महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मराठा आरक्षण की मांग को लेकर अनशन कर रहे कार्यकर्ता मनोज जरांगे से रविवार को संपर्क किया। उन्होंने यह कदम ऐसे समय उठाया जब जरांगे ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार 12 सितंबर तक सभी योग्य मराठाओं के लिए कुनबी (अन्य पिछड़ा वर्ग) जाति प्रमाण पत्र की उनकी मांग पर कार्रवाई नहीं करती है, तो वह मुंबई तक मार्च करेंगे। फडणवीस ने कहा कि सरकार उन मांगों पर चर्चा करने के लिए तैयार है जो कानूनी रूप से सही और संवैधानिक हों, और जिनसे उच्चतम न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन न होता हो।
जालना जिले के अंतरवाली सराटी गांव में चल रही अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के दूसरे दिन, जरांगे ने मराठवाड़ा क्षेत्र के परभणी शहर में आयोजित एक किसान कार्यक्रम को लेकर उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे (जो मराठा समुदाय से हैं), बागी शिवसेना सांसद संजय जाधव और राज्य मंत्री संजय शिरसाट पर निशाना साधा। फडणवीस ने नागपुर में संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि सरकार के प्रतिनिधि प्रदर्शनकारियों की मांगों पर चर्चा के लिए परभणी कार्यक्रम में शामिल हो रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘‘पहले भी हमने उनकी समस्याओं के समाधान का रास्ता निकाला था और हम उनकी मांगों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
इसी तरह, एकनाथ शिंदे भी शुरू से ही इन मुद्दों को लेकर बहुत संवेदनशील रहे हैं।’’
मुख्यमंत्री ने सरकार की प्रतिबद्धताओं को रेखांकित किया और कहा कि उन मांगों पर चर्चा और समाधान किया जाएगा जो कानूनी रूप से व्यवहार्य और संवैधानिक रूप से वैध हों, तथा उच्चतम न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन न करती हों। इससे पहले दिन में, परभणी की घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए जरांगे ने इस कार्यक्रम के आयोजन की जरूरत पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम मराठा समुदाय का मखौल उड़ाने के लिए आयोजित किया गया था।
परभणी के कार्यक्रम का विरोध करते हुए जरांगे ने दावा किया कि उन्होंने सांसद जाधव से स्पष्टीकरण मांगा है। जरांगे ने शिरसाट पर निशाना साधते हुए दावा किया कि अर्हता के अनुरूप जारी किये गए जाति प्रमाण-पत्र रद्द कर दिए गए, जिससे मराठा समुदाय के लोगों को परेशानी हुई। उन्होंने सवाल किया, ‘‘आप क्यों शिंदे को यहां हमें अपमानित करने के लिए ला रहे हैं?
किसानों के नाम पर यह कार्यक्रम अभी क्यों किया जा रहा है? इसे बाद में भी आयोजित किया जा सकता था।’’
जरांगे मराठा आरक्षण के मुद्दे पर कई बार अनशन कर चुके हैं। वह पात्र मराठों को ‘कुनबी’ के तौर पर मान्यता देने की मांग कर रहे हैं।
कुनबी एक कृषक समुदाय है, जिसे ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ (ओबीसी) श्रेणी के तहत शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिलता है। अपने आंदोलन के दूसरे दिन पत्रकारों से बातचीत में जरांगे ने कहा, ‘‘महाराष्ट्र सरकार को सभी मराठों को कुनबी घोषित करना चाहिए।’’
जरांगे ने कहा कि अगर सरकार ने उनकी मांगें नहीं मानीं, तो वह मुंबई तक मार्च करेंगे और आंदोलन तेज करेंगे। उन्होंने बताया कि उनके नेतृत्व में मराठा समुदाय की कोर कमेटी की बैठक 12 सितंबर को अंतरवाली सराटी में होगी, जिसमें मुंबई में भूख हड़ताल करने को लेकर फैसला लिया जाएगा।
सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा, ‘‘अगर सरकार 12 सितंबर तक हमारी मांगें मान लेती है, तो मुंबई में प्रस्तावित अनशन करने की कोई जरूरत नहीं होगी।’’
जरांगे की मांग है कि मराठा समुदाय के पात्र सदस्यों को 58 लाख ऐतिहासिक रिकॉर्ड के आधार पर तत्काल कुनबी प्रमाणपत्र जारी किए जाएं। उन्होंने कहा कि समुदाय अब इसके लिए और समय देने को तैयार नहीं है। उन्होंने यह भी मांग की है कि जाति प्रमाणपत्रों का सत्यापन रोक दिया जाए, क्योंकि जिन मामलों में ऐतिहासिक रिकॉर्ड उपलब्ध हैं, उनमें सत्यापन की कोई जरूरत नहीं है।
सामाजिक कार्यकर्ता ने राज्य सरकार से सातारा गजट के आधार पर आरक्षण देने, पूरे महाराष्ट्र में आरक्षण आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी पुलिस मामले वापस लेने और पिछले आंदोलनों के दौरान जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को सरकारी नौकरी और आर्थिक मुआवजा देने की भी मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि मराठा समुदाय के सदस्यों के जाति प्रमाणपत्र रद्द कर दिए गए हैं और वह इस मुद्दे पर चुप नहीं बैठेंगे। उन्होंने कहा, ‘‘मैं किसी पर हमला नहीं करता।
लेकिन हमारे मराठा समुदाय के लोगों के वैध जाति प्रमाणपत्र रद्द कर दिए गए हैं। इसलिए इस कार्यक्रम को तुरंत रद्द कर दें, वरना मैं भी वहां पहुंच जाऊंगा।’’
इस बीच, मराठा क्रांति मोर्चा के राज्य समन्वयक डॉ. संजय लाखे पाटिल ने दावा किया कि महाराष्ट्र के मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटिल ने सुझाव दिया है कि जाति सत्यापन समितियों की जरूरत नहीं है, क्योंकि देश के अन्य हिस्सों में ऐसी समितियां मौजूद नहीं हैं। लाखे पाटिल ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि इससे मराठा युवाओं और अन्य समुदायों के लोगों में भ्रम और नाराजगी पैदा हो सकती है।
उन्होंने इस कथित सुझाव को ‘‘चौंकाने वाला, असंवैधानिक और गैरकानूनी’’ बताते हुए कहा कि जाति जांच समितियों की व्यवस्था केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। उन्होंने उच्चतम न्यायालय के एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें जाति और जनजाति प्रमाणपत्रों के सत्यापन के लिए स्वतंत्र जांच समितियां गठित करने के निर्देश दिए गए थे। पच्चीस अगस्त को जारी सरकारी प्रस्ताव के अनुसार, बंबई उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश संदीप शिंदे की अध्यक्षता वाली समिति का कार्यकाल अब 30 जून 2027 तक बढ़ा दिया गया है, जो 30 जून 2026 को समाप्त हो गया था।
सरकारी प्रस्ताव में कहा गया है कि कुछ जिलों में मराठा-कुनबी वंशावली का पता लगाने का काम अभी पूरा नहीं हुआ है। इसलिए समिति को अपना काम पूरा करने के लिए और समय देना जरूरी था।

