तीसरी भाषा के अंक हटाने पर सियासी घमासान, भाजपा का कांग्रेस पर हमला

तीसरी भाषा के अंक हटाने पर सियासी घमासान, भाजपा का कांग्रेस पर हमला

-वोट बैंक की राजनीति छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ : अशोक

कर्नाटक Karnataka में एसएसएलसी SSLC (कक्षा 10) परीक्षा में तीसरी भाषा (हिंदी सहित) के अंक शामिल न करने के फैसले पर राजनीति तेज हो गई है। विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक R. Ashoka ने भी एसएसएलसी परीक्षा में तीसरी भाषा के लिए अंक के बजाय ग्रेडिंग प्रणाली लागू करने के राज्य सरकार के फैसले को शुद्ध राजनीति करार दिया है।

लाखों छात्रों ने हिंदी की पढ़ाई की

उन्होंने सोमवार को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, यह फैसला ऐसे समय लिया गया है जब छात्र पूरे वर्ष परीक्षा की तैयारी कर चुके हैं। अगर सरकार में समझदारी होती तो यह निर्णय साल की शुरुआत में लिया जाता। लाखों छात्रों ने हिंदी Hindi की पढ़ाई की, जिससे उनके प्रतिशत में सुधार होता, लेकिन अब यह एकतरफा फैसला लिया गया है। अशोक ने इसे छात्रों के साथ अन्याय बताते हुए कहा कि बच्चे इस तरह के फैसलों से प्रभावित होते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार वोट बैंक की राजनीति कर रही है।

उन्होंने यह भी कहा कि महात्मा गांधी ने 1918 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की थी और पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने भी तीन-भाषा फार्मूले को बढ़ावा दिया था। यदि कर्नाटक के छात्र आइएएस-आपीएस बनकर हिंदी भाषी राज्यों में जाते हैं, तो भाषा का ज्ञान जरूरी होगा। केंद्र सरकार के खिलाफ नाराजगी में लिया गया यह फैसला छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ है।

राष्ट्र निर्माण के लिए एक संपर्क भाषा जरूरी

विधायक डॉ. सी. एन. अश्वथनारायण ने कांग्रेस सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि राष्ट्र निर्माण के लिए एक संपर्क भाषा जरूरी है और हिंदी का विरोध करने की आवश्यकता नहीं है।

उन्होंने आरोप लगाया कि यह फैसला राजनीतिक उद्देश्य से लिया गया है और छात्रों के हितों के खिलाफ है। तीन-भाषा नीति आजादी से पहले से लागू रही है और कांग्रेस शासन में भी जारी थी, ऐसे में अचानक बदलाव का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि तीसरी भाषा किसी भी भारतीय भाषा—चाहे वह क्षेत्रीय हो या मातृभाषा—हो सकती है।

तीसरी भाषा की अनदेखी से शिक्षा पर पड़ेगा असर

कर्नाटक विधान परिषद सदस्य के. विवेकानंद ने कहा, तीसरी भाषा केवल हिंदी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मराठी, तेलुगु, उर्दू और संस्कृत जैसी भाषाएं भी शामिल हैं। एसएसएलसी परीक्षा के दौरान इस तरह का फैसला पूरी तरह अनुचित है। छात्रों की सीखने की क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या को लिखे पत्र में उन्होंने बताया कि सरकारी और निजी स्कूलों में बड़ी संख्या में शिक्षक तीसरी भाषा पढ़ाते हैं।विवेकानंद ने कहा कि कई भाषाओं का ज्ञान छात्रों के संवाद कौशल को मजबूत करता है और उनके पेशेवर जीवन में भी मददगार होता है। उन्होंने चेतावनी दी कि तीसरी भाषा के महत्व को कम करने से छात्रों की भाषाई दक्षता कमजोर हो सकती है और विविधता की भावना पर भी असर पड़ेगा। सरकार को इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *