इच्छामृत्यु पर न्यूयॉर्क का नया कानून, भारत में कितनी अलग है सम्मान के साथ मृत्यु की व्यवस्था?

इच्छामृत्यु पर न्यूयॉर्क का नया कानून, भारत में कितनी अलग है सम्मान के साथ मृत्यु की व्यवस्था?

Euthanasia In India: अरुणा शानबाग – वो नाम जिनकी वजह से भारत में इच्छा मृत्यु को लेकर बहस शुरू हुई। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं दी, लेकिन देश में पहली बार पैसिव इच्छामृत्यु को कुछ शर्तों के साथ मान्यता मिली। इसका मतलब है अगर डॉक्टर उचित समझें, तो गंभीर बीमारी से जूझ रहे और अचेत मरीज के इलाज को रोका जा सकता है या लाइफ सपोर्ट हटाया जा सकता है। भारत में केवल पैसिव इच्छामृत्यु की ही अनुमति है, जबकि दुनिया के कुछ देश लाइलाज बीमारी से पीड़ित को सम्मान के साथ दुनिया से विदाई का अधिकार देते हैं। अमेरिका के न्यूयॉर्क में इस साल अगस्त में इच्छामृत्यु से जुड़े नए कानून लागू हुए थे। तब से अब तक यानी करीब 1 महीने में राज्य में गंभीर रूप से बीमार करीब 20 लोगों को अपना जीवन समाप्त करने के लिए दवाओं के प्रिस्क्रिप्शन जारी किए जा चुके हैं। हालांकि, ये कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि कोलंबिया यूनिवर्सिटी के बायोएथिसिस्ट ने अनुमान लगाया है।

क्या है न्यूयॉर्क के नए कानून में?

न्यूयॉर्क के मेडिकल एड इन डाइंग एक्ट पर फरवरी 2026 में गवर्नर कैथी होचुल ने हस्ताक्षर किए थे। यह कानून 5 अगस्त से लागू हो गया। इसके साथ ही न्यूयॉर्क अमेरिका का 14वां ऐसा राज्य बन गया, जहां इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई है। इस कानून के तहत यदि किसी व्यक्ति को लाइलाज बीमारी है और उसकी अधिकतम 6 महीने में मृत्यु की आशंका है, तो वह डॉक्टर से जीवन समाप्त करने वाली दवा मांग सकता है। हालांकि, उसका मानसिक रूप से निर्णय लेने में सक्षम होना जरूरी है। इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए कई तरह के प्रावधान किए गए हैं। इसमें मरीज की मौखिक सहमति को रिकॉर्ड करना, दो गवाहों की मौजूदगी में लिखित अनुरोध देना, दो डॉक्टरों की सहमति, मरीज की मानसिक निर्णय क्षमता का अनिवार्य मूल्यांकन और पांच दिन की प्रतीक्षा अवधि शामिल है।

इस कानून की सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि मरीज को दवा खुद लेनी होगी। यानी डॉक्टर केवल दवा उपलब्ध करा सकता है। सीधे शब्दों में कहें तो नए कानून के तहत मानसिक रूप से सक्षम व्यक्ति खुद अपनी मौत चुनता है और अपनी इच्छा से उसे अमल में लाता है।

भारत में क्या है व्यवस्था?

वहीं, भारत में मृत्यु के अधिकार से संबंधित व्यवस्था संसद के बजाए न्यायपालिका के फैसलों के माध्यम से विकसित हुई है। अलग-अलग मामलों में आए अदालती फैसलों ने धीरे-धीरे इस अधिकार की सीमाएं और शर्तें तय की हैं। वर्ष 2011 में अरुणा शानबाग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाने की अनुमति को मान्यता दी थी। अरुणा मुंबई के KEM अस्पताल की नर्स थीं और करीब 42–43 साल तक बिस्तर पर अचेत अवस्था में पड़ी रहीं। इसके बाद मार्च 2018 में कॉमन कॉज बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि सम्मान के साथ मरने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का ही हिस्सा है। इसी फैसले में लिविंग विल यानी अग्रिम चिकित्सा निर्देशों को भी कानूनी मान्यता दी गई। इसके तहत कोई व्यक्ति पहले से यह निर्देश दे सकता है कि भविष्य में ऐसी स्थिति आने पर वह किन परिस्थितियों में लाइफ सपोर्ट हटाना चाहेगा।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के हरीश राणा को पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी. हरीश करीब 13 साल से बिस्तर पर बेहोशी की हालत में पड़े रहे। भारत में इस अधिकार की एक स्पष्ट सीमा है। यहां केवल निष्क्रिय यानी पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति है, जिसके तहत जीवन रक्षक उपचार को रोका या वापस लिया जा सकता है। एक्टिव इच्छामृत्यु और फिजिशयन-असिस्टेड सुसाइड अब भी अपराध की श्रेणी में आते हैं। यानी किसी व्यक्ति की मृत्यु सुनिश्चित करने के लिए उसे दवा या कोई अन्य पदार्थ देना अपने देश में कानूनी रूप से प्रतिबंधित है।

पैसिव और एक्टिव इच्छामृत्यु में अंतर?

