US-Israel-Iran War: अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान के बीच चल रहे युद्ध में एक नया मोड़ आ गया है। अमेरिका के कई पारंपरिक सहयोगी देश अब उसकी सैन्य कार्रवाइयों में सीधा साथ देने को तैयार नहीं हैं। फ्रांस, इटली, स्पेन और स्विट्जरलैंड ने अमेरिकी सैन्य विमानों को अपने हवाई क्षेत्र (एयरस्पेस) और सैन्य अड्डों का उपयोग करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। इससे अमेरिकी रणनीतिक योजनाओं पर असर पड़ा है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप काफी नाराज दिख रहे हैं।
इन 4 मित्र देशों ने अमेरिकी सैन्य विमानों को उतरने से रोका
यह फैसला ईरान युद्ध के दौरान यूरोपीय देशों की बढ़ती अनिच्छा को दर्शाता है। ये चार देश नाटो के सदस्य या निकट सहयोगी हैं, फिर भी उन्होंने प्रत्यक्ष संघर्ष से दूरी बनाए रखने का फैसला किया है। स्विट्जरलैंड ने तो अपनी पारंपरिक तटस्थता (neutrality) का हवाला देते हुए ईरान युद्ध से जुड़े अमेरिकी सैन्य उड़ानों की दो अनुमतियों को खारिज कर दिया। स्पेन ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह अमेरिकी विमानों को न तो अपने हवाई क्षेत्र में आने देगा और न ही संयुक्त सैन्य अड्डों का इस्तेमाल करने देगा। फ्रांस और इटली ने भी इसी रुख को अपनाया है।
नाराज ट्रंप ने किया पलटवार
ट्रंप ने न्यूयॉर्क पोस्ट को दिए इंटरव्यू में इन देशों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, ‘जब भविष्य में इन देशों को अमेरिकी मदद की जरूरत पड़ेगी, तब संयुक्त राज्य अमेरिका भी उनका साथ नहीं देगा।’ ट्रंप ने नाटो सहयोगियों को चेतावनी देते हुए तंज कसा, ‘वे या तो अमेरिका से एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) खरीदें या फिर स्ट्रेट ऑफ हरमुज से खुद जाकर तेल लेकर आएं।’ अमेरिकी रक्षा सचिव ने भी साफ कहा कि ईरान के साथ चल रहा युद्ध केवल ट्रंप की शर्तों पर ही खत्म होगा।
अमेरिका का दावा- ईरान हो गया पूरी तरह कमजोर
ट्रंप का दावा है कि अमेरिका ने ईरान को पूरी तरह कमजोर कर दिया है और अब उसके पास ज्यादा ताकत नहीं बची। उनका कहना है कि मुख्य लक्ष्य ईरान को परमाणु हथियारों से दूर रखना है, जिसके बाद स्ट्रेट ऑफ हरमुज स्वाभाविक रूप से खुल जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर जरूरी हुआ तो अमेरिका ईरान को पूरी तरह समाप्त करने से भी नहीं हिचकेगा।
जंग से ब्रिटेन ने भी बनाई दूरी
ब्रिटेन ने हालांकि प्रत्यक्ष युद्ध में शामिल होने से इनकार किया है, लेकिन क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। ब्रिटेन का कहना है कि उसका उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना और अपने नागरिकों व सहयोगियों की सुरक्षा करना है, न कि युद्ध में कूदना।


