अग्नि में तपकर ही स्वर्ण बनेगी आत्मा : शास्त्री रितेश

अग्नि में तपकर ही स्वर्ण बनेगी आत्मा : शास्त्री रितेश

भास्कर न्यूज | जालंधर श्री दिगम्बर जैन मंदिर जालंधर कैंट में श्री दिगम्बर जैन सभा द्वारा आयोजित पर्वाधिराज दशलक्षण महापर्व एवं अनन्त चौदस महोत्सव श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। महापर्व के सातवें दिन ‘तप’ की आराधना श्रद्धा के साथ की। श्रद्धालुओं को संबोधित करते शास्त्री रितेश जैन ने कहा कि सातवें दिन ‘उत्तम तप’ धर्म की भक्तिभाव से आराधना की गई। धर्मसभा में शास्त्री रितेश ने कहा कि इच्छाओं का पूर्ण निरोध और संयम ही सच्चा तप है। जब तक जीव सांसारिक आसक्तियों और असीमित इच्छाओं पर अंकुश नहीं लगाएगा, तब तक आत्म-कल्याण संभव नहीं है। शास्त्री ने ‘इच्छानिरोधस्तपः’ का सूत्र देते समझाया कि तप केवल शरीर को सुखाने या भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि अपनी मन की वासनाओं और सांसारिक तृष्णाओं को रोकना असली तपस्या है। जैसे कच्चे सोने को भट्टी की अग्नि में तपाकर कुंदन बनाया जाता है, ठीक उसी तरह तप वह पवित्र अग्नि है, जिसमें जलकर आत्मा अपने समस्त पुराने कर्मों का नाश (निर्जरा) करती है। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते कहा कि अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर संयम रखकर ही आत्मा अपने शुद्ध और स्वर्ण के समान चमकते स्वरूप को प्राप्त कर सकती है। इस दौरान बड़ी संख्या में जैन समाज के प्रबुद्धजनों ने व्रत-उपवास रखकर उत्तम तप धर्म की आराधना की। शास्त्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपनी इंद्रियों को संयमित करें और तप को मात्र एक नियम न मानकर आत्म-कल्याण का सशक्त माध्यम बनाएं। यहां पर अनूप जैन, नीरज जैन, अशोक जैन, रजत जैन, रंजन जैन, विशाल जैन, दीपक जैन, अरिहंत जैन, सौरभ जैन, हर्षित जैन, विपिन जैन और अन्य श्रद्धालु उपस्थित थे।

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