“पर्दा शिक्षा और सपनों के बीच नहीं होनी चाहिए। अगर परिवार साथ दें, तो एक लड़की पर्दा में रह कर दुनिया जीत सकती है। लोगों को लगता है कि लड़की पर्दे में रह कर क्या ही करेगी। मैंने भी भेद भाव झेला है। लोग कहते थे कि ये स्कूल जाकर क्या करेगी।” ये कहना बेंगलुरु में एक मस्जिद में इमाम की बेटी नाहिद का है। जिन्होंने मैट्रिक की परीक्षा में स्टेट में दूसरा स्थान हासिल किया है। बिहार विद्यालय परीक्षा समिति की ओर से जारी 10वीं के नतीजों में बेगूसराय की नाहिद सुल्तान ने अपनी मेधा का परचम लहराया है। इन्होंने 489 नंबर लाकर पूरे प्रदेश में द्वितीय स्थान हासिल किया है। भगवानपुर प्रखंड के बनवारीपुर हाई स्कूल की छात्रा नाहिद की ये जीत केवल अंकों की नहीं, बल्कि उन सामाजिक बेड़ियों के खिलाफ भी है जो अक्सर बेटियों की राह रोकती हैं। नाहिद सुल्तान ने अपनी इस ऐतिहासिक सफलता के बाद मुस्लिम समाज में व्याप्त पर्दा प्रथा और लड़कियों की शिक्षा को लेकर कड़ा संदेश दिया है। नाहिद ने कहा कि उनके समाज में आज भी लड़कियों को घर की दहलीज तक सीमित रखने की कोशिश की जाती है। मुस्लिम समाज में पर्दा प्रथा एक बहुत बड़ा अंधविश्वास बन चुका है। पर्दे में रह कर दुनिया जीत सकती लड़की उन्होंने कहा है कि आज भी लोग सोचते हैं कि लड़कियां पर्दे में रहकर क्या करेंगी या वे बाहर नहीं निकल सकती। मेरा मानना है कि पर्दा संस्कारों और आंखों में होना चाहिए, न कि हमारी शिक्षा और सपनों के बीच होनी चाहिए। पर्दे में रहकर भी एक लड़की दुनिया जीत सकती है, बस उसे परिवार का साथ मिलना चाहिए। तैयार होकर स्कूल जाना, स्कूल जाते समय मुस्लिम लड़की के संबंध में तरह-तरह की बातें सुनना, रोज होता था। महिलाएं कहती थी कि स्कूल जाकर क्या करोगी, लेकिन हमने सभी की बात को नजर अंदाज किया और नियमित स्कूल जाती रही। सुबह 5:30 बजे उठ जाती थी, फिर 2 घंटा पढ़ने के बाद नाश्ता करती थी। उसके बाद ऑनलाइन क्लास और ऑफलाइन क्लास होता था। फिर खाना खाकर सेल्फ स्टडी करते थे। शाम में थोड़ा घूमने के बाद फिर दिन भर पढ़ी गई चीजों का रिवीजन करते थे, यही मेरा रोज का रूटीन रहा। नाहिद ने आगे कहा कि उनके समाज के लोगों को यह समझना होगा कि शिक्षा पर सबका बराबर हक है और बेटियां भी परिवार के साथ-साथ देश का नाम रोशन कर सकती हैं। पिता सोहराब आलम बेंगलुरु में इमाम नाहिद सुल्तान के पिता सोहराब आलम बेंगलुरु में एक मस्जिद में इमाम हैं। अपनी बेटी की इस उपलब्धि पर वे बेहद गर्व महसूस कर रहे हैं। नाहिद तीन भाइयों के बीच इकलौती बहन है। उसकी मां नूर सबा एक गृहिणी हैं। नाहिद ने अपनी सफलता का श्रेय अपने पिता के अटूट विश्वास और स्कूल के शिक्षकों को दिया है। भविष्य के बारे में बात करते हुए नाहिद ने बताया कि वह डॉक्टर बनना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि कोरोना