समस्तीपुर शहर के बहादुरपुर स्थित पुरानी दुर्गा स्थान मंदिर में माथा टेकने के बाद ही लोग दूसरे पूजा पंडालों की ओर रुख करते हैं। इस मंदिर में पूजा का इतिहास करीब 400 साल से भी पुराना है। यहां तांत्रिक विधि से माता की पूजा की जाती है। इसे शक्तिपीठ के रूप में भी जाना जाता है। बली प्रथा इस मंदिर में अभी भी जीवित है। दूसरे प्रदेशों से भी लोग पहुंचते हैं। नवमी के दिन मंदिर के पीछे बली दी जाती है। यहां वर्षों से एक ही समान भव्य प्रतिमा का निर्माण होता रहा है। पूजा की कमान चौधरी परिवार संभाल रहे हैं। कहा जाता है कि यहां कभी झोपड़ी में माता की अराधना की जाती थी। आधुनिकता के कारण धीरे-धीरे पूजा पंडाल बनाया जाने लगा। पूजा पंडाल भी समान्य बनाए जाते हैं ताकि खर्च कम हो। पूर्वज की जमीन पर झोपड़ी बनाकर पूजा की शुरुआत इस साल पूजा के व्यवस्थापक कवि चौधरी रमेश कुमार रविकर बताते हैं कि करीब 400 साल पहले ढाका से आए घी कारोबारी मंगो मुखोपाध्याय समस्तीपुर पहुंचे थे। उन्होंने ही पूर्वज की जमीन पर झोपड़ी बनाकर दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी। करीब साढे 300 साल पहले जब वे बुजुर्गावस्था में ढाका लौटने लगे तो उनके पूर्वज हनुमान चौधरी को पूजा की बागडोर दे दी। जिसके बाद संतान विहीन हनुमान चौधरी के घर बच्चों की किलकारी गूंजी थी। तब से पूजा की बागडोर चौधरी परिवार के हाथों में हैं। चौधरी परिवार हर साल पूजा की बागडोर संभालते हैं। बाहरी लोगों से चंदा नहीं लिया जाता है। पूजा में सभी लोग बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। पूजा भले ही चौधरी परिवार का हो, लेकिन यहां नगर कल्याण का संकल्प लिया जाता है। मंदिर परिसर की जगह बढ़ाई पुरानी दुर्गा स्थान में वर्षों से बली देने की प्रथा चली आ रही है। यहां निशारात्रि को तंत्र विद्यि से पूजा की जाती है। पंडित की ओर से पूजा यंत्र का निर्माण किया जाता है अगले दिन अष्टदल कमल बनाया जाता है। पूजा के समय चौधरी परिवार के सभी सदस्य श्रद्धा के साथ उपस्थित रहते हैं। इस बार मंदिर परिसर की जगह बढ़ाई गई है। परिसर में नई मिट्टी डाली गई है। ताकि खाली पैर आने वाले श्रद्धालुओं को परेशानी नहीं हो। दिन के समय पड़ रही गर्मी को देखते हुए इस बार पूजा पंडाल में कुलर की व्यवस्था की गई है।
प्रशासन से नहीं लेते मदद पूजा के व्यवस्थापक कवि रविकर ने कहा कि पूजा संचालन समिति की ओर से सुरक्षा व्यवस्था के लिए प्रशासन से मदद नहीं ली जाती। परिवार के सदस्य सुरक्षा व्यवस्था में तैनात होते हैं। पिछले 400 सालों के दौरान यहां कभी कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। प्रशासन की ओर से पुलिस टीम को भेजा जाता है जो बाहरी व्यवस्था देखते हैं। मेला लगाने के लिए चौधरी परिवार की ओर से 8 कठ्ठा जमीन दी गई है। समस्तीपुर शहर के बहादुरपुर स्थित पुरानी दुर्गा स्थान मंदिर में माथा टेकने के बाद ही लोग दूसरे पूजा पंडालों की ओर रुख करते हैं। इस मंदिर में पूजा का इतिहास करीब 400 साल से भी पुराना है। यहां तांत्रिक विधि से माता की पूजा की जाती है। इसे शक्तिपीठ के रूप में भी जाना जाता है। बली प्रथा इस मंदिर में अभी भी जीवित है। दूसरे प्रदेशों से भी लोग पहुंचते हैं। नवमी के दिन मंदिर के पीछे बली दी जाती है। यहां वर्षों से एक ही समान भव्य प्रतिमा का निर्माण होता रहा है। पूजा की कमान चौधरी परिवार संभाल रहे हैं। कहा जाता है कि यहां कभी झोपड़ी में माता की अराधना की जाती थी। आधुनिकता के कारण धीरे-धीरे पूजा पंडाल बनाया जाने लगा। पूजा पंडाल भी समान्य बनाए जाते हैं ताकि खर्च कम हो। पूर्वज की जमीन पर झोपड़ी बनाकर पूजा की शुरुआत इस साल पूजा के व्यवस्थापक कवि चौधरी रमेश कुमार रविकर बताते हैं कि करीब 400 साल पहले ढाका से आए घी कारोबारी मंगो मुखोपाध्याय समस्तीपुर पहुंचे थे। उन्होंने ही पूर्वज की जमीन पर झोपड़ी बनाकर दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी। करीब साढे 300 साल पहले जब वे बुजुर्गावस्था में ढाका लौटने लगे तो उनके पूर्वज हनुमान चौधरी को पूजा की बागडोर दे दी। जिसके बाद संतान विहीन हनुमान चौधरी के घर बच्चों की किलकारी गूंजी थी। तब से पूजा की बागडोर चौधरी परिवार के हाथों में हैं। चौधरी परिवार हर साल पूजा की बागडोर संभालते हैं। बाहरी लोगों से चंदा नहीं लिया जाता है। पूजा में सभी लोग बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। पूजा भले ही चौधरी परिवार का हो, लेकिन यहां नगर कल्याण का संकल्प लिया जाता है। मंदिर परिसर की जगह बढ़ाई पुरानी दुर्गा स्थान में वर्षों से बली देने की प्रथा चली आ रही है। यहां निशारात्रि को तंत्र विद्यि से पूजा की जाती है। पंडित की ओर से पूजा यंत्र का निर्माण किया जाता है अगले दिन अष्टदल कमल बनाया जाता है। पूजा के समय चौधरी परिवार के सभी सदस्य श्रद्धा के साथ उपस्थित रहते हैं। इस बार मंदिर परिसर की जगह बढ़ाई गई है। परिसर में नई मिट्टी डाली गई है। ताकि खाली पैर आने वाले श्रद्धालुओं को परेशानी नहीं हो। दिन के समय पड़ रही गर्मी को देखते हुए इस बार पूजा पंडाल में कुलर की व्यवस्था की गई है।
प्रशासन से नहीं लेते मदद पूजा के व्यवस्थापक कवि रविकर ने कहा कि पूजा संचालन समिति की ओर से सुरक्षा व्यवस्था के लिए प्रशासन से मदद नहीं ली जाती। परिवार के सदस्य सुरक्षा व्यवस्था में तैनात होते हैं। पिछले 400 सालों के दौरान यहां कभी कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। प्रशासन की ओर से पुलिस टीम को भेजा जाता है जो बाहरी व्यवस्था देखते हैं। मेला लगाने के लिए चौधरी परिवार की ओर से 8 कठ्ठा जमीन दी गई है।

