Delhi High Court ने बस कंडक्टर से 32 साल केस लड़ने पर DTC पर लगाया 1 लाख का जुर्माना

Delhi High Court ने बस कंडक्टर से 32 साल केस लड़ने पर DTC पर लगाया 1 लाख का जुर्माना

नयी दिल्ली, पांच सितंबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने 17 महीने के बकाया वेतन के भुगतान को लेकर एक बस परिचालक के खिलाफ 32 साल तक मुकदमा लड़ने के लिए दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) पर एक लाख रुपये का हर्जाना लगाया है। अदालत ने डीटीसी की इस लंबी मुकदमेबाजी को कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया। न्यायमूर्ति अमित महाजन ने परिचालक के पक्ष में औद्योगिक न्यायाधिकरण के 2004 के आदेश के खिलाफ डीटीसी की अपील खारिज करते हुए कहा कि ‘असाधारण रूप से इतने लंबे समय’ तक विभाग द्वारा मुकदमा जारी रखना सार्वजनिक धन का ऐसा खर्च था, जिसे टाला जा सकता था।

न्यायाधीश ने दो सितंबर को पारित आदेश में कहा कि डीटीसी को यह हर्जाना उस अधिकारी से वसूलने की छूट है, जो इस ‘मामूली विवाद’ को इतने लंबे समय तक आगे बढ़ाने के लिए जिम्मेदार था। यह मामला नवंबर 1994 की एक घटना से जुड़ा है। आरोप था कि बस परिचालक ने तीन यात्रियों से 67 रुपये का निर्धारित किराया लेने के बावजूद उन्हें टिकट नहीं दिया।

न्यायमूर्ति महाजन ने आदेश में कहा, ‘‘दावे की सीमित प्रकृति के बावजूद जिस तरह से मौजूदा कार्यवाही को आगे बढ़ाया गया है, वह संबंधित अधिकारियों पर हर्जाना लगाने को उचित ठहराता है।’’
आदेश में कहा गया, ‘‘तदनुसार, एक लाख रुपये का हर्जाना याचिकाकर्ता विभाग द्वारा अदा किया जाएगा। इसमें से 25,000 रुपये डीएचएलएससी (दिल्ली उच्च न्यायालय विधि सेवा समिति), 50,000 रुपये प्रधानमंत्री राहत कोष और 25,000 रुपये प्रतिवादी (परिचालक) को दिए जाएंगे।”
कथित घटना के बाद परिचालक को निलंबित कर दिया गया था। हालांकि, जांच अधिकारी ने उसके पक्ष में फैसला दिया, लेकिन अनुशासनात्मक प्राधिकारी इससे सहमत नहीं थे और परिचालक को सेवा से हटाने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया।

इसके बाद अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने परिचालक को अगस्त 1996 से प्रभावी रूप से सेवा से बर्खास्त कर दिया। हालांकि, डीटीसी के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक ने अपील पर इस बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया। वर्ष 1998 में डीटीसी के अध्यक्ष ने निर्देश दिया कि परिचालक को बिना बकाया वेतन (बैक वेजेज) और कम वेतनमान पर दोबारा सेवा में बहाल किया जाए।

इसके बाद यह मामला औद्योगिक न्यायाधिकरण के पास पहुंचा, जिसने वर्ष 2004 में यह माना कि दी गई सजा गैर-कानूनी और बिना किसी आधार के थी। न्यायाधिकरण की राय थी कि परिचालक अपने नियमित वेतनमान के हिसाब से वेतन पाने का हकदार था और उसे अगस्त 1996 से जनवरी 1998 तक के नियमित वेतन के साथ-साथ कम किए गए वेतन का बकाया भी मिलना चाहिए था। न्यायाधिकरण के इस फैसले के खिलाफ डीटीसी ने अपील की थी।

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