BRABU मुजफ्फरपुर में फर्जी अनुभव प्रमाणपत्रों का खुलासा:टीचर की नियुक्तियां-वेतन रुकी, कुलपति ने कहा-खामियां मिली हैं

बिहार के बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय (BRABU), मुजफ्फरपुर में सहायक प्रोफेसरों की नियुक्ति में अनुभव प्रमाणपत्रों को लेकर अनियमितता सामने आई है। इस खुलासे के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने कई नवनियुक्त शिक्षकों की ज्वाइनिंग रोक दी है और कइयों का वेतन भुगतान तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया है। मामला साल 2020 से 2025 के बीच बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग (BSUSC) के माध्यम से हुई नियुक्तियों से संबंधित है। चयन प्रक्रिया में शिक्षण अनुभव के आधार पर अभ्यर्थियों को अतिरिक्त अंक दिए जाते हैं। जांच में सामने आया है कि बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों ने मेरिट लिस्ट में बेहतर स्थान पाने के लिए फर्जी या संदिग्ध अनुभव प्रमाणपत्रों का उपयोग किया। विश्वविद्यालय की ओर से गठित जांच समिति की रिपोर्ट के अनुसार, प्रमाणपत्रों में तीन प्रमुख अनियमितताएं पाई गई हैं। पहली, कई अभ्यर्थियों ने ‘रिसोर्स पर्सन’ या ‘अवैतनिक सेवा’ का अनुभव प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया। जबकि यूजीसी और राज्य सरकार के नियमों के अनुसार, केवल स्वीकृत और सवेतन पद पर किया गया काम ही अनुभव माना जाता है। एफिलिएशन नहीं होने के बावजूद अनुभव पत्र जारी किए दूसरी अनियमितता यह है कि कुछ कॉलेजों ने बिना किसी स्वीकृत पद के ही अभ्यर्थियों को अनुभव प्रमाणपत्र जारी कर दिए। कुछ मामलों में तो कॉलेज के पास संबंधित विषय की एफिलिएशन भी नहीं थी, फिर भी वहां से अनुभव पत्र दिए गए। तीसरी गड़बड़ी बैकडेटिंग और फर्जी हस्ताक्षरों से संबंधित है। कई दस्तावेजों पर तारीखों और हस्ताक्षरों को लेकर संदेह व्यक्त किया गया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि ये प्रमाणपत्र नियुक्ति प्रक्रिया को प्रभावित करने के उद्देश्य से तैयार किए गए थे। कुलपति का कड़ा रुख और आयोग की भूमिका विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दिनेश चंद्र राय ने इस मामले पर सख्त रुख अपनाया किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि शिक्षा की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। कुलपति ने कहा, “जांच में कई तरह की तकनीकी और प्रक्रियात्मक खामियां मिली हैं। हमने पूरी विस्तृत रिपोर्ट बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग (BSUSC) को भेज दी है। अब आगे की कार्रवाई आयोग के दिशा-निर्देशों के आधार पर की जाएगी।” शिक्षकों पर लटकी बर्खास्तगी की तलवार फिलहाल, जिन शिक्षकों के प्रमाणपत्र संदिग्ध पाए गए हैं, उनकी नियुक्ति प्रक्रिया को ‘होल्ड’ पर डाल दिया गया है। यदि आयोग की अंतिम जांच में ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित सहायक प्रोफेसरों की नियुक्ति रद्द कर दी जाएगी। इसके अलावा, गलत जानकारी देने के आरोप में उन पर कानूनी कार्रवाई और प्राथमिकी (FIR) दर्ज होने की भी पूरी संभावना है। साथ ही, उन कॉलेज प्रबंधनों और प्राचार्यों की भी जवाबदेही तय की जा रही है जिन्होंने ये फर्जी प्रमाण पत्र जारी किए। बिहार के बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय (BRABU), मुजफ्फरपुर में सहायक प्रोफेसरों की नियुक्ति में अनुभव प्रमाणपत्रों को लेकर अनियमितता सामने आई है। इस खुलासे के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने कई नवनियुक्त शिक्षकों की ज्वाइनिंग रोक दी है और कइयों का वेतन भुगतान तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया है। मामला साल 2020 से 2025 के बीच बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग (BSUSC) के माध्यम से हुई नियुक्तियों से संबंधित है। चयन प्रक्रिया में शिक्षण अनुभव के आधार पर अभ्यर्थियों को अतिरिक्त अंक दिए जाते हैं। जांच में सामने आया है कि बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों ने मेरिट लिस्ट में बेहतर स्थान पाने के लिए फर्जी या संदिग्ध अनुभव प्रमाणपत्रों का उपयोग किया। विश्वविद्यालय की ओर से गठित जांच समिति की रिपोर्ट के अनुसार, प्रमाणपत्रों में तीन प्रमुख अनियमितताएं पाई गई हैं। पहली, कई अभ्यर्थियों ने ‘रिसोर्स पर्सन’ या ‘अवैतनिक सेवा’ का अनुभव प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया। जबकि यूजीसी और राज्य सरकार के नियमों के अनुसार, केवल स्वीकृत और सवेतन पद पर किया गया काम ही अनुभव माना जाता है। एफिलिएशन नहीं होने के बावजूद अनुभव पत्र जारी किए दूसरी अनियमितता यह है कि कुछ कॉलेजों ने बिना किसी स्वीकृत पद के ही अभ्यर्थियों को अनुभव प्रमाणपत्र जारी कर दिए। कुछ मामलों में तो कॉलेज के पास संबंधित विषय की एफिलिएशन भी नहीं थी, फिर भी वहां से अनुभव पत्र दिए गए। तीसरी गड़बड़ी बैकडेटिंग और फर्जी हस्ताक्षरों से संबंधित है। कई दस्तावेजों पर तारीखों और हस्ताक्षरों को लेकर संदेह व्यक्त किया गया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि ये प्रमाणपत्र नियुक्ति प्रक्रिया को प्रभावित करने के उद्देश्य से तैयार किए गए थे। कुलपति का कड़ा रुख और आयोग की भूमिका विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दिनेश चंद्र राय ने इस मामले पर सख्त रुख अपनाया किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि शिक्षा की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। कुलपति ने कहा, “जांच में कई तरह की तकनीकी और प्रक्रियात्मक खामियां मिली हैं। हमने पूरी विस्तृत रिपोर्ट बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग (BSUSC) को भेज दी है। अब आगे की कार्रवाई आयोग के दिशा-निर्देशों के आधार पर की जाएगी।” शिक्षकों पर लटकी बर्खास्तगी की तलवार फिलहाल, जिन शिक्षकों के प्रमाणपत्र संदिग्ध पाए गए हैं, उनकी नियुक्ति प्रक्रिया को ‘होल्ड’ पर डाल दिया गया है। यदि आयोग की अंतिम जांच में ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित सहायक प्रोफेसरों की नियुक्ति रद्द कर दी जाएगी। इसके अलावा, गलत जानकारी देने के आरोप में उन पर कानूनी कार्रवाई और प्राथमिकी (FIR) दर्ज होने की भी पूरी संभावना है। साथ ही, उन कॉलेज प्रबंधनों और प्राचार्यों की भी जवाबदेही तय की जा रही है जिन्होंने ये फर्जी प्रमाण पत्र जारी किए।  

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