India Pakistan partition films: भारत-पाकिस्तान का बंटवारा सिर्फ दो देशों के बीच खींची गई एक लकीर नहीं था, बल्कि लाखों लोगों की जिंदगी, रिश्तों और परिवारों को बदल देने वाली त्रासदी थी। इंडियन सिनेमा ने भी इस दर्द को अलग-अलग कहानियों के जरिए पर्दे पर उतारा है। कुछ फिल्मों में बंटवारे की हिंसा दिखाई गई, तो कुछ ने उस दौर में बिछड़े अपनों और अधूरी रह गई मोहब्बत की कहानी बयां की। तो आइए जानते हैं ऐसी ही फिल्मों के बारे में, जो बंटवारे के दर्द को करीब से महसूस कराती हैं।
‘मम्मो’ (Mammo)
1994 में आई फिल्म ‘मम्मो’ में फरीदा जलाल ने लीड रोल निभाई थी। फिल्म में वो एक पाकिस्तानी महिला का किरदार निभाती हैं, जो अपने रिश्तेदारों के साथ रहने के लिए मुंबई आती है। बता दें, बंटवारे के कई साल बाद भी उसका अतीत और पहचान उसके लिए मुश्किलें खड़ी करती है। फिल्म परिवार के रिश्तों के जरिए दिखाती है कि 1947 में हुआ बंटवारा सीमा बनने के दशकों बाद भी लोगों की जिंदगी और उनके अपनेपन की भावना को प्रभावित करता रहा।
‘भाग मिल्खा भाग’ (Bhaag Milkha Bhaag)
राकेश ओमप्रकाश मेहरा की ‘भाग मिल्खा भाग’ महान भारतीय एथलीट मिल्खा सिंह की जिंदगी पर आधारित है। फिल्म में फरहान अख्तर ने मिल्खा सिंह का किरदार निभाया था।
फिल्म मुख्य रूप से उनके एथलीट बनने के संघर्ष पर केंद्रित है, लेकिन बंटवारे का दर्द उनकी कहानी का अहम हिस्सा है। फिल्म में मिल्खा को बचपन में बंटवारे की हिंसा का सामना करते दिखाया गया है, जिसमें वो अपने परिवार से बिछड़ जाते हैं और भारत आने के लिए मजबूर होते हैं।
‘गदर: एक प्रेम कथा’ ( Gadar: Ek Prem Katha)
सनी देओल और अमीषा पटेल की ‘गदर: एक प्रेम कथा’ भले ही एक प्रेम कहानी और एक्शन ड्रामा के तौर पर जानी जाती है, लेकिन इसकी पूरी कहानी भारत-पाकिस्तान के बंटवारे की पृष्ठभूमि में बुनी गई है।
फिल्म में सनी देओल ने तारा सिंह का किरदार निभाया है, जिसे बंटवारे के दौरान सकीना से प्यार हो जाता है। सकीना के पाकिस्तान चले जाने के बाद तारा उसे वापस लाने के लिए सीमा पार करने का फैसला करता है। फिल्म में प्यार, परिवार और बिछड़ने के दर्द को बंटवारे के दौर से जोड़ा गया है।
‘मैं वापस आऊंगा’ (Main Vaapas Aaunga)
‘मैं वापस आऊंगा’ की कहानी कीनू नाम के एक सिख परिवार के कॉलेज छात्र की है, जिसे जिया नाम की मुस्लिम लड़की से प्यार हो जाता है। दोनों अपने रिश्ते को आगे बढ़ाने का सपना देखते हैं, लेकिन इसी बीच भारत-पाकिस्तान के बंटवारे की घोषणा हो जाती है।
फिल्म अलग-अलग समय-सीमाओं के जरिए इस रिश्ते की कहानी दिखाती है। कहानी में कीनू 78 साल बाद भी जिया से मिलने की उम्मीद लगाए रहता है और जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर उसे एक बार फिर देखने की इच्छा रखता है।
‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ (Train to Pakistan)
खुशवंत सिंह के फेमस उपन्यास पर आधारित ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ भारत-पाकिस्तान सीमा के पास बसे एक काल्पनिक गांव की कहानी है। फिल्म में शुरुआत में हिंदू, सिख और मुस्लिम समुदाय के लोग मिल-जुलकर रहते हैं।

लेकिन बंटवारे की खबरें और बढ़ता तनाव गांव की शांत जिंदगी को बदल देते हैं। कहानी के केंद्र में जुग्गा नाम का स्थानीय अपराधी है, जो मुस्लिम ग्रामीणों को नरसंहार से बचाने के लिए खतरनाक कदम उठाता है। फिल्म बंटवारे के दौरान इंसानियत और रिश्तों की परीक्षा को दिखाती है।





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