Drishyam 3 Movie Review | ‘दृश्यम 3’ में विजय सलगांवकर का आखिरी दांव, पर नए पुलिस अफसर ने बिगाड़ा मजा?

Drishyam 3 Movie Review | ‘दृश्यम 3’ में विजय सलगांवकर का आखिरी दांव, पर नए पुलिस अफसर ने बिगाड़ा मजा?

“अब ये खेल दिमाग का नहीं, नसीब का बन चुका है…” -जब अजय देवगन का किरदार विजय सलगांवकर पुलिस के साथ एक और तनावपूर्ण आमना-सामना होने के बाद अपने सहमे हुए परिवार से यह संवाद कहता है, तो सिनेमाघर में बैठे दर्शक अपनी सांसें थाम लेते हैं। 2 अक्टूबर, सत्संग और पाव-भाजी की पुरानी यादों के साथ ‘दृश्यम 3’ इस आइकॉनिक फ्रेंचाइजी का अंतिम और बहुप्रतीक्षित चैप्टर लेकर पर्दे पर आ चुकी है। अभिषेक पाठक के निर्देशन में बनी यह फिल्म विजय सलगांवकर और उनके परिवार की रक्षा की आखिरी लड़ाई को तो मजबूती से दिखाती है, लेकिन एक जगह आकर चूक जाती है।

क्या है ‘दृश्यम 3’ की कहानी?
कहानी वहीं से शुरू होती है जहाँ विजय सलगांवकर और उनका परिवार गोवा में अपनी जिंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है। लेकिन, यह शांति ज्यादा दिन कायम नहीं रहती। दफनाया जा चुका पुराना केस एक बार फिर खोदकर निकाल लिया जाता है।

इस बार तब्बू (मीरा देशमुख) एक सख्त पुलिस अफसर के बजाय एक टूटी हुई, दुखी मां के रूप में दिखाई देती हैं, जिसने अपना इकलौता बेटा खो दिया है। केस की कमान अब क्राइम ब्रांच के नए हेड राजीव सिंह तोमर (जयदीप अहलावत) के हाथों में है। तोमर खुद को विजय की जिंदगी का नया ‘शनि’ बताता है। वह कब्रें खोदता है, डीएनए (DNA) सबूत ढूंढता है और भ्रष्ट इंस्पेक्टर गायतोंडे (कमलेश सावंत) के साथ मिलकर सलगांवकर परिवार पर शिकंजा कसने की कसम खाता है।

दृश्यम 3: कहानी और कड़ियाँ
फिल्म की एक खूबी यह है कि इसे पता है कि दर्शक क्या सोच रहे हैं। दृश्यम 2 की तरह ही, यह फिल्म भी शुरुआत में दर्शकों को अब तक हुई सभी घटनाओं की याद दिलाती है। फिल्म बनाने वालों को उस सवाल का भी अंदाज़ा है जो तीसरी फिल्म की घोषणा के साथ ही उठा था। अब और क्या हो सकता है?

फिल्म की कहानी किरदारों के ज़रिए ही इस उत्सुकता को शांत करती है। एक जगह, गायतोंडे मज़ाकिया अंदाज़ में कहते हैं, “इस केस की वजह से मेरी नौकरी जाती है और आती है।” यह बात असरदार लगती है क्योंकि दर्शक भी ठीक यही सोच रहे होते हैं।

कई ऐसे पल आते हैं जब किरदार सवाल उठाते हैं कि यह केस आखिर कब तक चलेगा। केस बंद होता है और फिर शुरू हो जाता है। विजय बार-बार पुलिस को चकमा देता है। यह लगभग एक मज़ाक जैसा बन जाता है। और यहीं पर दृश्यम 3 पिछली फिल्मों की भावना से जुड़ी रहती है। इसे पता है कि दर्शक विजय को यह खेल आखिरी बार खेलते हुए देखने आए हैं।

दृश्यम 3: अभिनय
अजय देवगन ने फिल्म में ज़बरदस्त काम किया है। विजय सलगांवकर के किरदार में उन्हें लंबे डायलॉग या नाटकीय अंदाज़ की ज़रूरत नहीं पड़ती। उनकी आँखें और खामोशी ही बहुत कुछ कह जाती हैं। विजय भले ही ज़्यादा पढ़े-लिखे न हों, लेकिन वे बेहद समझदार हैं। वे मुसीबत आने से पहले ही उसे भांप लेते हैं, और यही समझ हमेशा से उनकी सबसे बड़ी ताकत रही है। हर बार जब विजय पुलिस से एक कदम आगे रहते हैं, तो दर्शक प्रतिक्रिया देते हैं। हंसी, तनाव और राहत का एहसास होता है। फिल्म का पूरा दारोमदार उन्हीं के कंधों पर है, और देवगन ने इसे बखूबी निभाया है।