काल के दौरान देखा कि किस तरह इलाज के अभाव में लोग असमय मौत के मुंह में चले गए। उस बेबसी ने मुझे बहुत आहत किया। मैं मेडिकल की पढ़ाई कर गरीब और जरूरतमंद मरीजों की सेवा करना चाहती हूं। नाहिद ने किसी बड़े कोचिंग संस्थान की मदद नहीं ली। उन्होंने बताया कि वह रोजाना 6 से 7 घंटे की सेल्फ स्टडी करती थीं। उन्होंने डिजिटल इंडिया का फायदा उठाते हुए ऑनलाइन क्लासेस और यूट्यूब के जरिए अपनी तैयारी को धार दी। सोशल साइंस में मिले 100 नंबर बोर्ड के इंटरव्यू के दौरान उसकी राइटिंग चेक की गई और कुछ गहन प्रश्न पूछे गए, जिनका उसने बिना किसी हिचकिचाहट आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया। अगर नाहिद को विभिन्न विषयों में मिले मिले नंबर की बात करें तो उर्दू में 99 नंबर और गणित में 99 नंबर मिले हैं। जबकि साइंस में 95 नंबर और हिंदी में 96 नंबर हासिल हुए है। जबकि, सोशल साइंस इसने पूरे 100 नंबर हासिल किए हैं। नाहिद ने यह साबित कर दिया कि यदि हौसले बुलंद हो तो कोई भी सामाजिक परंपरा या रुकावट शिक्षा के रास्ते में बाधा नहीं बन सकती। उन्होंने अपनी सफलता से उन तमाम लोगों को जवाब दिया है, जो बेटियों की शिक्षा को सीमित दायरे में देखते हैं। नाहिद की यह कहानी बिहार के उन हजारों छात्र-छात्राओं के लिए प्रेरणा है, जो अभावों और सामाजिक चुनौतियों के बीच अपने सपनों को हकीकत में बदलने की हिम्मत रखते हैं। “पर्दा शिक्षा और सपनों के बीच नहीं होनी चाहिए। अगर परिवार साथ दें, तो एक लड़की पर्दा में रह कर दुनिया जीत सकती है। लोगों को लगता है कि लड़की पर्दे में रह कर क्या ही करेगी। मैंने भी भेद भाव झेला है। लोग कहते थे कि ये स्कूल जाकर क्या करेगी।” ये कहना बेंगलुरु में एक मस्जिद में इमाम की बेटी नाहिद का है। जिन्होंने मैट्रिक की परीक्षा में स्टेट में दूसरा स्थान हासिल किया है। बिहार विद्यालय परीक्षा समिति की ओर से जारी 10वीं के नतीजों में बेगूसराय की नाहिद सुल्तान ने अपनी मेधा का परचम लहराया है। इन्होंने 489 नंबर लाकर पूरे प्रदेश में द्वितीय स्थान हासिल किया है। भगवानपुर प्रखंड के बनवारीपुर हाई स्कूल की छात्रा नाहिद की ये जीत केवल अंकों की नहीं, बल्कि उन सामाजिक बेड़ियों के खिलाफ भी है जो अक्सर बेटियों की राह रोकती हैं। नाहिद सुल्तान ने अपनी इस ऐतिहासिक सफलता के बाद मुस्लिम समाज में व्याप्त पर्दा प्रथा और लड़कियों की शिक्षा को लेकर कड़ा संदेश दिया है। नाहिद ने कहा कि उनके समाज में आज भी लड़कियों को घर की दहलीज तक सीमित रखने की कोशिश की जाती है। मुस्लिम समाज में पर्दा प्रथा एक बहुत बड़ा अंधविश्वास बन चुका है। पर्दे में रह कर दुनिया जीत सकती लड़की उन्होंने कहा है कि आज भी लोग सोचते हैं कि लड़कियां पर्दे में रहकर क्या करेंगी या वे बाहर नहीं निकल सकती। मेरा मानना है कि पर्दा संस्कारों और आंखों