India Pakistan Water Dispute: सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद गहराता जा रहा है। दरअसल, भारत ने सिंधु जल संधि पर हेग स्थित ‘परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ के फैसले को सिरे से खारिज कर दिया है। भारत ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि इस मध्यस्थता अदालत को भारत के संप्रभु फैसलों पर आदेश देने का कोई अधिकार नहीं है। इस पर अब पाकिस्तान की पूर्व विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार और मौजूदा डिप्टी पीएम इशाक डार की प्रतिक्रिया सामने आई है।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन की ओर से जारी मीडिया रिलीज को शेयर किया और भारत के रुख की कड़ी आलोचना की। पाकिस्तान की पूर्व विदेश मंत्री ने कहा, ‘भारत की मनमानी कार्रवाइयां अंतरराष्ट्रीय कानून या किसी भी अदालत की जांच के सामने कभी टिक नहीं सकतीं। सिंधु जल संधि को न तो मनमाने ढंग से रद्द किया जा सकता है, न समाप्त किया जा सकता है और न ही दरकिनार किया जा सकता है। कोई भी सामान्य देश ऐसी स्थिति को शर्मनाक मानता और शायद अपनी नीति में सुधार करने पर विचार करता।’
इशाक डार बोले- ‘अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध’
पाकिस्तान के डिप्टी प्राइम मिनिस्टर इशाक डार ने परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के फैसले का स्वागत किया। उन्होंने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, ‘पाकिस्तान ने कहा कि यह फैसला भारत की उस गैरकानूनी कोशिश को स्पष्ट रूप से खारिज करता है, जिसके तहत भारत ने सिंधु जल संधि को ‘स्थगित’ करने की कोशिश की थी। फैसले में दोहराया गया है कि सिंधु जल संधि दोनों पक्षों पर पूरी तरह लागू और बाध्यकारी है। इस फैसले से पाकिस्तान के उस लगातार कायम रुख की पुष्टि हुई है कि किसी बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि को एकतरफा तरीके से न तो निलंबित किया जा सकता है और न ही खत्म किया जा सकता है।’
उन्होंने इसी पोस्ट में आगे लिखा, ‘पाकिस्तान ने कहा कि भारत को संधि के तहत अपनी सभी जिम्मेदारियों और उसके विवाद निपटारा तंत्र के बाध्यकारी फैसलों का पूरी तरह पालन करना होगा। पाकिस्तान ने कहा कि वह सिंधु जल संधि के तहत अपने अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इंशाअल्लाह!’
हेग स्थित कोर्ट ने क्या कहा?
हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने कहा है कि सिंधु जल संधि अभी भी पूरी तरह लागू है। भारत को इसके तहत अपनी जिम्मेदारियां निभानी होंगी। कोर्ट के मुताबिक, पश्चिमी नदियों पर भारत की पनबिजली परियोजनाओं के डिजाइन और संचालन को भी संधि के नियमों का पालन करना होगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि वर्ल्ड बैंक द्वारा नियुक्त निष्पक्ष विशेषज्ञ जुलाई 2027 तक यह तय करेगा कि हिमालयी क्षेत्र में प्रस्तावित हाइड्रो प्रोजेक्ट संधि के अनुरूप है या नहीं। रातले परियोजना को लेकर कोर्ट ने भारत पर अस्थायी पाबंदी लगाते हुए विशेषज्ञ के फैसले के 90 दिन बाद तक निर्माण सीमित रखने को कहा।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?
हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के फैसले को भारत ने सख्ती से खारिज कर दिया। भारत ने कोर्ट के अधिकार क्षेत्र और उसके फैसले को कानूनी रूप से अमान्य बताया है।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत ने इस मध्यस्थता पैनल को कभी मान्यता नहीं दी और न ही इसकी कार्यवाही में हिस्सा लिया। इसलिए भारत इसके किसी भी फैसले को मानने के लिए बाध्य नहीं है। नई दिल्ली ने एक बार फिर दोहराया कि सिंधु जल संधि फिलहाल स्थगित है।

