मरीजों के स्वस्थ हो जाने के बाद उनके चेहरे पर आई मुस्कान ही हमारी असली ताकत है। यही कारण है हमें हर मरीज में अपना परिवार नजर आता है। बच्चों के दर्द से तो हम बहुत भावुक हो जाते हैं। आज ‘इंटरनेशनल नर्सेस डे’ पर एमवाय अस्पताल में सेवाएं दे रहीं नर्सों ने दैनिक भास्कर से अपने अनुभव साझा किए। उनका कहना है कि नर्सिंग सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि मानव सेवा का सबसे संवेदनशील माध्यम है। मरीजों के स्वस्थ होने के बाद चेहरे पर आने वाली मुस्कान ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनती है। आग से बचाए थे दर्जनों नवजात, बोलीं- बच्चों से बन जाता है भावनात्मक रिश्ता एमवाय अस्पताल की नर्स लीना ठाकरे ने बताया कि वे वर्ष 2008 से शिशु रोग विभाग में सेवाएं दे रही हैं। बच्चों के साथ काम करना उन्हें सबसे ज्यादा पसंद है। उन्होंने कहा कि इलाज के दौरान बच्चों से भावनात्मक रिश्ता बन जाता है। कई बार जरूरत पड़ने पर ड्यूटी समय से अधिक रुककर भी उनकी देखभाल करनी पड़ती है। लीना ने बताया कि यदि किसी जरूरतमंद बच्चे के लिए दवा उपलब्ध नहीं हो पाती तो सामाजिक संस्थाओं की मदद से उसकी व्यवस्था कराई जाती है। कैंसर और ल्यूकेमिया जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बच्चों को देखकर मन बहुत भावुक हो जाता है। लीना ठाकरे ने वर्ष 2017 की घटना याद करते हुए बताया कि अस्पताल की नवजात पीडियाट्रिक यूनिट में आग लग गई थी। उस दौरान धुएं के बीच कांच तोड़कर बच्चों को बाहर निकाला गया। स्टाफ की सतर्कता और टीमवर्क से सभी नवजातों की जान बचा ली गई थी। जन्मदिन के दो दिन बाद हो गई बच्ची की मौत उन्होंने एक भावुक घटना साझा करते हुए बताया कि डाउन सिंड्रोम से पीड़ित एक बच्ची की हालत बेहद गंभीर थी। डॉक्टरों ने उसके बचने की उम्मीद बहुत कम बताई थी। बच्ची के माता-पिता हर साल उसका जन्मदिन धूमधाम से मनाते थे। उनकी इच्छा पर वार्ड में दो दिन पहले ही बच्ची का जन्मदिन मनाया गया, लेकिन दो दिन बाद उसकी मौत हो गई। यह घटना आज भी उन्हें भावुक कर देती है। लावारिस मरीजों की सेवा ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी एमवाय अस्पताल के सहारा वार्ड में ड्यूटी कर रहीं शिल्पा कौर गिल ने बताया कि वर्ष 2016 से वे अज्ञात और लावारिस मरीजों की सेवा कर रही हैं। यहां सड़क हादसों में घायल या परिवार द्वारा छोड़ दिए गए मरीजों का इलाज किया जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसे मरीजों के पास कोई अपना नहीं होता, इसलिए नर्सिंग स्टाफ ही उनका परिवार बन जाता है। मरीजों की देखभाल करना भावनात्मक रूप से काफी चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन जब मरीज स्वस्थ होकर घर पहुंचते हैं और बाद में परिवार की ओर से धन्यवाद का फोन आता है, तो मन को संतोष मिलता है। डायलिसिस यूनिट में बढ़ीं सुविधाएं, हर महीने 600 मरीजों का इलाज डायलिसिस इकाई की इंचार्ज निखिता यादव ने बताया कि वे पिछले तीन वर्षों से यूनिट संभाल रही हैं। पहले यहां केवल छह मशीनें थीं, जिससे मरीजों को लंबे इंतजार का सामना करना पड़ता था। बाद में रोटरी क्लब की मदद से 10 नई मशीनें मिलीं और अब कुल 18 मशीनों पर डायलिसिस किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि इनमें पांच मशीनें एचआईवी पॉजिटिव और हेपेटाइटिस-बी व सी संक्रमित मरीजों के लिए अलग से लगाई गई हैं। वर्तमान में हर महीने करीब 600 डायलिसिस किए जा रहे हैं। निखिता यादव ने कहा कि मरीजों के चेहरे पर संतुष्टि देखकर आत्मिक सुकून मिलता है। उनका मानना है कि भगवान ने उन्हें मानव सेवा के लिए चुना है, इसलिए वे अपने पेशे के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं। उन्होंने कहा कि सरकारी अस्पतालों को लेकर लोगों की सोच अब बदल रही है। एमवाय अस्पताल की डायलिसिस यूनिट आधुनिक सुविधाओं और स्वच्छता के मामले में निजी अस्पतालों जैसी है। घड़ी देखकर नहीं, जिम्मेदारी देखकर काम करते हैं निखिता ने अपनी मां को प्रेरणास्रोत बताते हुए कहा कि उन्होंने सिखाया है कि मानव सेवा के लिए यह पेशा चुना है तो घड़ी देखकर काम नहीं करना चाहिए। जब मरीज तकलीफ में होता है तो सबसे पहले नैतिक जिम्मेदारी निभाना जरूरी होता है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि नर्सों को और अधिक सशक्त बनाया जाए तो स्वास्थ्य सेवाएं और बेहतर हो सकती हैं। एचआईवी संक्रमित मरीजों के बीच काम करना चुनौतीपूर्ण और जोखिमभरा जरूर है, लेकिन मरीजों की सेवा सबसे बड़ा दायित्व है।


