Success Story: दो बार फोन की घंटी बजती, तो सीढ़ियों से नीचे भागते थे अनिल अग्रवाल, 21 रुपये रेंट वाले रूम में 7 लोगों के साथ पड़ता था रहना

Success Story: दो बार फोन की घंटी बजती, तो सीढ़ियों से नीचे भागते थे अनिल अग्रवाल, 21 रुपये रेंट वाले रूम में 7 लोगों के साथ पड़ता था रहना

Anil Agarwal Success Story: कभी मुंबई की एक पुरानी इमारत में सिर्फ 8×9 फीट के कमरे से शुरू हुआ कारोबार आज दुनिया के कई देशों तक पहुंच चुका है। वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी पुरानी यादें शेयर करते हुए बताया कि उनके कारोबारी सफर की शुरुआत कितनी साधारण परिस्थितियों में हुई थी। साल 1975 की बात है। उस समय अनिल अग्रवाल सिर्फ 19 साल के थे और बिहार से मुंबई पहुंचे थे। जेब में ज्यादा पैसे नहीं थे, लेकिन कुछ बड़ा करने का जुनून था। इसी जुनून ने उन्हें मुंबई के कालबादेवी की तंग गलियों तक पहुंचाया, जहां वे कई दिनों तक अपने लिए एक छोटा सा ऑफिस तलाशते रहे थे।

अग्रवाल ने बताया कि उनकी तलाश तब पूरी हुई, जब उनकी मुलाकात रसिकभाई नाम के एक व्यक्ति से हुई। उन्होंने इस युवा लड़के में कुछ ऐसा देखा, जिस पर भरोसा किया जा सकता था। रसिकभाई ने एक पुरानी इमारत की चौथी मंजिल पर उन्हें एक कमरा दिखाया। कमरा बहुत छोटा था। आकार सिर्फ 8 फीट लंबा और 9 फीट चौड़ा। इसी जगह तीन लोग बैठकर काम करते थे

फोन आता था तो सीढ़ियों से भागकर नीचे आते थे

उस दौर में फोन पर कारोबार करना भी अपने आप में किसी परीक्षा से कम नहीं था। अनिल अग्रवाल के ऑफिस में फोन नहीं था। उसी बिल्डिंग में एक जानने वाले के फोन पर कॉल आती थी। कॉल आने पर दो रिंग आती और फिर फोन कट जाता। दो घंटियों का मतलब था कि अनिल अग्रवाल के लिए फोन आया है। वे तुरंत सीढ़ियों से नीचे भागते और कॉल रिसीव करते थे। आज करोड़ों का कारोबार संभालने वाले अनिल अग्रवाल के लिए वे दो घंटियां सिर्फ एक फोन कॉल नहीं थीं। वे कहते हैं कि आज भी उन्हें लगता है कि वे दो रिंग नहीं, बल्कि उनके सपनों के दरवाजे पर होने वाली दस्तक थीं।

उस छोटे से ऑफिस में बैठकर अनिल अग्रवाल ने केबल कंपनियों के साथ सौदे किए, कारोबारियों से मुलाकात की और बिजनेस की बारीकियां सीखीं। उनके मुताबिक, उस दौर में वे हर दिन कुछ नया सीखते थे। मुश्किलें थीं, लेकिन सीखने का सिलसिला भी लगातार चलता रहा।

21 रुपये महीने था रूम का किराया

ऑफिस छोटा था तो रहने का इंतजाम भी कोई खास नहीं था। कालबादेवी में कॉटन एक्सचेंज के पास वे सात अन्य लोगों के साथ एक कमरा शेयर करते थे। उस कमरे का मासिक किराया सिर्फ 21 रुपये था। यही वह दौर था जब कारोबार कभी अच्छा चलता था तो कभी नुकसान का सामना करना पड़ता था। वक्त बदलता रहा, मौसम बदलते रहे, लेकिन उनके हौसले में कमी नहीं आई।

आज भी याद है पहला ऑफिस

अनिल अग्रवाल ने अपनी पोस्ट में बताया कि कामयाबी और नाकामी के कई दौर आए, लेकिन हर सुबह वे उसी उत्साह और गर्व के साथ अपने पहले ऑफिस का ताला खोलते थे। आज वेदांता ग्रुप के दुनिया के कई देशों में बड़े ऑफिस हैं। कारोबार का दायरा भी काफी बड़ा हो चुका है। लेकिन अनिल अग्रवाल कहते हैं कि आंखें बंद करते ही उन्हें आज भी वह छोटा सा 8×9 फीट का कमरा साफ दिखाई देता है। अनिल अग्रवाल ने अपनी बात का अंत इसी सीख के साथ किया कि बड़े सपने देखिए और उन्हें पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत कीजिए।

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