Vanakkam Poorvottar: Tamilnadu में बेहद रोचक हुई चुनावी जंग, त्रिशंकु विधानसभा के आसार के बीच DMK की टेंशन बढ़ी

Vanakkam Poorvottar: Tamilnadu में बेहद रोचक हुई चुनावी जंग, त्रिशंकु विधानसभा के आसार के बीच DMK की टेंशन बढ़ी
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव इस बार कई मायनों में बेहद रोचक और अप्रत्याशित बनने जा रहा है। राज्य की 234 सदस्यीय विधानसभा के लिए 23 अप्रैल को मतदान होगा और 4 मई को नतीजे घोषित किए जाएंगे। करीब 6 करोड़ मतदाता इस चुनाव में भाग लेकर नई सरकार चुनेंगे। अभी तक के आंकड़ों के मुताबिक लगभग 21 दलों ने करीब 2200 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, निर्दलीय उम्मीदवार भी बड़ी संख्या में मैदान में हैं, जिससे साफ है कि मुकाबला बेहद कड़ा और बहुकोणीय होने वाला है।
देखा जाये तो पिछले लगभग 70 वर्षों से तमिलनाडु की राजनीति दो प्रमुख द्रविड़ दलों के इर्द गिर्द घूमती रही है, जिनमें एक तरफ द्रमुक और दूसरी तरफ अन्नाद्रमुक रही है। दोनों दल बारी बारी से सत्ता में आते रहे हैं, लेकिन इस बार समीकरण बदले हुए नजर आ रहे हैं। द्रमुक ने गठबंधन के तहत 234 में से 164 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि अन्नाद्रमुक गठबंधन सहयोगियों को सीटें देने के बाद खुद 167 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या इन दलों ने सहयोगियों को कमजोर सीटें दी हैं या उनकी अपनी पकड़ कमजोर हो रही है?

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हम आपको बता दें कि तमिलनाडु के दोनों प्रमुख दलों के गठबंधनों में एक एक राष्ट्रीय दल शामिल है। द्रमुक ने कांग्रेस को 28 सीटें दी हैं, जबकि अन्नाद्रमुक ने भारतीय जनता पार्टी को 27 सीटें सौंपी हैं। यह सीट बंटवारा संकेत देता है कि इस बार विधानसभा त्रिशंकु हो सकती है।
तमिलनाडु की राजनीतिक स्थिति दर्शा रही है कि द्रमुक गठबंधन में आंतरिक असंतोष साफ नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन छह दलों के गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं, लेकिन सहयोगी दल सीट बंटवारे से खुश नहीं हैं। कांग्रेस और डीएमडीके को ज्यादा महत्व मिलने से वाम दलों, वीसीके और एमडीएमके जैसे दल नाराज हैं। इसके अलावा राज्यसभा सीटों के बंटवारे को लेकर भी असंतोष बना हुआ है। कांग्रेस के भीतर भी स्थिति सामान्य नहीं है। कई नेताओं ने खुलकर नाराजगी जताई है और संगठन के अंदर असंतुलन की स्थिति बनी हुई है। इससे जमीनी स्तर पर गठबंधन की मजबूती प्रभावित हो सकती है।
वहीं, भारतीय जनता पार्टी इस बार पूरी ताकत से चुनाव मैदान में उतरी है, लेकिन उसे भी अंदरूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के एक प्रमुख नेता के चुनाव नहीं लड़ने की खबरों ने कुछ समय के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर दी थी, हालांकि बाद में स्थिति संभलती नजर आई।
इस चुनाव की सबसे खास बात यह है कि पहली बार राज्य में चार कोनों वाला मुकाबला देखने को मिल रहा है। तमिल सिनेमा के लोकप्रिय अभिनेता विजय की पार्टी तमिल वेत्रि कषगम ने चुनाव में उतरकर राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। विजय को युवाओं और महिलाओं का भारी समर्थन मिल रहा है और उनकी सभाओं में भारी भीड़ उमड़ रही है। हालांकि विजय के सामने भी चुनौतियां हैं। करूर की दुखद घटना, जिसमें 41 लोगों की जान चली गई थी, लगातार उनके खिलाफ मुद्दा बन रही है। इसके बावजूद उनकी लोकप्रियता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अनुमान है कि वह लगभग 20 से 25 प्रतिशत वोट हासिल कर सकते हैं, जो किसी भी दल के लिए चुनौती बन सकता है। इसके अलावा, सीमैन की पार्टी नाम तमिझर कषगम भी इस चुनाव में अकेले मैदान में है और लगभग 8 प्रतिशत वोट शेयर के साथ एक अहम भूमिका निभा सकती है।
चुनावी मुद्दों की बात करें तो आपको बता दें कि इस बार चुनाव में कानून व्यवस्था, नशे का बढ़ता खतरा, अवैध शराब और विश्वविद्यालयों में अपराध जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। लगभग सभी दल इन मुद्दों को उठा रहे हैं, सिवाय द्रमुक के, जो मुख्य रूप से केंद्र सरकार और विपक्षी दलों पर हमला करने में व्यस्त है। सोशल मीडिया और यूट्यूब चैनल भी इस चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लोग अब पारंपरिक मीडिया के बजाय डिजिटल मंचों पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं। वहीं एआई से बने नकली वीडियो भी भ्रम फैलाने का काम कर रहे हैं, जिनमें पुराने नेताओं के नाम और छवियों का दुरुपयोग हो रहा है।
चुनाव में मुफ्त योजनाएं भी एक बड़ा मुद्दा बनी हुई हैं। विभिन्न दलों ने मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए मुफ्त फ्रिज, लैपटॉप, वाई-फाई, ग्राइंडर और यहां तक कि आठ हजार रुपये के कूपन जैसी घोषणाएं की हैं। विपक्ष इन घोषणाओं को अव्यवहारिक और जनता को भ्रमित करने वाला बता रहा है।
इसके अलावा, जातीय समीकरण भी इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाएंगे। साथ ही अल्पसंख्यक वोटों के बंटने की संभावना के बीच विभिन्न समुदायों का झुकाव चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकता है। एक और महत्वपूर्ण पहलू चुनावी फंडिंग और धन वितरण का है। इस बार कुछ प्रभावशाली कारोबारी परिवारों के कई दलों से जुड़े होने की चर्चा भी जोर पकड़ रही है, जिससे चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।
बहरहाल, तमिलनाडु विधानसभा चुनाव बेहद दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है। चार कोनों वाले मुकाबले, गठबंधनों में असंतोष, नए चेहरों की एंट्री और बदलते सामाजिक समीकरणों के बीच यह कहना मुश्किल है कि किसे स्पष्ट बहुमत मिलेगा। ऐसा लगता है कि कई सीटों पर जीत का अंतर हजार वोट से भी कम रह सकता है, जिससे यह चुनाव और भी रोमांचक बन गया है। इस बार का चुनाव न केवल तमिलनाडु की राजनीति का भविष्य तय करेगा, बल्कि यह भी दिखाएगा कि क्या राज्य में पारंपरिक दो दलों का दबदबा कायम रहेगा या नई ताकतें उभरकर सत्ता के समीकरण बदल देंगी?

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