बांस के विशाल छाते के नीचे कभी शुरू हुई थी पूजा, आज भव्य मंदिर में विराजती हैं मां दुर्गा

बांस के विशाल छाते के नीचे कभी शुरू हुई थी पूजा, आज भव्य मंदिर में विराजती हैं मां दुर्गा

भास्कर न्यूज |गिरिडीह बेंगाबाद प्रखंड के मोतीलेदा का दुर्गा मंदिर आस्था, विश्वास और सांस्कृतिक विरासत का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर से जुड़ी परंपरा की शुरुआत किसी भव्य पंडाल या मंदिर से नहीं, बल्कि खुले मैदान में बांस के विशाल छाते के नीचे हुई थी। स्थानीय मान्यता के अनुसार, पूजा के दौरान लगातार बारिश होने पर ग्रामीणों ने बांस से बड़ा छाता तैयार किया और उसके नीचे मां दुर्गा की आराधना शुरू की। इसी अनूठी शुरुआत के कारण यहां की दुर्गापूजा को ‘छाता मेला’ के नाम से पहचान मिली। समय के साथ पूजा का स्वरूप बदला और वर्ष 1984 में भव्य दुर्गा मंदिर की स्थापना हुई, लेकिन पुरानी परंपरा से जुड़ी आस्था आज भी कायम है। स्थानीय लोगों के अनुसार, वर्ष 1970 के दशक में ढालो राय, चंद्रिका महतो, खीरू तुरी, महावीर राउत और शिवचंद राय समेत अन्य ग्रामीणों ने मोतीलेदा के खुले मैदान में शारदीय दुर्गापूजा की शुरुआत की थी। पूजा के दौरान लगातार बारिश होने से आयोजन में परेशानी आने लगी। ऐसे में ग्रामीणों ने बांस की मदद से एक विशाल छाता तैयार किया और उसे मैदान में गाड़ दिया। इसके बाद उसी छाते के नीचे मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाने लगी। स्थानीय मान्यता है कि पूजा शुरू होने के बाद बारिश थम गई। इसके बाद से यह आयोजन ‘छाता मेला’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। कई वर्षों तक इसी परंपरा के तहत पूजा होती रही। समय के साथ मोतीलेदा की दुर्गापूजा का स्वरूप बदलता गया। वर्ष 1984 में पूजा समिति की पहल और स्थानीय लोगों के सहयोग से यहां भव्य दुर्गा मंदिर की स्थापना की गई। इसके बाद से शारदीय नवरात्र के दौरान मंदिर में विधि-विधान से मां दुर्गा की पूजा-अर्चना होने लगी। खुले मैदान में बांस के छाते के नीचे शुरू हुआ धार्मिक आयोजन आज स्थायी मंदिर और मेले के रूप में क्षेत्र की पहचान बन चुका है। 30 गांवों के श्रद्धालु पहुंचते हैं दर्शन करने मोतीलेदा में दुर्गापूजा के दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। आसपास के करीब 30 गांवों से लोग मां दुर्गा के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। धार्मिक आयोजन के साथ यह मेला सामाजिक मेलजोल और आपसी सद्भाव का भी प्रतीक है। विभिन्न समुदायों के लोग मिलकर आयोजन को सफल बनाने में सहयोग करते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा ग्रामीणों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। भास्कर न्यूज |गिरिडीह बेंगाबाद प्रखंड के मोतीलेदा का दुर्गा मंदिर आस्था, विश्वास और सांस्कृतिक विरासत का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर से जुड़ी परंपरा की शुरुआत किसी भव्य पंडाल या मंदिर से नहीं, बल्कि खुले मैदान में बांस के विशाल छाते के नीचे हुई थी। स्थानीय मान्यता के अनुसार, पूजा के दौरान लगातार बारिश होने पर ग्रामीणों ने बांस से बड़ा छाता तैयार किया और उसके नीचे मां दुर्गा की आराधना शुरू की। इसी अनूठी शुरुआत के कारण यहां की दुर्गापूजा को ‘छाता मेला’ के नाम से पहचान मिली। समय के साथ पूजा का स्वरूप बदला और वर्ष 1984 में भव्य दुर्गा मंदिर की स्थापना हुई, लेकिन पुरानी परंपरा से जुड़ी आस्था आज भी कायम है। स्थानीय लोगों के अनुसार, वर्ष 1970 के दशक में ढालो राय, चंद्रिका महतो, खीरू तुरी, महावीर राउत और शिवचंद राय समेत अन्य ग्रामीणों ने मोतीलेदा के खुले मैदान में शारदीय दुर्गापूजा की शुरुआत की थी। पूजा के दौरान लगातार बारिश होने से आयोजन में परेशानी आने लगी। ऐसे में ग्रामीणों ने बांस की मदद से एक विशाल छाता तैयार किया और उसे मैदान में गाड़ दिया। इसके बाद उसी छाते के नीचे मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाने लगी। स्थानीय मान्यता है कि पूजा शुरू होने के बाद बारिश थम गई। इसके बाद से यह आयोजन ‘छाता मेला’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। कई वर्षों तक इसी परंपरा के तहत पूजा होती रही। समय के साथ मोतीलेदा की दुर्गापूजा का स्वरूप बदलता गया। वर्ष 1984 में पूजा समिति की पहल और स्थानीय लोगों के सहयोग से यहां भव्य दुर्गा मंदिर की स्थापना की गई। इसके बाद से शारदीय नवरात्र के दौरान मंदिर में विधि-विधान से मां दुर्गा की पूजा-अर्चना होने लगी। खुले मैदान में बांस के छाते के नीचे शुरू हुआ धार्मिक आयोजन आज स्थायी मंदिर और मेले के रूप में क्षेत्र की पहचान बन चुका है। 30 गांवों के श्रद्धालु पहुंचते हैं दर्शन करने मोतीलेदा में दुर्गापूजा के दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। आसपास के करीब 30 गांवों से लोग मां दुर्गा के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। धार्मिक आयोजन के साथ यह मेला सामाजिक मेलजोल और आपसी सद्भाव का भी प्रतीक है। विभिन्न समुदायों के लोग मिलकर आयोजन को सफल बनाने में सहयोग करते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा ग्रामीणों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।  

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