विदेशी खाद्य तेल महंगे हुए तो मुरैना के सरसों तेल ने संभाली देश की रसोई, बांग्लादेश से आए बंपर ऑर्डर!

विदेशी खाद्य तेल महंगे हुए तो मुरैना के सरसों तेल ने संभाली देश की रसोई, बांग्लादेश से आए बंपर ऑर्डर!

Morena Musturd Oil: वैश्विक मोर्चे पर युद्ध और अशांति के चलते विदेशी खाद्य तेलों के दाम में लगी आग ने जब देश की रसोई का बजट बिगाड़ दिया, तब चंबल के पारंपरिक सरसों तेल (Morena Musturd Oil) उद्योग ने देशवासियों को बड़ी राहत दी है। दशकों पुरानी पिराई परंपरा के दम पर आज भी मुरैना के सरसों तेल ने देश के बड़े हिस्से में धाक बना रखी है। संकट के इस दौर में मुरैना की मिलों से हर महीने 25 से 30 हजार मीट्रिक टन सरसों का तेल देश के विभिन्न राज्यों में भेजा जा रहा है। सिर्फ तेल ही नहीं, बल्कि तेल निकालने के बाद बचने वाली सरसों की खली की मांग सीमा पार बांग्लादेश में सिर चढ़कर बोल रही है।

बंपर मुनाफा कमा रहे कारोबारी

मुरैना के तेल कारोबारी तेल के साथ-साथ उप-उत्पाद (खली) से भी बंपर मुनाफा कमा रहे हैं। बांग्लादेश में मुरैना की खली का उपयोग बड़े पैमाने पर पौष्टिक पशु आहार के रूप में किया जा रहा है।

पिछले पांच महीनों में ही भारतीय रेलवे ने यहां से खली के 1238 वैगन भरक र बांग्लादेश भेजे हैं, जिससे रेलवे को भी लगभग 12 से 13 क रोड़ रुपये की कमाई भाड़े के रूप में हुई है। वर्तमान में यह तेल असम, बिहार, मिजोरम, नागालैंड, झारखंड और पश्चिम बंगाल भेजा जा रहा है।

रकबा घटा और बंद हुईं 28 मिलें, फिर भी हौसले बुलंद

मुरैना में यह सफलता तब मिल रही है, जब पिछले कुछ वर्षों में चंबल संभाग (मुरैना, भिंड और श्योपुर) में सरसों की खेती (Morena Musturd Oil) का रकबा करीब 8 हजार हेक्टेयर कम हो गया है। वाजिब दाम न मिलने से किसानों ने सरसों की बोनी कम कर दी, जिसका असर स्थानीय मिलों पर पड़ा और कच्चे माल की कमी से 28 तेल मिलें बंद हो गईं। वर्तमान में केवल 20 बड़ी तेल मिलें और कुछ छोटे स्पेलर ही संचालित हो रहे हैं, जो पूरी क्षमता से देश की मांग पूरी कर रहे हैं।

विदेशी तेलों की मंदी के बाद फिर लौटा सरसों का स्वर्ण युग

साल 2023 के बाद सरकार द्वारा आयात शुल्क (इंपोर्ट ड्यूटी) घटाए जाने से विदेशी पाम, कनोला और सोयाबीन तेल बाजार में 90-95 रुपये प्रति किलो तक बिकने लगे थे। इसके मुकाबले 140 रुपये किलो बिकने वाले सरसों तेल की मांग काफी घट गई थी। लेकिन वर्तमान में चल रहे अंतरराष्ट्रीय युद्ध संकट के कारण विदेशी तेल फिर महंगे हो गए हैं, इससे बाजार में शुद्ध सरसों तेल की धाक और मांग दोबारा लौट आई है।

रीढ़ की हड्डी है चंबल का यह उद्योग

मुरैना का सरसों तेल उद्योग (Morena Musturd Oil) बिना किसी विशेष सरकारी मदद के वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाए हुए है। लेकिन सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि सही भाव न मिलने से किसानों ने सरसों की बोवनी कम कर दी है, जिससे 8 हजार हेक्टेयर रकबा घट गया और कच्चे माल की कमी से 28 बड़ी तेल मिलें बंद हो गईं हैं। यदि राज्य सरकार बंद पड़ी मिलों को चालू कराने के लिए रियायतें दे और सरसों पर बोनस की घोषणा करे, तो यह उद्योग अंचल के हजारों युवाओं को रोजगार दे सकता है।

टैक्स चोरी पर लगाम: रेलवे ने शुरू की नई पहल

वर्तमान में मुरैना से सरसों तेल (Morena Musturd Oil) का एक बड़ा हिस्सा ट्रकों (सड़क मार्ग) के जरिए कोलकाता और झारखंड भेजा जा रहा है। रेलवे सूत्रों के अनुसार, कुछ कारोबारी टैक्स बचाने के चक्कर में सड़क मार्ग चुनते हैं ताकि, माल को पूरी तरह नंबर-एक (वैध दस्तावेजों) में दर्ज न करना पड़े।

Morena Mustard oil Export by indian railway
Morena Mustard oil and sarson khali Export by indian railway: मुरैना के सांक स्टेशन पर मालगाड़ी में खली के बोरों को रखते कर्मचारी।

मुरैना के सरसों तेल की डिमांड देश भर में

मुरैना में सरसों की पैदावार ज्यादा होती है, इस कारण यहां के तेल (Morena Musturd Oil) की डिमांड देश भर में है, इसके साथ ही यहां पर खली के काफी बड़े प्लांट लगे हुए हैं, हर दिन लगभग पांच हजार मीट्रिक टन की कैपेसिटी है। इससे वर्षों से लोगों का विश्वास भी है। इसी के कारण यहां से खली की रेकॉर्ड सप्लाई होती है।

– हर्षित मंगल, हैंडलिंग एजेंट, सांक स्टेशन

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