किताबें पढ़ लो, केस स्टडी कर लो, लेकिन असली ज़िंदगी में जब धक्का खाते हैं, तब पता चलता है कि कोई भी MBA आपको वो नहीं सिखा सकता जो तजुर्बा सिखाता है। उद्यमी और मेंटर अंकुर वारिकू ने हाल ही में तीन ऐसी फिल्में बताई हैं, जिन्हें वे बार-बार देखते हैं। इनमें हॉलीवुड और बॉलीवुड दोनों फिल्में शामिल हैं। वारिकू के अनुसार ये फिल्में किसी को एमबीए से भी ज्यादा नॉलेज दे सकती हैं। आइए इनके बारे में जानते हैं
The Pursuit of Happyness
यह फिल्म देखकर आपकी आंख भर जाएगी। 2006 की यह फिल्म एक असली इंसान की कहानी है। Will Smith ने Chris Gardner का किरदार निभाया है जो अपनी सारी जमापूंजी एक मशीन में लगा देता है। बीवी चली जाती है, घर छूट जाता है। उन्हे बेटे के साथ रेलवे स्टेशन के शौचालय में रातें गुजारनी पड़ती हैं। फिर भी वे हार नहीं मानते। एक बिना तनख्वाह वाली इंटर्नशिप से शुरुआत होती है और आखिर में वे करोड़ों का ब्रोकरेज फर्म खड़ा करत हैं। वारिकू कहते हैं कि जब कुछ भी काम नहीं आता, तब भी आगे बढ़ते रहना, यही इस फिल्म की असली सीख है।
Rocket Singh: Salesman of the Year
रणबीर कपूर की यह 2009 की फिल्म देखने में एक साधारण Bollywood ड्रामा लगती है। लेकिन जो इसकी परतें समझता है, उसे पता चलता है कि यह दरअसल एक startup की कहानी है। हरप्रीत सिंह बेदी एक ऐसी कंपनी में काम करता है जहां बेईमानी आम बात है। वो इससे परेशान होकर अपने कुछ साथियों के साथ चुपचाप अपनी खुद की Rocket Sales Corporation शुरू कर देता है, ग्राहकों को ईमानदारी से सर्विस देता है। लोग कहते हैं कि ऐसे नहीं चलता धंधा। लेकिन वो साबित करता है कि चलता है। भारत के कॉर्पोरेट जगत में नैतिकता और सफलता का यह टकराव बहुत असली लगता है। इसीलिए वारिकू इसे बार-बार देखते हैं।
The Social Network
2010 की यह फिल्म फेसबुक की शुरुआत की कहानी है। मार्क जुकरबर्ग का किरदार Jesse Eisenberg ने निभाया है। लेकिन यह सिर्फ एक वेबसाइट बनने की कहानी नहीं है। साल 2003 में हार्वर्ड में एक लड़का है जिसे गर्लफ्रेंड ने छोड़ दिया। गुस्से में वो Facemash बनाता है। फिर Winklevoss भाइयों से मुलाकात होती है, दोस्त Eduardo Saverin के साथ फेसबुक की नींव पड़ती है, Sean Parker आता है और सब कुछ बदल जाता है। दोस्ती टूटती है, मुकदमे होते हैं, पैसा आता है। यह फिल्म सिखाती है कि एक बड़ा बिज़नेस खड़ा करने में सिर्फ आइडिया नहीं लगता, रिश्ते दांव पर लगाने पड़ते हैं, कड़े फैसले लेने पड़ते हैं और कभी-कभी सबसे करीबी लोग ही सामने खड़े मिलते हैं। वारिकू कहते हैं कि ये तीनों फिल्में उन इमोशंस की कहानी हैं, जो हर उस इंसान ने महसूस किये हैं, जिसने कुछ बनाने की कोशिश की है।