जयदीप अहलावत की कास्टिंग ने काफी उत्साह पैदा किया था। अहलावत और देवगन जैसे दो दमदार कलाकारों को आमने-सामने लाने से यादगार टकराव की उम्मीद थी। दुर्भाग्य से, यहीं पर फिल्म अपनी राह भटक जाती है। फिल्म का पहला हिस्सा राजीव सिंह तोमर को एक ऐसे नए अधिकारी के तौर पर पेश करने में काफी समय लगाता है जो आखिरकार सच का पता लगा सकता है। सच का पता लगाने के लिए वह सैम की आत्मा को बुलाएगा – यही उसका गुस्सा है। उसे लेकर लोगों में सचमुच उत्सुकता है। लेकिन कहानी की लिखावट उस उम्मीद पर खरी नहीं उतरती। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उसका किरदार बेजान लगने लगता है। यहाँ बहुत गुंजाइश थी। इसके बजाय, बीच में ही किरदार का आकर्षण खत्म होता दिखता है। जिस तरह से उसे पेश किया गया और जिस तरह से उसकी कहानी खत्म होती है, वह भी लिखावट और एडिटिंग पर सवाल खड़े करता है। जयदीप ने जो कुछ भी उन्हें दिया गया, उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया; दुख की बात है कि लेखक इसमें चूक गए।

तब्बू का मीरा देशमुख वाला किरदार अब बदल चुका है। उसने अपना इकलौता बेटा खो दिया है और उसके साथ ही, खुद का एक हिस्सा भी। इस बार उसका किरदार जांच-पड़ताल से ज़्यादा दुख पर केंद्रित है। भले ही उनका रोल छोटा है, लेकिन जब भी वह स्क्रीन पर आती हैं, तो सबका ध्यान खींच लेती हैं। रजत कपूर को मीरा के पति महेश देशमुख के तौर पर ज़्यादा काम करने को मिलता है। उनके किरदार में ज़्यादा संवाद और पहल है, और वह सिर्फ़ एक सहयोगी भूमिका जैसा नहीं लगता।

श्रिया सरन नंदिनी सालगांवकर के किरदार में असरदार हैं। वह अदालतों, पुलिस स्टेशनों और सामान्य जीवन जीने के दबाव का सामना करते हुए भी अपने परिवार को एकजुट रखने की कोशिश कर रही हैं। वह इस किरदार में सही मात्रा में भावुकता और कमज़ोरी (vulnerability) लाती हैं।

इशिता दत्ता ने भी अंजू के रोल में अच्छा काम किया है। उनका किरदार पिछली घटनाओं के असर से जूझ रहा है और दत्ता ने अपनी एक्टिंग में उस इमोशनल गहराई को बखूबी दिखाया है। मृणाल जाधव का रोल अनु के तौर पर छोटा है, लेकिन कहानी के लिए अहम है।

और फिर आते हैं इंस्पेक्टर लक्ष्मीकांत गायतोंडे, जिनका रोल कमलेश सावंत ने निभाया है। वह अब भी ऐसे किरदार हैं जिनसे नफ़रत करना भी अच्छा लगता है। विजय के साथ उनकी नोक-झोंक में काफ़ी मज़ा है, और सावंत यह पक्का करते हैं कि हर बार जब वह स्क्रीन पर आएं, तो छाप छोड़ें। विजय के साथ उनकी केमिस्ट्री उन चीज़ों में से एक होगी जिन्हें फ़ैंस मिस करेंगे, क्योंकि अब यह फ़्रैंचाइज़ी अपने आखिरी चैप्टर पर पहुँच गई है।

प्रकाश राज ने तब्बू के बेटे की मौत के मामले में वकील का छोटा लेकिन असरदार रोल निभाया है और एक बार फिर साबित किया है कि वह कितने बेहतरीन एक्टर हैं। एक्टर में सबसे गंभीर किरदारों में भी एक खास मज़ा या जोश लाने की अनोखी काबिलियत है। और यही खूबी वह इंद्रजीत शेट्टी के किरदार में भी लाते हैं।

दृश्यम 3: डायरेक्शन
अभिषेक पाठक, जिन्होंने ज़िंदगी भर मुख्य रूप से प्रोड्यूसर के तौर पर काम किया है, उन्होंने दृश्यम 2 और 3 को को-राइट और डायरेक्ट किया है। वह दृश्यम की दुनिया को समझते हैं और कैमरा वर्क और फ़िल्म की रफ़्तार को काफ़ी हद तक कंट्रोल में रखते हैं। फ़िल्म को देखकर ऐसा लगता है कि इसे सिर्फ़ एक और सीक्वल बनाने के लिए नहीं, बल्कि फ़्रैंचाइज़ी को एक सही अंजाम देने के मकसद से बनाया गया है।

