पाकिस्तानी सेना के चलते हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में बेनजीर भुट्टो की हुई थी फजीहत  

पाकिस्तानी सेना के चलते हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में बेनजीर भुट्टो की हुई थी फजीहत  

Benazir Bhutto 1971 War: 1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान में ‘बांग्‍लादेश मुक्ति संग्राम’ की गूंज थी, बेनजीर भुट्टो अमेरिका की हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पढ़ाई कर रही थीं। उनका दाखिला हार्वर्ड के रैडक्लिफ कॉलेज में हुआ था। बेनजीर भुट्टो को कॉलेज के शुरुआती दिनों में पाकिस्तान के नाम पर शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था और बाद में पाकिस्तानी आर्मी उनकी शर्मिंदगी की वजह बनी। पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने अपनी आत्मकथा ‘डॉटर ऑफ डेस्टनी’ में इस बारे में बताया है।   

गुस्से में तिलमिला उठतीं बेनजीर

‘मुक्ति संग्राम’ – पाकिस्तान से आजादी की लड़ाई थी, जिसमें हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए। पाकिस्तान हर कीमत पर इस आंदोलन को कुचलना चाहता था। क्रूर तानाशाह याहया खान के आदेश पर सेना चुन-चुनकर प्रदर्शनकारियों को निशाना बना रही थी। पूर्वी पाकिस्तान में चल रहे इस कत्लेआम की खबरें सीमा के पार पहुंच गई थीं। बताया जाता है कि करीब 30 लाख लोग इस जुल्‍म का शिकार हुए थे। एक दिन बेनजीर जब अपनी क्लास में पहुंचीं, तो इसी मुद्दे पर चर्चा चल रही थी। हार्वर्ड के स्टूडेंट्स पाकिस्तानी सेना को क्रूर और बर्बर बता रहे थे। किताब में बेनजीर ने लिखा है कि मुझ पर आरोप लगते थे, तुम्हारी सेना बर्बर है। तुम बंगालियों का कत्लेआम कर रहे हो। मैं जवाब देती- हम बंगालियों को नहीं मार रहे। गुस्से से मेरा चेहरा नीला पड़ जाता। मैं पूछती, क्या तुम अखबारों में पढ़ी हर बात पर यकीन करते हो? हर कोई पश्चिमी पाकिस्तान के खिलाफ हो रहा था, यहां तक कि वे लोग भी जिनके साथ मैंने साल की शुरुआत में पूर्वी पाकिस्तान में आए भयानक चक्रवात के पीड़ितों के लिए घर-घर जाकर चंदा इकट्ठा किया था। मुझ पर यह आरोप भी लगते कि तुम लोग फासीवादी तानाशाह हो। मैं चुप नहीं रह पाती, पलटकर कहती- हम भारत समर्थित विद्रोह से लड़ रहे हैं। हम अपने देश को एकजुट रखने के लिए लड़ रहे हैं। हालांकि, आलोचना से बचने की कोई जगह नहीं थी, भले ही वह बेबुनियाद हो।

भुट्टो के सामने प्रोफेसर ने PAK को कोसा

किताब में एक और घटना का जिक्र है, जब युद्ध और नैतिकता पर एक सार्वजनिक व्याख्यान में प्रोफेसर माइकल वाल्ज़र ने पाकिस्तान को निशाना बनाया, बेनजीर वहीं मौजूद थीं। पाकिस्तानी होने के नाते उनके लिए यह शर्मिंदगी का विषय था कि खुले मंच से उनके मुल्क पर उंगली उठाई जा रही है। हालांकि, उन्होंने अपनी इस शर्मिंदगी को दूर करने की कोशिश भी की।

प्रोफेसर ने कहा- पाकिस्तान ने बांग्लादेश के लोगों को आत्मनिर्णय का अधिकार नहीं दिया। इस पर बेनजीर ने कांपती हुई आवाज में कहा- प्रोफेसर, यह पूरी तरह गलत है। बंगाल के लोगों ने 1947 में आत्मनिर्णय के अधिकार का इस्तेमाल किया था जब उन्होंने पाकिस्तान को चुना। पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया, लेकिन मेरी बात ऐतिहासिक रूप से सही थी। यह एक तरह से बेनजीर भुट्टो का पहला राजनीतिक भाषण था।

अन्याय करती रही सरकार

डॉटर ऑफ डेस्टनी’ में इस बात का भी जिक्र है कि किस तरह पाकिस्तान ने अपने पूर्वी हिस्से पर जुल्म ढाहे। बरसों की अनदेखी और अन्याय से पूर्वी पाकिस्तान में असंतोष भड़का और बांग्लादेश का जन्म हुआ। बेनजीर ने लिखा है, एक दुखद सच्चाई जिसका सामना करने से मैं इनकार करती रही। मैंने कितनी बार भगवान से अपनी अज्ञानता के लिए माफी भी मांगी। तब मुझे यह दिखाई नहीं दिया था कि पाकिस्तान के लिए मिले लोकतांत्रिक जनादेश का बुरी तरह उल्लंघन किया गया।

पूर्वी पाकिस्तान, जहां आबादी ज्यादा थी, उसके साथ पश्चिमी पाकिस्तान (जहां आबादी कम थी) का बर्ताव अच्छा नहीं था। पूर्वी पाकिस्तान के एक्सपोर्ट से होने वाली 31 अरब रुपये से ज्यादा की कमाई से पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों ने अपने लिए सड़कें, स्कूल, यूनिवर्सिटी और अस्पताल तो बना लिए, लेकिन पूर्वी हिस्से में बहुत कम विकास किया। हमारे बेहद गरीब मुल्क में सेना सबसे बड़ी नौकरी देने वाली संस्था थी, और उसकी 90 प्रतिशत फोर्स पश्चिमी पाकिस्तान से आती थी। सरकारी नौकरियों में 80 प्रतिशत लोग पश्चिम से ही लिए जाते थे। सेंट्रल गवर्नमेंट ने उर्दू को हमारी नेशनल भाषा घोषित कर दिया था। एक ऐसी भाषा जिसे पूर्वी पाकिस्तान में बहुत कम लोग समझते थे, जिससे सरकारी नौकरी या पढ़ाई-लिखाई में बंगालियों के लिए मुकाबला करना और मुश्किल हो गया। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि उन्हें अलग-थलग और शोषित महसूस हुआ। हार्वर्ड में मैं इतनी छोटी और नासमझ थी कि यह समझ नहीं पाई कि पाकिस्तानी सेना भी वही ज़ुल्म कर सकती है, जो कोई भी दूसरी सेना कर सकती है।

बता दें कि बांग्लादेश 1971 में अस्तित्व में आया। बंगबंधु शेख मुजिब-उर-रहमान के नेतृत्‍व में बांग्‍लादेश मुक्ति वाहिनी ने भारतीय सेना की मदद से 26 मार्च 1971 में विजय हासिल की थी।

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