भारत को कम आय वाले मरीजों के लिए उन्नत जीनोमिक जांच और लक्षित कैंसर उपचार को सुलभ बनाने के लिए पांच वर्षीय नीतिगत एजेंडे की जरूरत है। यह बात देश की अग्रणी कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर भावना सिरोही ने कही। ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में शनिवार को सिरोही ने कहा कि ‘प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी’ में कैंसर के उपचार को बदलने की क्षमता है, लेकिन देश में इलाज की ऊंची लागत, उन्नत जीनोमिक जांच तक सीमित पहुंच और महंगी दवाएं अब भी बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।
रायपुर स्थित वेदांता मेडिकल रिसर्च फाउंडेशन-बाल्को मेडिकल सेंटर में कंसल्टेंट मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट और चिकित्सा निदेशक सिरोही, भारत की एकमात्र कैंसर विशेषज्ञ हैं जो ‘प्रिसिजन कैंसर केयर’ (कैंसर का लक्षित इलाज) पर गठित नई ‘लैंसेट ऑन्कोलॉजी कमीशन’ में शामिल हैं। इस कमीशन की शुरुआत शुक्रवार को हांगकांग में आयोजित विश्व कैंसर कांग्रेस में की गई। उन्होंने कहा कि भारत को कैंसर की लक्षित चिकित्सा मुहैया कराने के लिए पांच साल के एजेंडे की जरूरत है, जिसमें परीक्षण और तकनीक के फायदों तथा सीमाओं का नियमित मूल्यांकन किया जाए।
‘पीटीआई-भाषा’ को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि पारंपरिक कीमोथेरेपी इलाज के उलट, जो कैंसर वाली और सामान्य दोनों तरह की कोशिकाओं को प्रभावित कर सकता है, कैंसर के लक्षित इलाज के तहत कोशिकाओं पर एक खास लक्ष्य या बायोमार्कर की पहचान करके उसके अनुरूप सीटक दवा दी जाती है। उन्होंने कहा कि ‘प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी’ चिकित्सकों को कैंसर के जैविक कारणों की पहचान करने और उसी के अनुसार इलाज चुनने की सुविधा देती है, जिससे हर मरीज के लिए अलग-अलग तरह से इलाज करने और अनावश्यक दुष्प्रभाव को कम करते हुए बेहतर नतीजे पाने में मदद मिलती है। हालांकि, उन्होंने कहा कि ‘मॉलिक्यूलर टेस्टिंग’ और ‘नेक्स्ट-जेनरेशन सीक्वेंसिंग’ (एनजीएस) भी महंगी हो सकती हैं, जबकि ऐसे परीक्षण के आधार पर बताई गई दवाएं भारत में उपलब्ध नहीं भी हो सकती हैं या ज्यादातर मरीजों, खासकर कम और मध्यम आय वाले समूहों की आर्थिक पहुंच से बाहर हो सकती हैं।
उन्होंने कहा कि कैंसर विशेषज्ञ के सामने यह दुविधा होती है कि क्या वे ऐसे कुछ इलाज के बारे में बात करें जो बहुत ज्यादा महंगे हैं और ज्यादातर मरीजों की पहुंच से बाहर हैं। उन्होंने कहा कि ‘प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी’(मरीज के कैंसर की खास जैविक और आनुवंशिक विशेषताओं के आधार पर सबसे उपयुक्त उपचार का विकल्प चुनना) की सफलता खास तौर पर फेफड़ों के कैंसर में दिखती है, जहां खास ईजीएफआर म्यूटेशन वाले मरीजों का पारंपरिक कीमोथेरेपी के बजाय लक्षित गोलियों से इलाज किया जा सकता है। डॉक्टर सिरोही ने कहा, ‘‘फेफड़ों का कैंसर अब सिर्फ एक तरह का कैंसर नहीं रह गया है, बल्कि यह कई अलग-अलग तरह के कैंसर का समूह है और हर तरह के कैंसर के लिए ‘लक्षित थेरेपी’ का इस्तेमाल किया जाता है।’’
उन्होंने आगे कहा कि आयुष्मान भारत योजना के तहत ऐसा इलाज उपलब्ध है, लेकिन नई और अधिक असरदार दवाएं अपनी ज्यादा कीमत की वजह से अधिकतर लोगों की पहुंच से बाहर हैं।
डॉक्टर सिरोही ने कहा, ‘‘भारत में सभी तरह के कैंसर के इलाज में सटीक इलाज से फायदा हो सकता है, लेकिन इसे हर मरीज तक पहुंचाना एक चुनौती है।’’
