मदरसा बोर्ड खत्म करने पर बवाल: मौलाना शहाबुद्दीन का धामी सरकार पर तीखा हमला, इतिहास पढ़िए, इल्ज़ाम मत लगाइए

मदरसा बोर्ड खत्म करने पर बवाल: मौलाना शहाबुद्दीन का धामी सरकार पर तीखा हमला, इतिहास पढ़िए, इल्ज़ाम मत लगाइए

बरेली। उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म करने के फैसले और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बयान पर सियासी और धार्मिक बहस तेज हो गई है। ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने इस फैसले को बड़ी गलती बताते हुए सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि मदरसों पर जिहाद की शिक्षा देने का आरोप लगाना न सिर्फ गलत है, बल्कि यह देश के इतिहास और संविधान के भी खिलाफ है।

मौलाना शहाबुद्दीन ने कहा कि मदरसों का इतिहास गौरवशाली रहा है। 1857 की क्रांति से लेकर 1947 तक और हाल के वर्षों में भी मदरसों से जुड़े उलमा ने देश के लिए कुर्बानियां दी हैं। उनका दावा है कि करीब 55 हजार उलमा और छात्र अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हुए। उन्होंने कहा कि ऐसे संस्थानों पर सवाल उठाना उन बलिदानों का अपमान है।

बिना इतिहास पढ़े जिहाद का आरोप असंवैधानिक

मौलाना ने मुख्यमंत्री धामी के बयान पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि बिना इतिहास को समझे मदरसों को जिहादी सोच से जोड़ना असंवैधानिक है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक पद पर बैठे लोगों को शिक्षा संस्थानों में सुधार की बात करनी चाहिए, न कि उन्हें बदनाम करने का काम करना चाहिए। उन्होंने उत्तराखंड सरकार पर आरोप लगाया कि राज्य में 250 मदरसों को बंद कर दिया गया है और 125 सूफी मजारों पर बुलडोजर चलाया गया। मौलाना ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई धार्मिक शिक्षा को खत्म करने की दिशा में उठाया गया कदम है और इससे समाज में गलत संदेश जा रहा है।

धामी का बयान: जिहादी सोच नहीं बनने देंगे

वहीं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मदरसा बोर्ड खत्म करने के फैसले को सही ठहराते हुए कहा था कि राज्य में विभाजनकारी सोच को रोकना जरूरी है। उन्होंने कहा कि मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को भी मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ा जाना चाहिए और एक समान पाठ्यक्रम लागू किया जाएगा। धामी ने साफ कहा कि सरकार नहीं चाहती कि ये संस्थान जिहादी सोच या अलगाववाद के केंद्र बनें। मुख्यमंत्री के अनुसार, जुलाई 2026 से मदरसों में भी वही पाठ्यक्रम लागू किया जाएगा, जो राज्य के अन्य शिक्षा बोर्ड में लागू है। सरकार का उद्देश्य बच्चों को आधुनिक शिक्षा से जोड़कर उन्हें देश की मुख्यधारा में शामिल करना है।

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