में होना चाहिए, न कि हमारी शिक्षा और सपनों के बीच होनी चाहिए। पर्दे में रहकर भी एक लड़की दुनिया जीत सकती है, बस उसे परिवार का साथ मिलना चाहिए। तैयार होकर स्कूल जाना, स्कूल जाते समय मुस्लिम लड़की के संबंध में तरह-तरह की बातें सुनना, रोज होता था। महिलाएं कहती थी कि स्कूल जाकर क्या करोगी, लेकिन हमने सभी की बात को नजर अंदाज किया और नियमित स्कूल जाती रही। सुबह 5:30 बजे उठ जाती थी, फिर 2 घंटा पढ़ने के बाद नाश्ता करती थी। उसके बाद ऑनलाइन क्लास और ऑफलाइन क्लास होता था। फिर खाना खाकर सेल्फ स्टडी करते थे। शाम में थोड़ा घूमने के बाद फिर दिन भर पढ़ी गई चीजों का रिवीजन करते थे, यही मेरा रोज का रूटीन रहा। नाहिद ने आगे कहा कि उनके समाज के लोगों को यह समझना होगा कि शिक्षा पर सबका बराबर हक है और बेटियां भी परिवार के साथ-साथ देश का नाम रोशन कर सकती हैं। पिता सोहराब आलम बेंगलुरु में इमाम नाहिद सुल्तान के पिता सोहराब आलम बेंगलुरु में एक मस्जिद में इमाम हैं। अपनी बेटी की इस उपलब्धि पर वे बेहद गर्व महसूस कर रहे हैं। नाहिद तीन भाइयों के बीच इकलौती बहन है। उसकी मां नूर सबा एक गृहिणी हैं। नाहिद ने अपनी सफलता का श्रेय अपने पिता के अटूट विश्वास और स्कूल के शिक्षकों को दिया है। भविष्य के बारे में बात करते हुए नाहिद ने बताया कि वह डॉक्टर बनना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि कोरोना काल के दौरान देखा कि किस तरह इलाज के अभाव में लोग असमय मौत के मुंह में चले गए। उस बेबसी ने मुझे बहुत आहत किया। मैं मेडिकल की पढ़ाई कर गरीब और जरूरतमंद मरीजों की सेवा करना चाहती हूं। नाहिद ने किसी बड़े कोचिंग संस्थान की मदद नहीं ली। उन्होंने बताया कि वह रोजाना 6 से 7 घंटे की सेल्फ स्टडी करती थीं। उन्होंने डिजिटल इंडिया का फायदा उठाते हुए ऑनलाइन क्लासेस और यूट्यूब के जरिए अपनी तैयारी को धार दी। सोशल साइंस में मिले 100 नंबर बोर्ड के इंटरव्यू के दौरान उसकी राइटिंग चेक की गई और कुछ गहन प्रश्न पूछे गए, जिनका उसने बिना किसी हिचकिचाहट आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया। अगर नाहिद को विभिन्न विषयों में मिले मिले नंबर की बात करें तो उर्दू में 99 नंबर और गणित में 99 नंबर मिले हैं। जबकि साइंस में 95 नंबर और हिंदी में 96 नंबर हासिल हुए है। जबकि, सोशल साइंस इसने पूरे 100 नंबर हासिल किए हैं। नाहिद ने यह साबित कर दिया कि यदि हौसले बुलंद हो तो कोई भी सामाजिक परंपरा या रुकावट शिक्षा के रास्ते में बाधा नहीं बन सकती। उन्होंने अपनी सफलता से उन तमाम लोगों को जवाब दिया है, जो बेटियों की शिक्षा को सीमित दायरे में देखते हैं। नाहिद की यह कहानी बिहार के उन हजारों छात्र-छात्राओं के लिए प्रेरणा है, जो अभावों और सामाजिक चुनौतियों के बीच अपने सपनों को हकीकत में बदलने की हिम्मत रखते हैं।


