इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भाजपा शासित राज्यों में मुसलमानों को डराने और अतीक-अशरफ हत्याकांड को सरकारी साजिश बताने वाले मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड उप्र के अध्यक्ष नूर अहमद अजहरी को राहत देने से इन्कार कर दिया।
कोर्ट ने धार्मिक उन्माद फैलाने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के आरोपों में दर्ज मुकदमे की पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग में दायर याचिका खारिज कर दी। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की एकल पीठ ने दिया है। यूपी सरकार मुस्लिमों को डराने का प्रयास कर रही पूरा विवाद एक वायरल वीडियो से शुरू हुआ था, जिसमें पीलीभीत निवासी नूर अहमद अजहरी ने आरोप लगाया था कि यूपी की भाजपा सरकार मुसलमानों को डराने का प्रयास कर रही है। अतीक व अशरफ की हत्या सरकार के शासन में एक सोची-समझी साजिश थी। वीडियो में उन्होंने यह भी दावा किया था कि वर्तमान सरकार का संविधान में कोई विश्वास नहीं है।
इस वीडियो के आधार पर पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की थी। जांच के बाद विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच शत्रुता, द्वेष या दुर्भावना को बढ़ावा देने के आरोप में चार्जशीट दाखिल की गई। अजहरी ने मुकदमे की पूरी कार्यवाही को रद्द करने की मांग कर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। बात रखने से अपराध नहीं बनता याची के अधिवक्ता ने दलील दी थी कि अजहरी एक डिबेट में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के विचार रख रहे थे। उनके बयानों से कोई अपराध नहीं बनता है। हालांकि, राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता ने याचिका का विरोध किया। कहा कि ये तथ्य साक्ष्य से जुड़े हैं। इनका निर्धारण केवल ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का संदर्भ दिया और कहा कि मजिस्ट्रेट को केवल यह देखना होता है कि क्या आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार है। हाईकोर्ट ने पाया कि एफआईआर के विवरण के अनुसार आवेदक पर एक विशेष समुदाय के बीच धार्मिक उत्तेजना और नफरत फैलाने के आरोप हैं, जिससे सार्वजनिक शांतिभंग की संभावना बनी।


