चेन्नई, तीन सितंबर तमिलनाडु विधानसभा ने बृहस्पतिवार को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा पेश किए गए उस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित कर दिया, जिसमें केंद्र सरकार से मद्रास उच्च न्यायालय की प्रमुख के रूप में तमिल को मान्यता देने का आग्रह किया गया है। मुख्यमंत्री द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव में कहा गया है कि यह प्रस्ताव किसी भी के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा, ‘‘भारत का संविधान संघीय व्यवस्था के सिद्धांत को कायम रखते हुए और भारत के बहुभाषी तथा बहुसांस्कृतिक स्वरूप को मान्यता देते हुए, राज्यों को अपनी-अपनी आधिकारिक भाषाओं के इस्तेमाल के लिए विभिन्न कानूनी रास्ते उपलब्ध कराता है।’’
विजय ने कहा, ‘‘तमिलनाडु विधानसभा सर्वसम्मति से केंद्र सरकार से आग्रह करती है कि मद्रास उच्च न्यायालय की प्रमुख के रूप में तमिल के इस्तेमाल को सुगम बनाने के लिए तत्काल आवश्यक कदम उठाए जाएं।’’
प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान विधायकों ने लंबे समय से इस मांग को उठाये जाने का उल्लेख किया और इस संबंध में अपने-अपने नेताओं द्वारा की गई पहल और प्रयासों को भी याद किया।
मुख्य विपक्षी दल द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) सहित प्रमुख राजनीतिक दलों के विधायकों ने प्रस्ताव का समर्थन करते हुए सदन में अपनी बात रखी। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष जे. सी. डी. प्रभाकर ने घोषणा की कि प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया है। अन्नाद्रमुक के पूर्व मंत्री सी. वी. षणमुगम ने कहा कि मद्रास उच्च न्यायालय का नाम बदलकर तमिलनाडु उच्च न्यायालय किया जाना चाहिए।
द्रमुक के ई. वी. वेलु ने भी इसी तरह की मांग की। षणमुगम ने ‘‘उत्तर-दक्षिण’’ विभाजन का आरोप लगाते हुए कहा कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों को अपने-अपने उच्च न्यायालय में हिंदी के इस्तेमाल की अनुमति दी गई है। हालांकि, मद्रास उच्च न्यायालय में तमिल के इस्तेमाल की मांग को मंजूरी नहीं दी गई है।
द्रमुक के एस. रेगुपति ने कहा कि पार्टी के नेता दिवंगत एम. करुणानिधि ने ही उच्च न्यायालय की के रूप में तमिल को मान्यता दिलाने के प्रयास शुरू किए थे। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार के कार्यकाल में उच्च न्यायालय में तमिल के इस्तेमाल के पक्ष में दो बार प्रस्ताव पारित किए गए थे। कानून मंत्री आर. निर्मल कुमार ने कहा कि यह पहली बार है जब किसी प्रस्ताव में तमिल को उच्च न्यायालय की प्रमुख का दर्जा देने की मांग की गई है।
हालांकि, रेगुपति ने दोहराया कि उनकी पार्टी के नेतृत्व वाली सरकारें उच्च न्यायालय में तमिल के इस्तेमाल के पक्ष में लगातार आवाज उठाती रही हैं। तमिल को उच्च न्यायालय की प्रमुख का दर्जा देने की मांग वाले प्रस्ताव में तमिल को शास्त्रीय का दर्जा प्राप्त होने, तमिल में कानूनी शब्दावली के क्षेत्र में हुई महत्वपूर्ण प्रगति और तकनीक आधारित अनुवाद जैसी सुविधाओं का भी उल्लेख किया गया है। प्रस्ताव में एक ऐसी व्यवस्था बनाने की मांग की गई है, जिसके तहत उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए सभी फैसले और न्यायिक आदेश तमिल में भी उपलब्ध कराए जाएं।
प्रस्ताव में इस बात पर जोर दिया गया कि तमिल दुनिया की प्राचीन भाषाओं में से एक है, जिसकी व्याकरणिक और साहित्यिक विरासत कई हजार वर्षों से चली आ रही है। इसमें केंद्र सरकार से उच्च न्यायालय की के रूप में तमिल के इस्तेमाल की अनुमति देने का आग्रह किया गया है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 348(1)(ए) के अनुसार, उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय की सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी में होंगी।
हालांकि, किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उस राज्य में मुख्य पीठ वाले उच्च न्यायालय की कार्यवाही में हिंदी या राज्य के किसी अन्य आधिकारिक कार्यों में इस्तेमाल होने वाली के उपयोग को अधिकृत कर सकता है। कैबिनेट समिति के 21 मई 1965 के निर्णय में यह प्रावधान किया गया था कि उच्च न्यायालय में अंग्रेजी के अलावा किसी अन्य के इस्तेमाल से संबंधित किसी भी प्रस्ताव पर भारत के प्रधान न्यायाधीश की सहमति लेनी होगी।