जब उनसे पूछा गया कि भारत कैसे जीनोमिक टेस्टिंग और मॉलिक्यूलर प्रोफाइलिंग को मरीजों के लिए सस्ता और आसान बना सकता है, तब डॉक्टर सिरोही ने जीनोमिक और मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक टेस्ट को सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में शामिल करने की बात कही। उन्होंने कहा कि हालांकि एर्लोटिनिब और ट्रैस्टुज़ुमैब जैसी लक्षित दवाएं आयुष्मान भारत योजना के दायरे में आती हैं, लेकिन उन मरीजों की पहचान करने के लिए जरूरी जांच का खर्च इसमें शामिल नहीं है, जिन्हें इन दवाओं से फायदा हो सकता है। उन्होंने कहा, कम आय वाले मरीजों के लिए आयुष्मान भारत जैसी स्वास्थ्य योजनाओं में डायग्नोस्टिक जीनोमिक पैनल को शामिल करना बहुत जरूरी है।
सिरोही ने डायमंड्स परियोजना का भी ज़िक्र किया, जिसे स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद का समर्थन प्राप्त है। इस परियोजना का मकसद ‘एडवांस्ड मॉलिक्यूलर ऑन्कोलॉजी डायग्नोस्टिक’ सेवाओं को मजबूत करना और मुफ्त डायग्नोस्टिक सेवाएं उपलब्ध कराना है। उन्होंने कहा कि यह पहल एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन अभी यह मुख्य रूप से फेफड़ों और स्तन कैंसर तथा कुछ तरह के रक्त कैंसर के लिए चुने गए मार्कर्स पर केंद्रित है।
इसके लिए तय क्षेत्रीय प्रयोगशालाएं ज्यादातर ‘रियल-टाइम पीसीआर’ और ‘इम्यूनोहिस्टोकेमिस्ट्री’ जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करती हैं। उन्होंने कहा, ये तकनीकें सिंगल-बायोमार्कर का पता लगाने के लिए तो उपयोगी हैं, लेकिन ‘नेक्स्ट-जेनरेशन सीक्वेंसिंग’ के मुकाबले कमजोर हैं। उन्होंने कहा कि यदि मरीजों को सुझाई गई दवाएं नहीं मिल पाती हैं, तो ‘उन्नत जीनोमिक जांच’ कराने से उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है।
डॉक्टर सिरोही ने कहा, यदि हमारे मरीज इन परीक्षण से सुझाई गई दवाएं नहीं खरीद सकते या उन तक उनकी पहुंच नहीं है, तो नेक्स्ट-जेनरेशन सीक्वेंसिंग या मॉलिक्यूलर प्रोफाइलिंग कराने का कोई फायदा नहीं है। उन्होंने कहा, भारत को सटीक कैंसर देखभाल देने के लिए पांच साल के एजेंडा की जरूरत है, जिसमें परीक्षण और तकनीक के फायदे और नुकसान का साफ आकलन हो। जो परीक्षण और तकनीक सभी के लिए उपलब्ध कराई जानी हैं, उन्हें प्रमाणित किया जाना चाहिए और उन्हें वैश्विक और नेशनल पीयर-रिव्यू स्टैंडर्ड्स पर खरा उतरना चाहिए।
सिरोही ने छत्तीसगढ़ में कैंसर के इलाज के बारे में कहा कि राज्य की ग्रामीण और आदिवासी आबादी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जैसे गरीबी, लंबी दूरी की यात्रा, बड़े शहरों के अस्पतालों पर भरोसा न होना और खास इलाज तक ठीक से पहुंच न होना। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में सिकल सेल बीमारी, थैलेसीमिया और हीमोफिलिया का भी काफी बोझ है, जबकि कैंसर एक और बड़ी स्वास्थ्य समस्या है। सिरोही ने राज्य सरकार के कैंसर को नोटिफिएबल बीमारी (जिसकी जानकारी सरकार को देना जरूरी हो) बनाने के फैसले का स्वागत किया।
उन्होंने कहा कि इससे बीमारी के असली बोझ का पता लगाने में मदद मिलेगी और नीति बनाने वालों को स्तन, फेफड़े, सर्वाइकल, मुंह और पेट के कैंसर जैसे प्रमुख कैंसर पर ध्यान केंद्रित करने में आसानी होगी। चिकित्सक ने कहा कि कैंसर से बचाव और शुरुआती दौर में ही बीमारी का पता लगाने को ज्यादा प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सिरोही ने बताया कि बालको मेडिकल सेंटर ने हाल ही में राज्य सरकार के साथ मिलकर सर्वाइकल कैंसर को खत्म करने का एक प्रोग्राम भी शुरू किया है।

