जमुई जिले के किसान निरंजन ने जैविक खेती और देसी बीजों के संरक्षण में एक नई मिसाल कायम की है। जहां अधिकांश किसान आधुनिक तकनीकों और हाइब्रिड बीजों की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं निरंजन ने धान की 52 से अधिक पारंपरिक किस्मों का संग्रह कर अपनी अलग पहचान बनाई है। निरंजन ने बताया कि इस पहल की शुरुआत साल 2017 में हुई थी। ‘री-जेनरेटिव बिहार’ संस्था द्वारा उनके गांव में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए एक शिविर आयोजित किया गया था। इसी दौरान उन्हें देसी बीजों के महत्व और जैविक खेती के फायदों के बारे में जानकारी मिली, जिसके बाद उन्होंने पारंपरिक बीजों से ही खेती करने का संकल्प लिया। कुछ को पकने में 145 दिन तक का समय लगता वर्तमान में उनके संग्रह में साठी, कतरनी, काला नमक, कारी जीरा, पत्तलसार, दांतखंडी, भौसा, अनारकली, सुजाता, सोनम, सिरहटी, पटना कलम, झूलन, सुगा पंछी और मैजिक राइस जैसी कई दुर्लभ किस्में शामिल हैं। इनमें से कुछ किस्में 60 दिनों में तैयार हो जाती हैं, जबकि कुछ को पकने में 145 दिन तक का समय लगता है। इन सभी किस्मों की खेती सामान्य मिट्टी में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है। बचपन से ही खेतों में जाते थे और खेती के गुर सीखते थे निरंजन को खेती की प्रेरणा अपने पिता से मिली थी। बचपन से ही वे उनके साथ खेतों में जाते थे और खेती के गुर सीखते थे। लगभग 15 साल पहले पिता के निधन के बाद उन्होंने खेती की पूरी जिम्मेदारी संभाली। इंटर तक पढ़ाई करने के बाद उन्होंने खेती को ही अपना मुख्य पेशा बना लिया। शुरुआत में उन्होंने पारंपरिक तरीके से खेती की, लेकिन समय के साथ उन्होंने महसूस किया कि रासायनिक खाद और हाइब्रिड बीजों पर किसानों की बढ़ती निर्भरता देसी बीजों के विलुप्त होने का कारण बन रही है। इसी अनुभव ने उन्हें देसी बीजों के संरक्षण की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया। जमुई जिले के किसान निरंजन ने जैविक खेती और देसी बीजों के संरक्षण में एक नई मिसाल कायम की है। जहां अधिकांश किसान आधुनिक तकनीकों और हाइब्रिड बीजों की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं निरंजन ने धान की 52 से अधिक पारंपरिक किस्मों का संग्रह कर अपनी अलग पहचान बनाई है। निरंजन ने बताया कि इस पहल की शुरुआत साल 2017 में हुई थी। ‘री-जेनरेटिव बिहार’ संस्था द्वारा उनके गांव में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए एक शिविर आयोजित किया गया था। इसी दौरान उन्हें देसी बीजों के महत्व और जैविक खेती के फायदों के बारे में जानकारी मिली, जिसके बाद उन्होंने पारंपरिक बीजों से ही खेती करने का संकल्प लिया। कुछ को पकने में 145 दिन तक का समय लगता वर्तमान में उनके संग्रह में साठी, कतरनी, काला नमक, कारी जीरा, पत्तलसार, दांतखंडी, भौसा, अनारकली, सुजाता, सोनम, सिरहटी, पटना कलम, झूलन, सुगा पंछी और मैजिक राइस जैसी कई दुर्लभ किस्में शामिल हैं। इनमें से कुछ किस्में 60 दिनों में तैयार हो जाती हैं, जबकि कुछ को पकने में 145 दिन तक का समय लगता है। इन सभी किस्मों की खेती सामान्य मिट्टी में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है। बचपन से ही खेतों में जाते थे और खेती के गुर सीखते थे निरंजन को खेती की प्रेरणा अपने पिता से मिली थी। बचपन से ही वे उनके साथ खेतों में जाते थे और खेती के गुर सीखते थे। लगभग 15 साल पहले पिता के निधन के बाद उन्होंने खेती की पूरी जिम्मेदारी संभाली। इंटर तक पढ़ाई करने के बाद उन्होंने खेती को ही अपना मुख्य पेशा बना लिया। शुरुआत में उन्होंने पारंपरिक तरीके से खेती की, लेकिन समय के साथ उन्होंने महसूस किया कि रासायनिक खाद और हाइब्रिड बीजों पर किसानों की बढ़ती निर्भरता देसी बीजों के विलुप्त होने का कारण बन रही है। इसी अनुभव ने उन्हें देसी बीजों के संरक्षण की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया।


