लखनऊ में ‘जश्न-ए-वासिफ फारूकी’ मुशायरा:शायरों ने गजलों से समां बांधा, पूर्व कार्यकारी मुख्यमंत्री डॉ. अम्मार रिजवी ने पढ़ा मुशायरा

लखनऊ में ‘जश्न-ए-वासिफ फारूकी’ मुशायरा:शायरों ने गजलों से समां बांधा, पूर्व कार्यकारी मुख्यमंत्री डॉ. अम्मार रिजवी ने पढ़ा मुशायरा

लखनऊ में रविवार को मशहूर शायर वासिफ फारूकी के सम्मान में ‘जश्न-ए-वासिफ फारूकी’ मुशायरा और सम्मान समारोह आयोजित किया गया। गोमती नगर स्थित उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी सभागार में हुए इस कार्यक्रम में शहर के साथ-साथ बाहर से आए शायरों ने भी अपनी गजलों से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ पूर्व कार्यकारी मुख्यमंत्री डॉ. अम्मार रिजवी ने दीप प्रज्वलित कर किया। इस दौरान उन्होंने मुशायरा पढ़ी – ‘दौर में सागर रहे, गर्दिश में पैमाना रहे,मयकशों के सर पर, या रब, पीर-ए-मैखाना रहे।’ मुशायरे की अध्यक्षता लखनऊ यूनिवर्सिटी के उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. अब्बास रजा नैयर ने की, जबकि दिल्ली से आए शायर मोईन शादाब ने संचालन की जिम्मेदारी संभाली। ‘मैं दिया हूं, मुझे बुझाएगी, ऐ हवा सांस फूल जाएगी’ मुशायरे में कई शायरों ने एक से बढ़कर एक अशआर पेश किए, जिन पर श्रोताओं ने खूब दाद दी। प्रो. अब्बास रजा नैयर ने पढ़ा—’मैं दिया हूं, मुझे बुझाएगी, ऐ हवा सांस फूल जाएगी।’ वासिफ फारूकी ने अपने अंदाज में कहा- ‘गालिब ओ मीर शहंशाह-ए-सुखन हैं लेकिन, अपने खित्ते में जमींदार-ए-गजल हम भी हैं।’ राम प्रकाश बेखुद ने उर्दू की तहजीब पर रोशनी डालते हुए पढ़ा—’हमें रोजी तो हिन्दी और अंग्रेजी ने दी बेशक, मगर आदाब जीने के हमें उर्दू से आए हैं।’

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