कटनी. विश्व स्वास्थ्य दिवस पर स्वास्थ्य सेवाओं के बेहतर होने के दावों के बीच जिला अस्पताल की तस्वीर एक अलग ही हकीकत बयान करती है। यहां बीमारी से लडऩे से पहले मरीजों को इंतजार से लडऩा पड़ता है। अस्पताल की पूरी व्यवस्था ‘इंतजार’ के इर्द-गिर्द सिमटी नजर आती है। पर्ची बनवाने से लेकर डॉक्टर तक पहुंचने, जांच कराने और दवा मिलने तक हर चरण लंबी कतारों और धीमी प्रक्रिया में उलझा हुआ है।
सुबह 9 बजे जैसे ही अस्पताल के गेट खुलते हैं, वैसे ही मरीजों की भीड़ उमड़ पड़ती है। पंजीयन काउंटर के सामने लंबी कतारें लग जाती हैं। बुजुर्ग लाठी के सहारे खड़े हैं, महिलाएं बच्चों को गोद में लिए लाइन में लगी हैं, तो कई गंभीर मरीज भी इसी कतार में अपनी बारी का इंतजार कर रहे होते हैं। कई मरीजों का कहना है कि एक पर्ची बनवाने में ही 30 मिनट से लेकर एक घंटे तक का समय लग जाता है। यह इंतजार इलाज की शुरुआत से पहले ही मरीजों को थका देता है। पर्ची के बाद अगला पड़ाव डॉक्टर के कक्ष के बाहर होता है, जहां इंतजार और लंबा हो जाता है। कई कक्षों के बाहर भीड़ तो नजर आती है, लेकिन डॉक्टर अपने स्थान पर नहीं मिलते। मरीजों को बताया जाता है कि डॉक्टर वार्ड में राउंड पर हैं या किसी अन्य कार्य में व्यस्त हैं। ऐसे में मरीज घंटों कुर्सियों पर या जमीन पर बैठकर इंतजार करते रहते हैं। ‘धरती के भगवान’ कहे जाने वाले डॉक्टरों का इंतजार यहां सबसे लंबी प्रक्रिया बन चुका है।
गर्भवती कतार में, फर्श पर बैठ जाती हैं…
अस्पताल के पीछे स्थित मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य इकाई में यह इंतजार और ज्यादा पीड़ादायक हो जाता है। यहां गर्भवती महिलाएं लंबी कतार में खड़ी-खड़ी थक जाती हैं। बैठने के लिए पर्याप्त कुर्सियां नहीं होने के कारण कई महिलाएं फर्श पर बैठकर अपनी बारी का इंतजार करती नजर आती हैं। एक ही पंजीयन काउंटर होने से भीड़ और बढ़ जाती है, जिससे इंतजार का समय कई गुना बढ़ जाता है। यह स्थिति न केवल असुविधाजनक है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी जोखिम भरी है। यही हाल सोनोग्राफी सेंटर के बाहर होता है।
तीन मंजिला भवन, लिफ्ट नाम की
तीन मंजिला अस्पताल भवन में लिफ्ट की सुविधा होने के बावजूद मरीजों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। मरीजों के लिए लिफ्ट बंद रखे जाने के कारण उन्हें सीढिय़ों और रैंप के सहारे ऊपर जाना पड़ता है। वृद्ध, गर्भवती महिलाएं और गंभीर मरीज इस दौरान कई बार बीच में रुककर सांस लेते नजर आते हैं। यहां भी उन्हें सुविधा नहीं, बल्कि अतिरिक्त संघर्ष का सामना करना पड़ता है।
एसएनसीयू के बाहर फर्श पर प्रसूता
नवजात गहन चिकित्सा इकाई (एसएनसीयू) में भर्ती बच्चों की माताओं का इंतजार सबसे ज्यादा संवेदनशील और पीड़ादायक है। प्रसूताएं वार्ड के बाहर बैठी रहती हैं और नर्सों के निर्देश पर उन्हें समय-समय पर अंदर जाकर अपने बच्चों को स्तनपान कराना पड़ता है। इस दौरान उन्हें बार-बार इंतजार करना पड़ता है। उनके लिए कोई अलग मदर वार्ड या आराम की व्यवस्था नहीं है, जिससे उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति और कमजोर होती है।
पैथोलॉजी लैब का भी बुरा हाल
अस्पताल में जांच सेवाओं के लिए भी लंबा इंतजार आम बात है। पैथोलॉजी लैब के बाहर लंबी लाइनें लगी रहती हैं। कई मरीजों को जांच कराने और रिपोर्ट लेने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है। दवा वितरण केंद्र पर भी यही स्थिति है। भीड़ इतनी ज्यादा कि कई मरीज बिना दवा लिए ही वापस लौट जाते हैं।
यह सबसे बड़ी समस्या, आधा स्टॉफ ही नहीं
इस पूरे इंतजार और खामियों के पीछे सबसे बड़ा कारण स्टाफ की भारी कमी है। जिला अस्पताल में कुल 445 स्वीकृत पदों में से 212 पद खाली हैं। डॉक्टरों की कमी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शिशु रोग विशेषज्ञ के 7 में से एक भी पद भरा नहीं है। पैथालॉजिस्ट और आयुष अधिकारी के पद भी पूरी तरह रिक्त हैं। चिकित्सा अधिकारियों के 23 पदों में से केवल 14 ही भरे हुए हैं। नर्सिंग स्टाफ और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की स्थिति भी बेहद खराब है। वार्ड बॉय के 39 पदों में से केवल 4 ही कार्यरत हैं, जबकि सभी 14 स्वीपर पद खाली पड़े हैं।
कमी का सबसे अधिक असर यहां
स्टॉफ की कमी का सीधा असर अस्पताल की सफाई व्यवस्था और मरीजों की देखभाल पर पड़ रहा है। कई वार्डों में परिजन ही मरीजों की सेवा करते नजर आते हैं। डॉक्टरों और स्टाफ की कमी के कारण अस्पताल की सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। ओपीडी में मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ता है, इमरजेंसी में समय पर विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं मिल पाते, ऑपरेशन टल जाते हैं और जांच रिपोर्ट समय पर नहीं मिलती। कई मरीज बिना इलाज के ही वापस लौटने को मजबूर हो जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही रिक्त पदों पर भर्ती नहीं की गई, तो आने वाले समय में स्थिति और गंभीर हो सकती है। जिला अस्पताल, जो पूरे क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, वह खुद ही कमजोर होता जा रहा है।
इनका कहना
जिला अस्पताल में नियमित चिकित्सक 50 प्रतिशत कम हैं, विशेषज्ञों की भी कमी है, इसके कारण थोड़ा असुविधा होती है। समय-समय पर शासन को पदस्थापना के लिए पत्राचार किए जाते हैं। कई बार पत्राचार किए गए हैं। जितना स्टॉफ है उसी में ही बेहतर कार्य किया जा रहा है। मरीजों को समुचित उपचार मिले यह प्राथमिकता है।