हालांकि, एडिटिंग और राइटिंग की वजह से फ़िल्म थोड़ी कमज़ोर पड़ जाती है। यह बात ख़ासकर जयदीप अहलावत के किरदार में साफ़ दिखती है। कहानी जिस तरह से आगे बढ़ती है, उससे लगता है कि कुछ बहुत बड़ा होने वाला है, लेकिन आखिर में जो दिखाया जाता है, वह उम्मीद के मुताबिक नहीं लगता।

दृश्यम 3 की खूबियां क्या हैं?
इसकी सबसे बड़ी ताकत अब भी विजय सलगांवकर ही हैं। अजय देवगन की सधी हुई एक्टिंग कहानी को दिलचस्प बनाए रखती है, खासकर तब जब विजय एक बार फिर पुलिस से आगे निकल जाते हैं। फ़िल्म अपने दर्शकों को भी अच्छी तरह समझती है। पुरानी फ़िल्मों की यादें ताज़ा करना, गायतोंडे के मज़ेदार पल और पिछली फ़िल्मों का ज़िक्र कहानी के अनुभव को और बेहतर बनाते हैं, बिना किसी चीज़ के बेमेल लगे। तब्बू, श्रिया सरन और इशिता दत्ता ने भी अपने-अपने किरदारों में इमोशनल गहराई लाई है। फिल्म का वह सीन जिसमें दर्शकों को ‘दृश्यम’ की अहम चीज़ों जैसे ‘2 अक्टूबर’, ‘सत्संग’, ‘पाव भाजी’ की याद दिलाई जाती है, वह पुरानी यादें ताज़ा करने वाला है। और यह काफी हद तक असरदार भी है।

सबसे ज़रूरी बात यह है कि फिल्म विजय और उसके परिवार के एक साथ रहने की लड़ाई पर फोकस बनाए रखती है, जो ‘दृश्यम’ फ्रेंचाइजी की जान है।

‘दृश्यम 3’ में क्या कमी रह गई?
सबसे बड़ी समस्या जयदीप अहलावत का किरदार है। उनके आने से काफी उत्साह बनता है, खासकर इसलिए क्योंकि उन्हें विजय के एक मज़बूत नए दुश्मन के तौर पर पेश किया जाता है। लेकिन कहानी में उनके किरदार को उतनी गहराई नहीं दी गई है। किरदार की शुरुआत तो अच्छी होती है, लेकिन कहानी आगे बढ़ने के साथ उसमें दम नहीं रहता। आखिर में उनका किरदार उम्मीद के मुताबिक असरदार नहीं लगता, खासकर तब जब उसमें काफी गुंजाइश थी।

हम खास तौर पर उस सीन का ज़िक्र करना चाहेंगे जिसमें विजय की सुनवाई वाले दिन जयदीप को एक इमरजेंसी प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए बुलाया जाता है। यह कमज़ोर लेखन जैसा लगा क्योंकि मेकर्स कोर्ट में तोमर की मौजूदगी को सही ढंग से नहीं दिखा पाए, और फिर भी वह हार जाते हैं, खासकर तब जब उन्होंने शुरू में दावा किया था कि इस बार उनकी जांच सबूतों पर आधारित है।

कुछ हिस्से खिंचे हुए भी लगते हैं, खासकर तब जब फिल्म आखिरी टकराव की ओर बढ़ रही होती है। सस्पेंस तो दिलचस्प बना रहता है, लेकिन आखिर में मिलने वाला नतीजा हमेशा पहले हाफ में बनी उम्मीदों के बराबर नहीं होता।

क्या ‘दृश्यम 3’ का अंत मज़बूत है?
‘दृश्यम 3’ तब सबसे अच्छी लगती है जब यह विजय सलगांवकर पर फोकस करती है। अजय देवगन इस फ्रेंचाइजी का सबसे मज़बूत हिस्सा बने हुए हैं, और उनकी एक्टिंग फिल्म में इतना तनाव और इमोशन लाती है कि दर्शक जुड़े रहते हैं। अगर आप इसे सिर्फ विजय के सफर के तौर पर देखें तो फिल्म को 3 रेटिंग मिलनी चाहिए।

हालांकि, आखिरी चैप्टर होने के नाते, इसमें और भी बहुत कुछ हो सकता था। जयदीप के किरदार में आखिरी लड़ाई को और भी रोमांचक बनाने की क्षमता थी, लेकिन लेखन ने उनका पूरा इस्तेमाल नहीं किया। फिर भी, विजय के सफर को काफी सही विदाई मिलती है, भले ही फिल्म अपनी पिछली फिल्मों के स्तर तक पूरी तरह न पहुँच पाए।

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