भास्कर टीम|बेतिया भले ही घरेलू एवं कमर्शियल गैस सिलेंडर को लेकर आवाम व व्यवसायी परेशान है। लेकिन व्यवस्था रुक नहीं रही है। मुश्किल की इस घड़ी में भी आपदा में अवसर की तर्ज पर व्यवसायी मूव करने लगे हैं जहां कुछ दिन पहले तक गैस की हाहाकार के बीच होटलों व प्रतिष्ठानों के बंद होने की बाते सामने आ रही थी वहीं रोजी रोटी के लिए अब व्यवसायियों ने दशकों पुरानी व्यवस्था को ही अपना हथियार बना लिया है। दैनिक भास्कर ने जब इसकी पड़ताल की तो ज्ञात हुआ कि शहर सहित प्रखंडों के चौक चौराहों पर चाय, नाश्ते की दुकानें व होटल जो गैस से ही संचालित होते थे वे अब बंद होने के बजाय कोयला व लकड़ी के चूल्हे पर चल रहे है। समय थोड़ा अधिक जरूर लग रहा है। लेकिन दुकानदारों की बचत भी पहले से अधिक हो रही है। छोटे, मध्य या बड़े होटल व्यवसायियों ने गैस की जगह कोयला व लकड़ी के चूल्हे का प्रयोग करना शुरू कर दिया हैं। होटल व्यवसायी कुलदीप, सुमित, अजय प्रसाद, चन्नू प्रसाद, शंभू मोदनवाल, टूनटून मोदनवाल, संजीव कुमार, मोहन दास आदि का कहना है कि सामग्रियों को तैयार करने में भले ही समय लग रहा है, लेकिन गैस की अपेक्षा लकड़ी व कोयला सस्ता पड़ रहा है। लकड़ी और कोयले की बढ़ गई खपत इसके बाद इनके दाम में भी बढ़ोतरी व्यवसायियों ने बताया कि अगर भविष्य में गैस पहले की तरह मिलने भी लगे तब भी अब निरंतर एक लकड़ी व कोयले का चुल्हा जलता रहेगा। एलपीजी कमर्शियल गैस सिलेंडर किल्लत होने के कारण लकड़ी व कोयले की खपत बढ़ गई है। इतना ही नहीं दाम भी बढ़ गए हैं। होटल व्यवसायियों की माने, तो शुरूआत में लकड़ी 700 से 800 रुपए प्रति क्विंटल व कोयला 1400 से 1500 रुपये प्रतिक्विंटल तक मिल जाता था, लेकिन हाल के दिनों लकड़ी की कीमत 200 से 250 रुपए प्रतिक्विंटल व कोयला पर 400 से 500 रुपये प्रतिक्विंटल बढ़ गया है। शहर के लकड़ी व कोयला व्यवसायी राजेश कुमार, मुकेश कुमार, राजेश्वर साह, कैलाश महतो आदि का कहना है कि पहले वे प्रतिदिन लकड़ी 50 किलोग्राम से एक क्विंटल तक व कोयला दो से ढ़ाई क्विंटल तक बेचते थे। लेकिन वर्तमान में लकड़ी 5 से 7 क्विंटल, तो कोयला 6 से 8 क्विंटल प्रतिदिन बिक जा रहा है। ऐसे में व्यवसाय अच्छा चल रहा है। व्यवसायियों का कहना है कि लगन आते ही लकड़ी की बिक्री 7 से 8 क्विंटल व कोयले की बिक्री 8 से 10 क्विंटल तक हो सकती है। भास्कर टीम|बेतिया भले ही घरेलू एवं कमर्शियल गैस सिलेंडर को लेकर आवाम व व्यवसायी परेशान है। लेकिन व्यवस्था रुक नहीं रही है। मुश्किल की इस घड़ी में भी आपदा में अवसर की तर्ज पर व्यवसायी मूव करने लगे हैं जहां कुछ दिन पहले तक गैस की हाहाकार के बीच होटलों व प्रतिष्ठानों के बंद होने की बाते सामने आ रही थी वहीं रोजी रोटी के लिए अब व्यवसायियों ने दशकों पुरानी व्यवस्था को ही अपना हथियार बना लिया है। दैनिक भास्कर ने जब इसकी पड़ताल की तो ज्ञात हुआ कि शहर सहित प्रखंडों के चौक चौराहों पर चाय, नाश्ते की दुकानें व होटल जो गैस से ही संचालित होते थे वे अब बंद होने के बजाय कोयला व लकड़ी के चूल्हे पर चल रहे है। समय थोड़ा अधिक जरूर लग रहा है। लेकिन दुकानदारों की बचत भी पहले से अधिक हो रही है। छोटे, मध्य या बड़े होटल व्यवसायियों ने गैस की जगह कोयला व लकड़ी के चूल्हे का प्रयोग करना शुरू कर दिया हैं। होटल व्यवसायी कुलदीप, सुमित, अजय प्रसाद, चन्नू प्रसाद, शंभू मोदनवाल, टूनटून मोदनवाल, संजीव कुमार, मोहन दास आदि का कहना है कि सामग्रियों को तैयार करने में भले ही समय लग रहा है, लेकिन गैस की अपेक्षा लकड़ी व कोयला सस्ता पड़ रहा है। लकड़ी और कोयले की बढ़ गई खपत इसके बाद इनके दाम में भी बढ़ोतरी व्यवसायियों ने बताया कि अगर भविष्य में गैस पहले की तरह मिलने भी लगे तब भी अब निरंतर एक लकड़ी व कोयले का चुल्हा जलता रहेगा। एलपीजी कमर्शियल गैस सिलेंडर किल्लत होने के कारण लकड़ी व कोयले की खपत बढ़ गई है। इतना ही नहीं दाम भी बढ़ गए हैं। होटल व्यवसायियों की माने, तो शुरूआत में लकड़ी 700 से 800 रुपए प्रति क्विंटल व कोयला 1400 से 1500 रुपये प्रतिक्विंटल तक मिल जाता था, लेकिन हाल के दिनों लकड़ी की कीमत 200 से 250 रुपए प्रतिक्विंटल व कोयला पर 400 से 500 रुपये प्रतिक्विंटल बढ़ गया है। शहर के लकड़ी व कोयला व्यवसायी राजेश कुमार, मुकेश कुमार, राजेश्वर साह, कैलाश महतो आदि का कहना है कि पहले वे प्रतिदिन लकड़ी 50 किलोग्राम से एक क्विंटल तक व कोयला दो से ढ़ाई क्विंटल तक बेचते थे। लेकिन वर्तमान में लकड़ी 5 से 7 क्विंटल, तो कोयला 6 से 8 क्विंटल प्रतिदिन बिक जा रहा है। ऐसे में व्यवसाय अच्छा चल रहा है। व्यवसायियों का कहना है कि लगन आते ही लकड़ी की बिक्री 7 से 8 क्विंटल व कोयले की बिक्री 8 से 10 क्विंटल तक हो सकती है।


