एक महिला कॉन्स्टेबल की गवाही ने तमिलनाडु के नौ पुलिस वालों को मौत की सजा दिलवा दी। जब कोई भी पुलिस के खिलाफ बोलने से डर रहा था, तब उन्होंने अदालत से कहा कि सर, मैं आपको सब कुछ बताऊंगी। यह कहानी है तत्कालीन हेड कॉन्स्टेबल एस रेवती की बहादुरी और उनकी गवाही की। जिन्होंने धमकियों और सिस्टम के दबाव की परवाह किए बगैर तमिलनाडु के नौ पुलिसकर्मियों को सजाए मौत दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई। यह भारत के क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में एक बेहद रेयर फैसला है क्योंकि एनसीआरबी के डाटा के मुताबिक 1999 से 2023 के बीच भारत में पुलिस कस्टडी में करीब 2250 लोगों की मौत हुई है। लेकिन इन सब एनसीआरबी के डाटा के मुताबिक 1999 से 2023 के बीच भारत में पुलिस कस्टडी में करीब 2250 लोगों की मौत हुई है। लेकिन इन सब में कन्विक्शन कितने हुए? सिर्फ तीन वो भी सिर्फ 2017 में। उसके बाद 2018 से 2023 तक छ साल लगातार कन्विक्शन की संख्या शून्य रही। तो इसका मतलब यह है कि भारत में कस्टडी में कोई मर जाए तो दोषी पुलिस वालों को सजा मिलना लगभग नामुमकिन है। लेकिन सत्तनकुलम केस में ऐसा नहीं हुआ।
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क्या है पूरा मामला
केस 2020 का है लेकिन फैसला आया है हाल ही में 7 अप्रैल 2026 को। वही डबल मर्डर केस जो एक पिता और पुत्र की मौत से जुड़ा था। पिता पुत्र को पुलिस कस्टडी में लेकर इतनी यातनाएं दी गई, इतना टॉर्चर किया गया कि आखिर में दोनों की मौत हो गई। पुलिस वालों ने उन्हें इतनी बेरहमी से पीटा था कि खून के बहाव तक को काबू में लाना नामुमकिन हो गया। इसी केस में अब तमिलनाडु के नौ पुलिस वाले दोषी ठहराए गए हैं और उन्हें ही मौत की सजा दी गई है। मगर केस अपने इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाता अगर पुलिस की जूनियर ऑफिशियल एस रेवती हिम्मत नहीं दिखाती। रेवती उस वक्त टूटूपुड़ी जिले के पुलिस स्टेशन में ड्यूटी पर थी। जब पुलिसकर्मियों ने पी जयराज और उनके बेटे जे वेनिक्स पर बर्बरता की हदें पार कर दी। दोनों को 2020 में कोविड लॉकडाउन के नियम तोड़ने का हवाला देकर हिरासत में लिया गया था। हालांकि बाद में सीबीआई जांच में पता चलता है कि जयराज और बेनिक्स ने ऐसे कोई नियम तोड़े ही नहीं थे। यह लड़ाई तो असल में पुलिस की अकड़ और गुमान की थी। मौतों के बाद जो हुआ वह और भी गंभीर था। सारे आरोपी पुलिस वालों ने मिलकर सबूत मिटाने की कोशिश की। थाने की सीसीटीवी फुटेज डिलीट कर दी गई। खून के दाग साफ कर दिए गए और बाकी सबको धमकाया गया कि मुंह बंद रखो हीरो बनने की कोशिश ना की जाए। फिर इस केस में मद्रास हाईकोर्ट ने सुमोटो कॉग्निजेंस लिया। यानी कि कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया। जांच के लिए मजिस्ट्रेट एमएच भारती दास एंड सत्तनकुलम थाने पहुंचे। लेकिन वहां सबके मुंह से ले हुए थे। किसी ने कुछ नहीं बताया। तब जाकर रेवती ने एक फैसला लिया।
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रेवती इस केस में अप्रूवर बन गई
मगर पुलिसकर्मियों में से ही एक हेड कास्टेबल रेवती इस केस में अप्रूवर बन गई। यानी वो सरकारी गवाह जो आरोपी या अंदरूनी व्यक्ति होते हैं मगर न्याय के लिए कोर्ट में अन्य आरोपियों के खिलाफ गवाही देते हैं। इसके बाद रेवती ने मैजिस्ट्रेट के सामने पूरी घटना पर अपना बयान दर्ज कराया। वह भी तब जब उन्हें अपनी खुद की सुरक्षा और अपने परिवार की सेफ्टी या अपनी नौकरी को लेकर कोई भरोसा नहीं था। क्योंकि केस के आरोपी उनसे सीनियर और प्रभावशाली पुलिस अधिकारी थे। जबकि रेवती एक जूनियर कांस्टेबल थी हेड कॉन्स्टेबल। फिर भी वो अपने फैसले पर अडिग रही। रिपोर्ट के मुताबिक जब जुडिशियल मैजिस्ट्रेट एमएस भर्ती दासन जांच के लिए पहुंचे तो रेवटी ने उनसे कहा सर मैं आपको सब कुछ बताऊंगी हर एक चीज बारीकी से। वो सच्चाई जो छुपाई जा रही है। फिर मैजिस्ट्रेट के सामने रेवती ने एक के बाद एक 1 मिनट दर मिनट उस रात की पूरी घटना बताई। उन्होंने बताया कि कैसे जयराज और बेनिक्स को लगातार पीटा गया। उन्हें कई चोटें आई और बाद में उन्हें जुडिशियल कस्टडी में भेज दिया गया। कुछ ही दिनों में दोनों की मौत हो गई। रेवती ने बिना किसी डर के सीसीटीवी फुटेजेस में दिख रहे दोषी पुलिस वालों की पहचान की जिससे यह साबित करने में मदद मिली कि वो घटना के वक्त मौके पर मौजूद थे।
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कोर्ट ने सुनाई फांसी की सजा
अब जाकर 6 साल बाद सीबीआई की जांच 2000 पेज की चार्जशीट 100 से ज्यादा गवाहों की गवाही के बाद मदुरई के फर्स्ट एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस कोर्ट के जज जी मुथू कुमारन ने सभी नौ पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया। कोर्ट ने इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर कैटेगरी में रखा और फांसी की सजा सुनाई। साथ ही परिवार को ₹1 करोड़ 40 लाख का मुआवजा देने का आर्डर दिया। 10वां आरोपी सब इंस्पेक्टर पालदुरई ट्रायल के दौरान कोविड से ही मर चुका था। जज ने कहा जहां ताकत है वहां जिम्मेदारी होनी चाहिए। जो लोग कानून की रक्षा करने के लिए तैनात थे उन्होंने खुद कानून तोड़ा है।


