फसल तैयार, लेकिन बागान से बाजार तक नहीं पहुंच रही कॉफी की खुशबू

फसल तैयार, लेकिन बागान से बाजार तक नहीं पहुंच रही कॉफी की खुशबू

कर्नाटक Karnataka के कॉफी उत्पादक इन दिनों भारी आर्थिक दबाव का सामना कर रहे हैं। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर अब राज्य के कॉफी किसानों पर दिखाई दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में आई अस्थिरता के चलते कॉफी की कीमतों Coffee में अचानक गिरावट आई है, जिससे किसान अपनी उपज रोककर रखने को मजबूर हो गए हैं।

दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच फसल कटाई के दौरान कॉफी के दाम स्थिर और लाभकारी बने हुए थे। लेकिन मार्च में जैसे ही पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा, बाजार में अस्थिरता आ गई और कीमतों में करीब 20 से 30 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। इस गिरावट का मुख्य कारण निर्यात बाजारों, खासकर खाड़ी और पश्चिम एशियाई देशों में आई बाधाएं मानी जा रही हैं।

कॉफी गोदाम में ही पड़ी है

कोडुगू जिले के वीराजपेट के एक छोटे उत्पादक पूवन्ना ने कहा, हमने फसल तो समय पर तैयार कर ली, लेकिन अब बाजार में दाम इतने गिर गए हैं कि बेचने का मन नहीं हो रहा। इसलिए कॉफी गोदाम में ही पड़ी है। इस स्थिति ने नकदी प्रवाह को प्रभावित किया है, जिससे खाद, मजदूरी और अन्य जरूरी खर्च पूरे करना कठिन हो गया है।

कई किसान घाटे में ही उपज बेचने को मजबूर

चिक्कमगलूरु के किसान रविंद्रन ने बताया कि कई बागान मालिकों के सामने मजबूरी है कि वे घाटे में ही कॉफी बेचें। बैंक लोन चुकाने की समयसीमा तय होती है, जिसे टाला नहीं जा सकता। ऐसे में हमें कम दाम पर भी बिक्री करनी पड़ रही है। आमतौर पर इसी समय हम फसल बेचकर कर्ज चुकाते हैं और बाकी पैसे से साल भर का खर्च चलाते हैं। लेकिन, इस बार मुनाफा तो दूर, लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है।

यूरोप अभी भी सबसे बड़ा बाजार

कॉफी बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि 1 जनवरी से 25 मार्च के बीच भारत ने 1,20,874 टन कॉफी का निर्यात किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में अधिक है। तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात, जॉर्डन, लीबिया, मिस्र, कुवैत और सऊदी अरब जैसे पश्चिम एशियाई देशों में निर्यात का बड़ा हिस्सा गया है। हालांकि, निर्यात मात्रा में बढ़ोतरी के बावजूद किसानों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। यूरोप अभी भी सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है, जहां इटली, रूस और जर्मनी प्रमुख खरीदार हैं।

कीमतें स्थिर होने का इंतजार

किसानों का कहना है कि फिलहाल वे बाजार में सुधार का इंतजार कर रहे हैं। जब तक कीमतें स्थिर नहीं होतीं, तब तक वे अपनी उपज को रोककर रखने की रणनीति अपनाएंगे, भले ही इससे आर्थिक दबाव और बढ़ जाए।

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