पैसिव और एक्टिव इच्छामृत्यु के बीच का अंतर केवल कानूनी तकनीकी पहलू नहीं है, बल्कि यही भारत और दूसरे देशों की व्यवस्थाओं के बीच मूलभूत अंतर को स्पष्ट करता है। निष्क्रिय इच्छामृत्यु में जीवन रक्षक मशीनों या दवाओं को बंद करने अथवा उपचार रोकने की अनुमति दी जाती है। इसके बाद बीमारी अपनी स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ती है और मरीज की मृत्यु होती है। इसमें किसी दवा के जरिए मृत्यु को सीधे अंजाम नहीं दिया जाता। इसके विपरीत, न्यूयॉर्क में लागू कानून के तहत डॉक्टर ऐसी दवा लिख सकता है, जिसे मरीज अपनी इच्छा से खुद लेकर अपना जीवन समाप्त कर सकता है। मरीज अपनी मानसिक क्षमता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता के आधार पर यह तय करता है कि वह कब इस प्रक्रिया को पूरा करना चाहता है। इसके अलावा, एक और बड़ा अंतर है – मरीजों की परिस्थितियां। भारत की व्यवस्था मुख्य रूप से उन मरीजों से संबंधित है, जो अचेत अवस्था में हैं, निर्णय लेने में असमर्थ हैं या वेंटिलेटर जैसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर हैं। ऐसे मामलों में मरीज की पहले से लिखी गई लिविंग विल, परिवार, डॉक्टरों और मेडिकल बोर्ड की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

इसके विपरीत, न्यूयॉर्क का कानून ऐसे मरीजों के लिए बनाया गया है, जो मानसिक रूप से सक्षम हैं, अपनी स्थिति को समझते हैं और खुद अपनी मृत्यु का निर्णय लेते हैं। सीधे शब्दों में कहें तो भारत की व्यवस्था लाइफ सपोर्ट छोड़ने की अनुमति देने पर केंद्रित है, जबकि न्यूयॉर्क की व्यवस्था मरीज को अपनी इच्छा से मृत्यु की प्रक्रिया शुरू करने का विकल्प देती है। 

दुनिया में कहां-कहां है इच्छामृत्यु की अनुमति?

न्यूयॉर्क और भारत दुनिया के उस तेजी से बदलते कानूनी परिदृश्य के दो अलग-अलग उदाहरण हैं, जहां इच्छामृत्यु और चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु को लेकर कानूनों में बदलाव हो रहे हैं। दुनिया में अब ऐसे कई देश हैं, जहां चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु कानूनी है। हाल के वर्षों में इस दिशा में बदलाव की रफ्तार भी तेज हुई है। ऑस्ट्रेलिया के सभी राज्यों में स्वैच्छिक चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु को कानूनी मान्यता दी जा चुकी है। अगस्त 2026 में नॉर्दर्न टेरिटरी के भी इस व्यवस्था में शामिल होने के साथ यह प्रक्रिया पूरी हुई। न्यूजीलैंड में भी वर्ष 2021 से इसकी अनुमति है। इसी तरह, नीदरलैंड और बेल्जियम ने वर्ष 2002 में इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दी थी।

इनके अलावा लक्जमबर्ग, कनाडा, स्पेन, कोलंबिया और हाल ही में इक्वाडोर तथा उरुग्वे में भी इच्छामृत्यु की अनुमति है। इन देशों में डॉक्टर मरीज को मृत्यु सुनिश्चित करने वाली दवा दे सकता है। इनमें से कुछ देशों ने इस सुविधा को केवल लाइलाज बीमारी से जूझ रहे मरीजों तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि असहनीय और अपरिवर्तनीय पीड़ा से गुजर रहे लोगों को भी इसमें शामिल किया है। स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया और जर्मनी में आत्महत्या के लिए चिकित्सकीय सहायता की अनुमति है। वहीं, फ्रांस ने भी 2026 में इस संबंध में अपना कानून पारित किया है। दूसरी ओर, ब्रिटेन में अभी तक इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता नहीं मिली है। हालांकि, इंग्लैंड और वेल्स में इससे संबंधित विधेयक पर अब भी बहस जारी है।

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