी स्थानीय वार्ड पार्षद श्याम मंडल ने बताया कि इस साल युवा पीढ़ी ने पूजा की जिम्मेदारी संभाली है। आरपीएफ जवान विजय कुमार विश्वास ने बताया कि रेलवे प्रशासन की अनुमति और स्थानीय लोगों के सहयोग से हर साल की तरह इस बार भी भव्य पंडाल में पूजा की जा रही है। मां स्कंदमाता की पूजा का विशेष महत्व पंडित रुद्रकांत झा के अनुसार, भगवान कार्तिकेय का एक नाम स्कंद है। उनकी माता होने के कारण देवी के इस स्वरूप को स्कंदमाता कहा जाता है। सिंह पर विराजमान मां की चार भुजाएं हैं और उनकी गोद में बाल स्वरूप भगवान कार्तिकेय विराजते हैं। कमल के आसन पर विराजमान होने के कारण उन्हें पद्मासना भी कहा जाता है। मान्यता है कि मां स्कंदमाता को केले का भोग लगाने से सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। उनकी आराधना से भक्त संतान सुख, ज्ञान, बुद्धि और मानसिक शांति की कामना करते हैं। अररिया कोर्ट रेलवे स्टेशन परिसर में शारदीय नवरात्र के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी। यहां पिछले 43 सालों से मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जा रही है। सुबह से देर शाम तक श्रद्धालु पूजा करने पहुंचते रहे। 1983 में तस्वीर स्थापित कर शुरू हुई थी पूजा स्थानीय लोगों कृष्णानंद विश्वास, कमलेश्वरी चौधरी, दीपक मंडल, कन्हाई विश्वास और हरिश्चंद्र पासवान के अनुसार, इस पूजा की शुरुआत 1983 में तत्कालीन स्टेशन मास्टर श्रीवास्तव जी ने मां दुर्गा की तस्वीर स्थापित कर की थी। धीरे-धीरे स्थानीय लोगों के सहयोग से पूजा भव्य रूप लेती गई। पहले लोगों को मेला देखने के लिए जिला मुख्यालय से करीब 5 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। इसके बाद ग्रामीणों ने रेलवे प्रशासन की अनुमति से स्टेशन परिसर में ही पूजा शुरू की। स्टेशन मास्टर के तबादले के बाद भी स्थानीय लोगों और रेलवे कर्मचारियों ने इस परंपरा को जारी रखा। युवा पीढ़ी ने संभाली पूजा की जिम्मेदारी स्थानीय वार्ड पार्षद श्याम मंडल ने बताया कि इस साल युवा पीढ़ी ने पूजा की जिम्मेदारी संभाली है। आरपीएफ जवान विजय कुमार विश्वास ने बताया कि रेलवे प्रशासन की अनुमति और स्थानीय लोगों के सहयोग से हर साल की तरह इस बार भी भव्य पंडाल में पूजा की जा रही है। मां स्कंदमाता की पूजा का विशेष महत्व पंडित रुद्रकांत झा के अनुसार, भगवान कार्तिकेय का एक नाम स्कंद है। उनकी माता होने के कारण देवी के इस स्वरूप को स्कंदमाता कहा जाता है। सिंह पर विराजमान मां की चार भुजाएं हैं और उनकी गोद में बाल स्वरूप भगवान कार्तिकेय विराजते हैं। कमल के आसन पर विराजमान होने के कारण उन्हें पद्मासना भी कहा जाता है। मान्यता है कि मां स्कंदमाता को केले का भोग लगाने से सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। उनकी आराधना से भक्त संतान सुख, ज्ञान, बुद्धि और मानसिक शांति की कामना करते हैं।

