बक्सर सदर अस्पताल में 2 करोड़ 47 लाख रुपए की लागत से बना 42-बेड का अत्याधुनिक पीकू (Pediatric Intensive Care Unit) वार्ड पिछले एक साल से बंद पड़ा है। यह वार्ड अब बच्चों के इलाज का केंद्र न होकर असामाजिक तत्वों और नशेड़ियों का अड्डा बन गया है। वार्ड परिसर की स्थिति जर्जर है। यहां चारों ओर गंदगी फैली है, जिसमें सैकड़ों शराब की खाली बोतलें, नशे में इस्तेमाल की गई इंजेक्शन की शीशियां, सॉल्यूशन और प्रयोग किए गए कंडोम पाए गए हैं। भवन में लगी वायरिंग और कई महत्वपूर्ण उपकरण चोरी हो चुके हैं। वार्ड की दीवारें दरकने लगी हैं और चहारदीवारी भी क्षतिग्रस्त है। सुरक्षा के लिए यहां कोई व्यवस्था नहीं है, यहां तक कि गेट भी नहीं लगा है, जिससे किसी का भी अंदर-बाहर आना-जाना आसान है। 2 साल पहले ही बनकर हुआ था तैयार यह पीकू यूनिट दो साल पहले ही बनकर तैयार हो गई थी। इसे 2025 में सदर अस्पताल को हैंडओवर भी कर दिया गया था। उम्मीद थी कि 2024 से ही गंभीर रूप से बीमार बच्चों को जिले में वेंटिलेटर और आईसीयू की सुविधा मिलनी शुरू हो जाएगी। हालांकि, वर्तमान में मरीजों को इलाज के लिए पटना या निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है, जिससे गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। स्वास्थ्य विभाग में डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी के बावजूद करोड़ों रुपये खर्च कर इस अत्याधुनिक वार्ड का निर्माण किया गया है। ऐसे में इसके निर्माण के औचित्य पर सवाल उठ रहे हैं। इस स्थिति को लेकर स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है।
जनता को नहीं मिल रहा कोई फायदा स्थानीय निवासी वरुण कुमार ओझा का कहना है, “सरकार सिर्फ इमारत खड़ी कर देती है, लेकिन उसमें न बहाली होती है और न ही कोई काम। आम जनता को कोई फायदा नहीं मिल रहा। अब यह जगह नशेड़ियों का अड्डा बन चुकी है, जहां से गुजरने में भी लोग डरते हैं।”
जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी विनोद प्रताप सिंह के अनुसार, पीकू वार्ड के शुरू नहीं होने की सबसे बड़ी वजह डॉक्टरों और प्रशिक्षित स्टाफ की कमी है। उन्होंने बताया कि एनेस्थेटिक डॉक्टर और प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ के बिना इस यूनिट को चालू करना संभव नहीं है। साथ ही अब भवन की हालत ऐसी हो गई है कि इसे शुरू करने से पहले फिर से मरम्मत करानी पड़ेगी। बक्सर सदर अस्पताल में 2 करोड़ 47 लाख रुपए की लागत से बना 42-बेड का अत्याधुनिक पीकू (Pediatric Intensive Care Unit) वार्ड पिछले एक साल से बंद पड़ा है। यह वार्ड अब बच्चों के इलाज का केंद्र न होकर असामाजिक तत्वों और नशेड़ियों का अड्डा बन गया है। वार्ड परिसर की स्थिति जर्जर है। यहां चारों ओर गंदगी फैली है, जिसमें सैकड़ों शराब की खाली बोतलें, नशे में इस्तेमाल की गई इंजेक्शन की शीशियां, सॉल्यूशन और प्रयोग किए गए कंडोम पाए गए हैं। भवन में लगी वायरिंग और कई महत्वपूर्ण उपकरण चोरी हो चुके हैं। वार्ड की दीवारें दरकने लगी हैं और चहारदीवारी भी क्षतिग्रस्त है। सुरक्षा के लिए यहां कोई व्यवस्था नहीं है, यहां तक कि गेट भी नहीं लगा है, जिससे किसी का भी अंदर-बाहर आना-जाना आसान है। 2 साल पहले ही बनकर हुआ था तैयार यह पीकू यूनिट दो साल पहले ही बनकर तैयार हो गई थी। इसे 2025 में सदर अस्पताल को हैंडओवर भी कर दिया गया था। उम्मीद थी कि 2024 से ही गंभीर रूप से बीमार बच्चों को जिले में वेंटिलेटर और आईसीयू की सुविधा मिलनी शुरू हो जाएगी। हालांकि, वर्तमान में मरीजों को इलाज के लिए पटना या निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है, जिससे गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। स्वास्थ्य विभाग में डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी के बावजूद करोड़ों रुपये खर्च कर इस अत्याधुनिक वार्ड का निर्माण किया गया है। ऐसे में इसके निर्माण के औचित्य पर सवाल उठ रहे हैं। इस स्थिति को लेकर स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है।
जनता को नहीं मिल रहा कोई फायदा स्थानीय निवासी वरुण कुमार ओझा का कहना है, “सरकार सिर्फ इमारत खड़ी कर देती है, लेकिन उसमें न बहाली होती है और न ही कोई काम। आम जनता को कोई फायदा नहीं मिल रहा। अब यह जगह नशेड़ियों का अड्डा बन चुकी है, जहां से गुजरने में भी लोग डरते हैं।”
जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी विनोद प्रताप सिंह के अनुसार, पीकू वार्ड के शुरू नहीं होने की सबसे बड़ी वजह डॉक्टरों और प्रशिक्षित स्टाफ की कमी है। उन्होंने बताया कि एनेस्थेटिक डॉक्टर और प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ के बिना इस यूनिट को चालू करना संभव नहीं है। साथ ही अब भवन की हालत ऐसी हो गई है कि इसे शुरू करने से पहले फिर से मरम्मत करानी पड़ेगी।


