सीएसजेएमयू के स्कूल आफ लाइफ साइंसेज एंड बायोटेक्नोलॉजी के एमएससी बायोटेक्नोलॉजी छात्र सुब्रत पाण्डेय ने मुंहासे रोकने के लिए गेंहू के भूसे ने नैनो जेल बनाया है। उनका शोध पत्र प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल फ्रंटियर इन मैटेरियल्स में प्रकाशित हुआ है। शोध में गेहूं के भूसे से प्राप्त लिग्निन नैनोपार्टिकल्स और पोस्टबायोटिक्स को मिलाकर मुंहासों के उपचार की दिशा में संभावित एंटीबायोटिक-मुक्त विकल्प विकसित किया गया है। ऐसे तैयार हुआ जेल छात्र ने बताया कि भूसे से मिले लिग्निन नैनोपार्टिकल्स को लैक्टिप्लांटिबैसिलस प्लांटारम से प्राप्त प्रोबायोटिक्स के साथ मिलाया गया। इसके बाद दोनों को एलोवेरा आधारित जेल फॉर्म्यूलेशन में शामिल किया गया। प्रयोगशाला स्तर पर किए गए परीक्षणों में इस फॉर्म्यूलेशन ने मुंहासों से जुड़े प्रमुख बैक्टीरिया क्यूटीबैक्टीरियम एक्नेस की वृद्धि को नियंत्रित करने की क्षमता दिखाई। बायोफिल्म बनने की प्रक्रिया पर भी असर शोध में बैक्टीरिया द्वारा बनाए जाने वाले बायोफिल्म पर भी फॉर्म्यूलेशन के प्रभाव का अध्ययन किया गया। बायोफिल्म ऐसी संरचना है, जो बैक्टीरिया को सतह पर टिके रहने और बाहरी परिस्थितियों के प्रति अधिक प्रतिरोधी बनने में मदद कर सकती है। अध्ययन में विकसित जेल ने बायोफिल्म के निर्माण को नियंत्रित करने की क्षमता प्रदर्शित की। इससे मुंहासों के उपचार के लिए नए विकल्पों पर आगे शोध की संभावनाएं सामने आई हैं। कृषि अपशिष्ट से तैयार की नैनो-सामग्री इस शोध की खास बात यह है कि इसमें गेहूं के भूसे जैसे कृषि अवशेष को उपयोगी नैनो-सामग्री में बदलने का प्रयास किया गया। इससे कृषि अपशिष्ट के वैल्यू एडिशन की संभावना के साथ नैनो-तकनीक और पोस्टबायोटिक्स के संयोजन से त्वचा संबंधी समस्याओं के लिए नए विकल्प तलाशने का रास्ता खुलता है। अभी इंसानों पर इस्तेमाल के लिए प्रमाणित नहीं शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि अध्ययन अभी प्रयोगशाला स्तर तक सीमित है। इसे मानव उपयोग के उपचार के रूप में स्थापित करने से पहले त्वचा के साथ इसकी अनुकूलता, फॉर्म्यूलेशन की स्थिरता, सक्रिय घटकों के त्वचा में प्रवेश और प्रभावों का विस्तृत अध्ययन जरूरी होगा। इसका ट्रायल अगले स्तर पर बढ़ाने की संभावना है।

