Nepal Flash Flood: क्या नेपाल विनाशकारी बाढ़ से बच सकता था? अगर बचना संभव नहीं था तो क्या जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकता था? ये सवाल इसलिए पूछा जा रहा है, क्योंकि करीब 5 महीने पहले ही चेतावनी दी गई थी कि हिमालय के ऊपरी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण सैलाब आ सकता है। दो रिसर्च रिपोर्ट्स में कहा गया था कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण ग्लेशियर झीलें बादलों की तरह फट सकती हैं। लेकिन शायद इन रिपोर्ट्स को गंभीरता से नहीं लिया गया।
इन रिपोर्टों को इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के लिए अंतरराष्ट्रीय केंद्र (ICIMOD) ने प्रकाशित किया था। यह हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र के रहवासियों के हित में काम करने वाला एक अंतर-सरकारी ज्ञान और अध्ययन केंद्र है। रिपोर्टों में ग्लेशियरों की बर्फ तेजी से घटने की ओर ध्यान दिलाया गया था और बताया गया था कि वर्ष 2000 के बाद बर्फ पिघलने की दर दोगुनी हो गई है।
काठमांडू में है मुख्यालय
ICIMOD का मुख्यालय काठमांडू में है। इसके क्षेत्रीय सदस्य देशों में भारत, नेपाल, भूटान और चीन सहित कई अन्य देश शामिल हैं। अब इन चेतावनियों पर चर्चा शुरू हो गई है, क्योंकि नेपाल अपनी हिमालयी सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ से जूझ रहा है। यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि क्या ग्लेशियरों के पिघलने और अस्थिर ग्लेशियर झीलों से जुड़े खतरों का पहले से पर्याप्त आकलन किया गया था? नेपाल की बाढ़ में लगभग 500 लोगों के जान गंवाने की खबर सामने आई है। जबकि सैकड़ों लापता हैं, जिनकी तलाश के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया जा रहा है।
क्या है रिपोर्ट में?
ICIMOD की – ‘1990 से 2020 तक हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों की बदलती गतिशीलता और HKH ग्लेशियर आउटलुक 2026: हिमालयी ग्लेशियरों की 50 वर्षों की निगरानी से प्राप्त निष्कर्ष’ शीर्षक वाली रिपोर्टों में चेतावनी दी गई थी कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण बर्फ घटने की दर वर्ष 2000 के बाद दोगुनी हो गई है। 1975 के बाद से बर्फ की मोटाई में कुल 27 मीटर तक की कमी आई है। रिपोर्ट में हिमालय के निचले क्षेत्रों में रहने वाले करीब दो अरब लोगों के भविष्य लेकर भी चिंता जताई गई है। ICIMOD की रिपोर्ट बताती है कि 1990 से 2020 के बीच ऊपरी हिमालय के ग्लेशियर अपने कुल क्षेत्रफल का लगभग 12% और अनुमानित बर्फ भंडार का करीब 9% खो चुके हैं। ICIMOD के रिमोट सेंसिंग विश्लेषक सुदन बिकाश महार्जन (Sudan Bikash Maharjan) का कहना है कि इससे ग्लेशियर झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ जैसे खतरों की तीव्रता बढ़ गई है। उन्होंने यह भी कहा कि खतरा इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि इस क्षेत्र के तीन-चौथाई ग्लेशियर बेहद संवेदनशील श्रेणी में आते हैं।
इस वजह से बढ़ रही दिक्कत
ICIMOD की एक रिपोर्ट ने पूरे क्षेत्र में ग्लेशियरों की निगरानी में मौजूद गंभीर कमियों को भी उजागर किया। अध्ययन किए गए 38 ग्लेशियरों में से केवल सात ही वर्ल्ड ग्लेशियर मॉनिटरिंग सर्विस (WGMS) के दीर्घकालिक निगरानी के मानकों पर खरे उतरे। कई ऐसे क्षेत्र, जहां ग्लेशियरों सिस्टम मौजूद हैं- जिनमें काराकोरम, सिक्किम, जांस्कर और भूटान शामिल हैं – अब भी सीमित या अपर्याप्त निगरानी के दायरे में हैं। इसके कारण यह समझना मुश्किल है कि इन ग्लेशियरों में बदलाव कितनी तेजी से हो रहा है।
ICIMOD के विशेषज्ञ अब नेपाल की विनाशकारी बाढ़ के कारणों की जांच कर रहे हैं। उन्होंने संकेत दिया है कि बुधवार को नेपाल और तिब्बत में हुई इस तबाही की शुरुआत ऊंचाई वाले क्षेत्र में हुए बर्फ-चट्टान के हिमस्खलन से हुई। ICIMOD के अनुसार, यह आपदा इस बात को उजागर करती है कि तेजी से बदल रहे क्रायोस्फीयर (पृथ्वी का बर्फीला क्षेत्र) से उत्पन्न होने वाले खतरे हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में लगातार अधिक स्पष्ट होते जा रहे हैं। संस्था ने जोर देकर कहा कि संबंधित देशों को पूर्व चेतावनी तंत्र मजबूत करने और आपसी सहयोग बढ़ाने की जरूरत है। खास तौर पर इसलिए, क्योंकि इस तरह की आपदाएं राष्ट्रीय सीमाओं को पार कर सकती हैं और उनसे निपटने के लिए विभिन्न सरकारों के बीच समन्वित प्रतिक्रिया की आवश्यकता होती है।
अगर ICIMOD की रिपोर्टों को चीन और नेपाल ने गंभीरता से लिया होता, तो क्या इस तबाही से बचा जा सकता था? इस सवाल का फिलहाल जवाब देना मुश्किल है। लेकिन इतना जरूर है कि अगर नेपाल ने इसके अनुरूप तैयारी की होती, तो शायद इतनी जानें नहीं जातीं। बाढ़ अचानक आई, किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला। नेपाल सरकार रिपोर्टों के आधार पर निगरानी एवं चेतावनी तंत्र को मजबूत कर सकती थी। हालांकि, उसकी तरफ से ऐसा कुछ नहीं किया गया। उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसी चेतावनियों को अब अधिक गंभीरता से लिया जाएगा।



Terrifying footage shows a flash flood sweeping through the Nepal–Tibet border, trapping people on rooftops and balconies. At least 469 have been killed, with hundreds still missing.