यह भ्रम फैलाने का प्रयास किया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण में ईसीआई सॉफ्टवेयर में से 85,854 मतदाताओं के नाम फार्म-7 ऑटो जेनरेट कर बिना समुचित कारण के विलोपित कर दिये गये हैं। आयोग ने सफाई दी है कि उत्तर प्रदेश में विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण-2026 का कार्य लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम 1960 और भारत निर्वाचन आयोग के निर्देश 27 अक्टूबर 2025 के अनुसार पूरी पारदर्शिता के साथ किया गया है। इन आरोपों को चुनाव आयोग ने खारिज किया है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से स्पष्ट किया है कि SIR के दौरान ईसीआई सॉफ्टवेयर से 85,854 फॉर्म-7 बिना कारण ऑटो-जेनरेट नहीं किए गए। ये फॉर्म उन्हीं मतदाताओं के लिए बनाए गए, जिन्हें निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ईआरओ) ने पूरी सुनवाई के बाद अनर्ह (Ineligible) पाया था। प्रक्रिया लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम 1960 और भारत निर्वाचन आयोग के 27 अक्टूबर 2025 के निर्देशों के अनुसार पारदर्शी तरीके से चली। आधिकारिक स्पष्टीकरण में बताया गया कि 6 जनवरी 2026 को प्रकाशित आलेख्य मतदाता सूची में प्रदेश के 12 करोड़ 55 लाख मतदाता शामिल थे। इनमें से करीब 3 करोड़ 26 लाख मतदाताओं को नो मैपिंग और तार्किक विसंगतियों के कारण नोटिस जारी किए गए। नियम के तहत ईआरओ को स्वतः संज्ञान (Suo moto) जांच का अधिकार है। नोटिस पाने वालों से निर्धारित दस्तावेज मांगे गए और सुनवाई की अंतिम तिथि 27 मार्च 2026 तय थी। सुनवाई पूरी होने के बाद ईआरओ/सहायक ईआरओ ने अर्ह या अनर्ह का फैसला लिया। अर्ह पाए गए मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में शामिल किए गए, जबकि अनर्ह पाए गए लोगों के नाम ड्राफ्ट सूची से हटाने के लिए सॉफ्टवेयर में फॉर्म-7 जनरेट करने की व्यवस्था की गई। इसका उद्देश्य भविष्य में यह पता लगाना आसान बनाना था कि किसी मतदाता का नाम कब और क्यों हटाया गया। बिना फॉर्म-7 के नाम हटाने पर बाद में जांच मुश्किल हो जाती। खबर में बताए गए 85,854 मामले इन्हीं अनर्ह पाए गए मतदाताओं के हैं। तरबगंज और पीलीभीत वाले दावे भी खारिज रिपोर्ट में तरबगंज और पीलीभीत विधानसभा क्षेत्रों का उदाहरण देकर समुदाय विशेष के नाम काटने का आरोप लगाया गया था। स्पष्टीकरण में कहा गया कि इन दोनों क्षेत्रों में एक आवेदक द्वारा कई लोगों के नाम कटवाने के लिए भरे गए सभी फॉर्म-7 निरस्त कर दिए गए। बल्क में फॉर्म-7 भरने की कोशिश सफल नहीं होने दी गई। खबर खुद बताती है कि वेबसाइट पर उपलब्ध लाखों फॉर्म-7 की जांच के बाद सिर्फ 198 ऐसे मामले मिले, जहां एक ही व्यक्ति ने 10 से ज्यादा फॉर्म-7 भरे। इन सभी में कुल 4,740 नाम काटने की कोशिश हुई। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में लाखों फॉर्म-7 में से इतनी कम संख्या में बल्क केस मिलना इस बात का संकेत है कि बड़े पैमाने पर एक साथ फॉर्म-7 सामान्यतः नहीं आए। गाइडलाइन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध खबर में यह दावा भी गलत बताया गया कि विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण की प्रक्रिया के बारे में सार्वजनिक जानकारी नहीं है। भारत निर्वाचन आयोग की वेबसाइट (www.eci.gov.in) के Instructions टैब में 27 अक्टूबर 2025 के दिशा-निर्देश आज भी उपलब्ध हैं। इन्हीं के आधार पर पूरी प्रक्रिया चली। सवाल भेजने के समय को लेकर भी सवाल मीडिया रिपोर्ट में कहा गया था कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी और ईसीआई को विस्तृत सवाल भेजे गए, लेकिन जवाब नहीं मिला। स्पष्टीकरण में बताया गया कि 8 अक्टूबर 2026 को दोपहर 3:32 बजे ई-मेल भेजकर उसी दिन शाम 7 बजे तक जवाब मांगा गया। ई-मेल में सिर्फ तीन सवाल थे और उनमें उन आंकड़ों या उदाहरणों का जिक्र नहीं था, जो बाद में खबर में छापे गए। उस समय प्रदेश में विधान परिषद के खंड स्नातक और खंड शिक्षक क्षेत्र का निर्वाचन चल रहा था। तीन घंटे में विस्तृत जवाब मांगना और अगले दिन सुबह 8:30 बजे खबर प्रसारित करना इस बात को दर्शाता है कि सत्यता जानने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की गई। आधिकारिक बयान में आश्वस्त किया गया है कि उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची का पुनरीक्षण पूरी तरह विधिक प्रक्रिया के अनुसार किया गया है। सोशल मीडिया पर फैलाई गई खबर भ्रामक और निराधार है।

