पश्चिम एशिया तनाव से भारत आने वाले Oil Tankers का किराया 150 Percent बढ़कर 2.5 लाख Dollar हुआ

पश्चिम एशिया तनाव से भारत आने वाले Oil Tankers का किराया 150 Percent बढ़कर 2.5 लाख Dollar हुआ

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब भारत के लिए कच्चा तेल लाने की लागत पर भी साफ दिखाई देने लगा है। भारत आने वाले तेल टैंकरों का रोजाना किराया करीब दो सप्ताह में बढ़कर 2.5 लाख डॉलर तक पहुंच गया है। यह दर पहले लगभग एक लाख डॉलर थी। यानी टैंकर किराये में करीब 150 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इससे दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक भारत की चिंता बढ़ गई है।

मौजूद जानकारी के अनुसार, यमन के मोखा बंदरगाह पर हूती बलों के कब्जे और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य की ओर उनकी बढ़ती गतिविधियों के बाद समुद्री परिवहन की स्थिति तेजी से बदली है। जहाजों के लिए लाल सागर और होर्मुज स्ट्रेट से गुजरना पहले की तुलना में ज्यादा जोखिम भरा हो गया है। इसका सीधा असर जहाजों के किराये, ईंधन और बीमा लागत पर पड़ा है।

भारतीय राष्ट्रीय जहाज मालिक संघ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अनिल देवली ने कहा कि पिछले एक सप्ताह में स्थिति पूरी तरह बदल गई है। उनके अनुसार, नाविक अब होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते जाने को लेकर चिंतित हैं। पहले कुछ जहाजों की आवाजाही हो रही थी, लेकिन अब हमलों और जहाजों के डूबने तथा नाविकों की मौत की खबरों के कारण आवाजाही लगभग रुक गई है।

बता दें कि करीब दो महीने पहले भारत आने वाले तेल टैंकरों का किराया 70 से 80 हजार डॉलर प्रतिदिन तक नीचे आ गया था। अब इसमें जबरदस्त उछाल आया है। इसके साथ ही जहाजों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन की कीमत भी करीब 50 प्रतिशत बढ़कर 900 डॉलर प्रति टन हो गई है। समुद्री बीमा की लागत में भी लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। युद्ध जोखिम के लिए लिया जाने वाला अतिरिक्त बीमा शुल्क पहले से ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है।

इस संकट का भारत पर असर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी जरूरत के बड़े हिस्से के लिए विदेशों से कच्चा तेल खरीदता है। पश्चिम एशिया से भारत के मौजूदा तेल और गैस आयात का करीब 30 प्रतिशत हिस्सा आता है। यदि बाब-अल-मंदेब में स्थिति और बिगड़ती है तो सऊदी अरब से आने वाले तेल टैंकरों को लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते लंबा चक्कर लगाना पड़ सकता है। इससे यात्रा में करीब दो सप्ताह अतिरिक्त लग सकते हैं और परिवहन लागत और बढ़ सकती है।

गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत पहले ही करीब चार महीने के उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है। ब्रेंट कच्चा तेल करीब 105 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि कच्चे तेल की कीमत में प्रत्येक एक डॉलर की बढ़ोतरी से देश के सालाना आयात बिल पर करीब 18,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।

महंगाई पर भी इसका असर पड़ने की आशंका है। जुलाई में भारत की खुदरा महंगाई 4.45 प्रतिशत पर पहुंच गई थी, जो 19 महीनों का उच्च स्तर था। ऐसे में तेल और परिवहन लागत में लगातार बढ़ोतरी अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौती खड़ी कर सकती है।

इस वित्त वर्ष के अप्रैल से जुलाई के बीच भारत का कच्चे तेल का आयात बिल पहले ही 63.37 अरब डॉलर पहुंच चुका है, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 56 प्रतिशत अधिक है। पिछले पूरे वित्त वर्ष में भारत का कुल तेल आयात बिल करीब 123 अरब डॉलर रहा था। नौ सितंबर को भारतीय कच्चे तेल की औसत कीमत 115.98 डॉलर प्रति बैरल दर्ज की गई थी।

एक तेल शोधन कंपनी के अधिकारी ने कहा कि पश्चिम एशिया में बनी अनिश्चितता आपूर्ति में सुधार की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। वहीं संयुक्त अरब अमीरात स्थित लॉजिस्टिक्स कंपनी डीपी वर्ल्ड के एक अधिकारी के मुताबिक होर्मुज स्ट्रेट के आसपास जहाजों की आवाजाही बेहद सीमित है और जो जहाज आगे बढ़ रहे हैं, उन्हें भारी युद्ध जोखिम शुल्क देना पड़ रहा है।

केंद्र सरकार ने मई में भारत समुद्री बीमा पूल भी शुरू किया था। इसके तहत 1.5 अरब डॉलर की व्यवस्था और 1.4 अरब डॉलर की सरकारी गारंटी दी गई है, ताकि समुद्री बीमा की उपलब्धता बनी रहे। हालांकि, एक भारतीय शिपिंग कंपनी के अधिकारी के अनुसार प्रभावित मार्गों पर फिलहाल भारतीय जहाज चल ही नहीं रहे हैं, इसलिए इस बीमा सुविधा का इस्तेमाल भी सीमित है।

ऐसे में पश्चिम एशिया के समुद्री मार्गों पर तनाव लंबा खिंचने पर भारत के सामने महंगे तेल, बढ़ती परिवहन लागत और महंगाई का दबाव एक साथ बढ़ने की आशंका है।

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