हम तो बस इतना चाहते हैं कि वे जब तक हैं बिहार में मुख्यमंत्री बने रहें। अगर वे जाएं तो नालंदा के ही किसी बेटे को बिहार की कमान मिल जाए।- रामटहल साव, नीतीश कुमार के संघर्ष के साथी नीतीश कुमार से जान-पहचान है। उनके बेटे से अभी जान-पहचान नहीं है। उनसे पहचान का कोई फायदा कभी नहीं हुआ, लेकिन लगाव है।- सुरेश प्रसाद, नीतीश के शुरुआत के साथी नीतीश कुमार दिल्ली जाएंगे जरूर, लेकिन बिहार पर उनकी विशेष नजर रहेगी। मैंने उनसे कहा है। मैं मरूंगा तो मेरी अर्थी यात्रा में आप भी शामिल होंगे। नीतीश जाएंगे तो बउआ (निशांत कुमार) आएंगे न। वे आएंगे तब हमलोगों का काम होगा।- सुरेंद्र, जिन्होंने नीतीश को फ्री में चाय पिलाई CM नीतीश कुमार से ये उम्मीदें उन लोगों की हैं, जिनके साथ कभी नीतीश जमीन पर बैठकर भूंजा फांकते थे। हरनौत की गलियों में पसीना बहाते थे। जिनकी चाय दुकान पर घंटों गप्पे मारते थे। मंडे स्पेशल स्टोरी में पढ़िए, नीतीश के बिहार की सियासत छोड़कर दिल्ली जाने पर वे लोग क्या सोचते हैं, जिन्होंने गांव के मुन्ना को मुख्यमंत्री बनाया। नालंदा में नीतीश के संघर्ष के साथी उनके इस फैसले पर क्या कहते हैं?
कॉलेज में जमीन पर गमछा बिछाकर भूंजा फांकते थे नीतीश 2015 के एक रोड एक्सीडेंट में हरनौत के रामटहल साव का पैर टूट गया। अब वे दिव्यांग हैं, लेकिन 26 मार्च को जब नीतीश समृद्धि यात्रा के समापन में बिहारशरीफ पहुंचे तो खुद को रोक नहीं पाए। उनसे मिलने पहुंच गए। हालांकि, नीतीश से मिलने वालों की लिस्ट से उनका नाम काट दिया गया। पंडाल में भी उनके लिए कोई जगह नहीं थी। 73 साल के रामटहल कानू जाति से हैं। कहते हैं, ‘ये लोग आज हमें नीतीश से मिलने से रोक रहे हैं। हम कभी उनके साथ महीनों घूमते थे। 70 के दशक में जब नीतीश हरनौत में अपनी जमीन तैयार कर रहे थे तब न कार थी न भीड़। हमलोग गली-मोहल्ले के साथ नालंदा कॉलेज, किसान कॉलेज और पटेल कॉलेज जैसी जगहों पर लोगों के साथ मीटिंग करते थे।’ रामटहल ने कहा, ‘तब होटल में खाने की व्यवस्था हो इतना किसी के पास पैसा कहां होता था। कॉलेज ग्राउंड में गमछा बिछता था। उस पर भूंजा रख दिया जाता था। सब लोग मिलकर खाते थे। नीतीश कुमार भी साथ बैठकर भूंजा फांकते थे। ये सिलसिला 1974 से 1985 तक चला।’ कार्यकर्ता के घर में सोते थे नीतीश, पसंद थी दाल-भात और करेला की भुजिया हरनौत के तिसकुरवा गांव के सुरेश प्रसाद कुर्मी जाति से हैं। उन्होंने कहा, ’जब नीतीश नेता बनने आए थे तब हरनौत में भोला सिंह का दबदबा था। इस दबदबा को नीतीश कुमार ने तोड़ा। इनका अपना स्टाइल था।’ उन्होंने कहा, ‘नीतीश लोगों का दिल जीतने के लिए दिन-दुपहरिया पैदल ही गली-गली घूमते थे। जहां शाम हो जाती किसी कार्यकर्ता के घर में सो जाते। डायरी में अपने कार्यकर्ताओं का ब्योरा लिखा करते थे। कई रात वे हमारे घर ठहरे। कोई विशेष डिमांड नहीं। उन्हें खाने में दाल-भात और करेला की भुजिया पसंद थी।’ ऑफिस चलता रहे इसके लिए चंदे में अनाज और पैसा मांगते थे अवधेश सिंह और नीतीश की दोस्ती कॉलेज के दिनों की है। नीतीश के टाल संघर्ष समिति से लेकर जदयू तक के वे मेंबर हैं। कहते हैं, ‘मैं नीतीश कुमार के हर संघर्ष में साथी रहा हूं। उनके लिए चुनावी फंड जुटाने से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक का सफर साथ में तय किया है।’ अवधेश सिंह ने बताया, ‘नीतीश इतने खुद्दार थे कि कभी किसी से पैसा नहीं मांगते थे। ऐसे में ऑफिस का खर्च चलाने की जिम्मेदारी हम लोगों की होती थी। हमलोग गांव-गांव घूमकर इनके लिए चंदा जुटाते थे। कोई चावल तो कोई दाल देता था।’ ‘कई घरों से पैसे भी मिल जाते थे। हमलोग सारा चंदा जुटाकर इनके हरनौत स्थित कार्यालय में पहुंचाते थे। इसी चावल-दाल से दफ्तर में खाना बनता था। जब जिसे लगा, इनकी मदद करते गया। मुन्ना सरकार तब इनके बड़े फाइनेंसर थे। पैसे के साथ गाड़ी से भी इनकी मदद करते थे।’ घर चलाने के लिए ठेकेदारी करना चाहते थे नीतीश अवधेश सिंह पुराना किस्सा याद करते हुए बताते हैं, ’नीतीश दो चुनाव हार गए थे। इनकी पत्नी पहले ही इनसे नाराज थी। वो कभी नहीं चाहती थी कि नीतीश राजनीति में आएं। इंजीनियर से उनकी शादी हुई थी, वह इन्हें इंजीनियर वाला काम करते देखना चाहती थीं।’ उन्होंने कहा, ‘नीतीश खुद भी साहस हारने लगे थे। मानसिक के साथ-साथ आर्थिक तौर पर भी पूरी तरह टूट गए थे। चुनाव लड़ने का साहस नहीं बचा था। राजनीति छोड़ने का फैसला ले लिया था। तब हमारी एक मित्र मंडली होती थी। इसके मुखिया वशिष्ठ नारायण सिंह थे। इनके अलावा हम, नीतीश कुमार, विजय कृष्ण और मुन्ना सरकार थे।’ ‘नीतीश ने मंडली में राजनीति छोड़कर ठेकेदारी करने का प्रस्ताव रखा। इसके सारे कागजात वे तैयार कर लिए थे। विजय कृष्ण को नीतीश कुमार का ये फैसला सही नहीं लगा। इन्होंने इनके सारे डॉक्यूमेंट फाड़ दिए। कहा, राजनीति ही आपके लिए सबसे मुफीद है। यही कीजिए।’ जिसने फ्री में चाय पिलाई, उसका कर्ज आज भी अदा कर रहे अवधेश सिंह कहते हैं, ‘नीतीश के पिता वैद थे। उनके घर पर बैठक की मनाही थी। ऐसे में मित्र मंडली की बैठक मुन्ना सरकार के खाद के दुकान पर और शाम में सुरो के चाय दुकान पर होती थी। सुरो फ्री में चाय पिलाता था।’ सुरेंद्र उर्फ सुरो बताते हैं, ’हमारा रिश्ता एक दिन पुराना नहीं है, दशकों बीत गए इस दोस्ती को। हमारी पहली मुलाकात 1962 में स्कूल के दिनों हुई थी। 1974 से 80 तक मेरी चाय दुकान पर रोज 20-25 लोगों की उनकी मित्र मंडली आती थी। मैं सभी को फ्री में चाय-लस्सी पिलाता था।’ उन्होंने कहा, ‘उस वक्त यहां के स्टेशन रोड तिराहा पर उनका ऑफिस था। वे नेता नहीं बख्तियारपुर के लड़के थे। विधायक बनने के बाद भी जब वे बख्तियारपुर आते थे तो चाय पीकर ही पटना जाते थे।’ सुख के नहीं दुख के भी साथी हैं नीतीश, पोते की मौत की खबर पर आए थे अवधेश बताते हैं, ‘जब मैं कॉलेज में था तब मेरे पिताजी का ईंट भट्ठा था। नीतीश रोज हमें ईंट भट्टा से उठाते और दिन भर घूमने के बाद शाम में यहीं ड्रॉप कर देते थे। दोस्त की फिएट कार से हमलोग बिहार के साथ झारखंड भी घूमते थे।’ उन्होंने कहा, ‘नीतीश 1989 में सांसद बने। इसके बाद रेल मंत्री और मुख्यमंत्री। रेलमंत्री बनने के बाद भी महीने में दो बार हमारे घर आते। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी आते रहे। जबसे इनकी तबीयत खराब हुई है, हमारा मिलना कम हो गया है।’ अवधेश अपने जीवन के दुख को याद करते हुए कहते हैं, ‘2019 में एक रोड एक्सिडेंट में मेरे पोते की मौत हो गई। पहले उन्होंने फोन किया और पूरा जिला प्रशासन घंटे भर में मेरी मदद के लिए मेरे घर पर हाजिर हो गया। अगले दिन नीतीश खुद घर आए। एक घंटे तक रुके। हौसला बढ़ाया। बार-बार पूछते रहे कोई जरूरत हो तो बताओ। वे आ गए थे, इससे ज्यादा मुझे और क्या चाहिए।’ दोस्त की पैरवी सुनी, घाट बनाकर कर सपना पूरा किया नीतीश कुमार की मंडली के एक अहम किरदार थे मुन्ना सरकार। सब साथ में बख्तियार के सीढ़ी घाट पर गंगा नदी में नहाते थे। कभी नीतीश और मुन्ना सरकार ने साथ में बख्तियारपुर के सीढ़ी घाट को खूबसूरत घाट और पर्यटन स्थल बनाने का ख्वाब देखा था। नीतीश कुमार ने न केवल इसे अपना ड्रीम प्रोजेक्ट बनाया। बल्कि आज बख्तियारपुर का सीढ़ी घाट एक खूबसूरत टूरिस्ट स्पॉट है। घाट से दूर गई गंगा को भी वो उस घाट तक ले आए हैं। इसे और बेहतर बनाने के प्रयास में जुटे हैं। अवधेश कुमार कहते हैं कि इनके दोस्तों ने जितनी पैरवी की इन्होंने इसे प्राथमिकता से पूरा करवाया। सीएम बनने के बाद भी गांव का न्योता मिलते ही पहुंच जाते हैं नीतीश कुमार के गांव कल्याणबीघा में हमारी मुलाकात अवधेश महतो से हुई। वे कहते हैं, ’नीतीश कुमार आज भी एक ग्रामीण का फर्ज अदा करते हैं। गांव में अगर उनके जानने वाले शादी और शोक जैसे कार्यक्रम में बुलाते हैं तो वे जरूरत आते हैं। कोई भोज का न्योता देता है तो वे आए हैं। अवधेश ने कहा, ‘गांव की पूरी तस्वीर बदल दी। जिस गांव में कभी सड़क पर घुटने भर कीचड़ था। आज वहां चौड़ी और चिकनी सड़क है। बिजली, थाना, अस्पताल, सिंचाई, खेल का मैदान, आईटीआई केंद्र, सबकुछ। जो कुछ भी दिख रहा है सबकुछ नीतीश कुमार के कारण ही है।’ नीतीश कुमार के घर के ठीक सामने जयेश कुमार का घर है। उनके पिता कभी नीतीश कुमार के पक्के साथी हुआ करते थे। उन्होंने कहा, ‘2012 में अपने गांव में उन्होंने सहज वसुधा केंद्र खोला था। इसका फीता काटने खुद नीतीश कुमार आए थे।’ जयेश कुमार ने बताया, ‘बात 2013 की है। मेरे पिता को कैंसर हो गया था। उस समय कैंसर के मरीजों को सरकार की तरफ से 50 हजार रुपए की मदद मिलती थी। हमलोग आवेदन दिए, लेकिन हमें दौड़ाया जा रहा था।’ उन्होंने कहा, ‘तब हम सीधा स्वास्थ्य विभाग के सचिव के पास चले गए। उन्हें बताया कि हम सीएम के गांव के हैं। इसके बाद भी परेशान किया जा रहा है। सेक्रेटरी ने अधिकारी को बुलाकर फटकार लगाई। इसके तुरंत बाद हमलोगों को पैसा मिल गया था। नहीं तो बहुत दौड़ाया जा रहा था।’ हम तो बस इतना चाहते हैं कि वे जब तक हैं बिहार में मुख्यमंत्री बने रहें। अगर वे जाएं तो नालंदा के ही किसी बेटे को बिहार की कमान मिल जाए।- रामटहल साव, नीतीश कुमार के संघर्ष के साथी नीतीश कुमार से जान-पहचान है। उनके बेटे से अभी जान-पहचान नहीं है। उनसे पहचान का कोई फायदा कभी नहीं हुआ, लेकिन लगाव है।- सुरेश प्रसाद, नीतीश के शुरुआत के साथी नीतीश कुमार दिल्ली जाएंगे जरूर, लेकिन बिहार पर उनकी विशेष नजर रहेगी। मैंने उनसे कहा है। मैं मरूंगा तो मेरी अर्थी यात्रा में आप भी शामिल होंगे। नीतीश जाएंगे तो बउआ (निशांत कुमार) आएंगे न। वे आएंगे तब हमलोगों का काम होगा।- सुरेंद्र, जिन्होंने नीतीश को फ्री में चाय पिलाई CM नीतीश कुमार से ये उम्मीदें उन लोगों की हैं, जिनके साथ कभी नीतीश जमीन पर बैठकर भूंजा फांकते थे। हरनौत की गलियों में पसीना बहाते थे। जिनकी चाय दुकान पर घंटों गप्पे मारते थे। मंडे स्पेशल स्टोरी में पढ़िए, नीतीश के बिहार की सियासत छोड़कर दिल्ली जाने पर वे लोग क्या सोचते हैं, जिन्होंने गांव के मुन्ना को मुख्यमंत्री बनाया। नालंदा में नीतीश के संघर्ष के साथी उनके इस फैसले पर क्या कहते हैं?
कॉलेज में जमीन पर गमछा बिछाकर भूंजा फांकते थे नीतीश 2015 के एक रोड एक्सीडेंट में हरनौत के रामटहल साव का पैर टूट गया। अब वे दिव्यांग हैं, लेकिन 26 मार्च को जब नीतीश समृद्धि यात्रा के समापन में बिहारशरीफ पहुंचे तो खुद को रोक नहीं पाए। उनसे मिलने पहुंच गए। हालांकि, नीतीश से मिलने वालों की लिस्ट से उनका नाम काट दिया गया। पंडाल में भी उनके लिए कोई जगह नहीं थी। 73 साल के रामटहल कानू जाति से हैं। कहते हैं, ‘ये लोग आज हमें नीतीश से मिलने से रोक रहे हैं। हम कभी उनके साथ महीनों घूमते थे। 70 के दशक में जब नीतीश हरनौत में अपनी जमीन तैयार कर रहे थे तब न कार थी न भीड़। हमलोग गली-मोहल्ले के साथ नालंदा कॉलेज, किसान कॉलेज और पटेल कॉलेज जैसी जगहों पर लोगों के साथ मीटिंग करते थे।’ रामटहल ने कहा, ‘तब होटल में खाने की व्यवस्था हो इतना किसी के पास पैसा कहां होता था। कॉलेज ग्राउंड में गमछा बिछता था। उस पर भूंजा रख दिया जाता था। सब लोग मिलकर खाते थे। नीतीश कुमार भी साथ बैठकर भूंजा फांकते थे। ये सिलसिला 1974 से 1985 तक चला।’ कार्यकर्ता के घर में सोते थे नीतीश, पसंद थी दाल-भात और करेला की भुजिया हरनौत के तिसकुरवा गांव के सुरेश प्रसाद कुर्मी जाति से हैं। उन्होंने कहा, ’जब नीतीश नेता बनने आए थे तब हरनौत में भोला सिंह का दबदबा था। इस दबदबा को नीतीश कुमार ने तोड़ा। इनका अपना स्टाइल था।’ उन्होंने कहा, ‘नीतीश लोगों का दिल जीतने के लिए दिन-दुपहरिया पैदल ही गली-गली घूमते थे। जहां शाम हो जाती किसी कार्यकर्ता के घर में सो जाते। डायरी में अपने कार्यकर्ताओं का ब्योरा लिखा करते थे। कई रात वे हमारे घर ठहरे। कोई विशेष डिमांड नहीं। उन्हें खाने में दाल-भात और करेला की भुजिया पसंद थी।’ ऑफिस चलता रहे इसके लिए चंदे में अनाज और पैसा मांगते थे अवधेश सिंह और नीतीश की दोस्ती कॉलेज के दिनों की है। नीतीश के टाल संघर्ष समिति से लेकर जदयू तक के वे मेंबर हैं। कहते हैं, ‘मैं नीतीश कुमार के हर संघर्ष में साथी रहा हूं। उनके लिए चुनावी फंड जुटाने से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक का सफर साथ में तय किया है।’ अवधेश सिंह ने बताया, ‘नीतीश इतने खुद्दार थे कि कभी किसी से पैसा नहीं मांगते थे। ऐसे में ऑफिस का खर्च चलाने की जिम्मेदारी हम लोगों की होती थी। हमलोग गांव-गांव घूमकर इनके लिए चंदा जुटाते थे। कोई चावल तो कोई दाल देता था।’ ‘कई घरों से पैसे भी मिल जाते थे। हमलोग सारा चंदा जुटाकर इनके हरनौत स्थित कार्यालय में पहुंचाते थे। इसी चावल-दाल से दफ्तर में खाना बनता था। जब जिसे लगा, इनकी मदद करते गया। मुन्ना सरकार तब इनके बड़े फाइनेंसर थे। पैसे के साथ गाड़ी से भी इनकी मदद करते थे।’ घर चलाने के लिए ठेकेदारी करना चाहते थे नीतीश अवधेश सिंह पुराना किस्सा याद करते हुए बताते हैं, ’नीतीश दो चुनाव हार गए थे। इनकी पत्नी पहले ही इनसे नाराज थी। वो कभी नहीं चाहती थी कि नीतीश राजनीति में आएं। इंजीनियर से उनकी शादी हुई थी, वह इन्हें इंजीनियर वाला काम करते देखना चाहती थीं।’ उन्होंने कहा, ‘नीतीश खुद भी साहस हारने लगे थे। मानसिक के साथ-साथ आर्थिक तौर पर भी पूरी तरह टूट गए थे। चुनाव लड़ने का साहस नहीं बचा था। राजनीति छोड़ने का फैसला ले लिया था। तब हमारी एक मित्र मंडली होती थी। इसके मुखिया वशिष्ठ नारायण सिंह थे। इनके अलावा हम, नीतीश कुमार, विजय कृष्ण और मुन्ना सरकार थे।’ ‘नीतीश ने मंडली में राजनीति छोड़कर ठेकेदारी करने का प्रस्ताव रखा। इसके सारे कागजात वे तैयार कर लिए थे। विजय कृष्ण को नीतीश कुमार का ये फैसला सही नहीं लगा। इन्होंने इनके सारे डॉक्यूमेंट फाड़ दिए। कहा, राजनीति ही आपके लिए सबसे मुफीद है। यही कीजिए।’ जिसने फ्री में चाय पिलाई, उसका कर्ज आज भी अदा कर रहे अवधेश सिंह कहते हैं, ‘नीतीश के पिता वैद थे। उनके घर पर बैठक की मनाही थी। ऐसे में मित्र मंडली की बैठक मुन्ना सरकार के खाद के दुकान पर और शाम में सुरो के चाय दुकान पर होती थी। सुरो फ्री में चाय पिलाता था।’ सुरेंद्र उर्फ सुरो बताते हैं, ’हमारा रिश्ता एक दिन पुराना नहीं है, दशकों बीत गए इस दोस्ती को। हमारी पहली मुलाकात 1962 में स्कूल के दिनों हुई थी। 1974 से 80 तक मेरी चाय दुकान पर रोज 20-25 लोगों की उनकी मित्र मंडली आती थी। मैं सभी को फ्री में चाय-लस्सी पिलाता था।’ उन्होंने कहा, ‘उस वक्त यहां के स्टेशन रोड तिराहा पर उनका ऑफिस था। वे नेता नहीं बख्तियारपुर के लड़के थे। विधायक बनने के बाद भी जब वे बख्तियारपुर आते थे तो चाय पीकर ही पटना जाते थे।’ सुख के नहीं दुख के भी साथी हैं नीतीश, पोते की मौत की खबर पर आए थे अवधेश बताते हैं, ‘जब मैं कॉलेज में था तब मेरे पिताजी का ईंट भट्ठा था। नीतीश रोज हमें ईंट भट्टा से उठाते और दिन भर घूमने के बाद शाम में यहीं ड्रॉप कर देते थे। दोस्त की फिएट कार से हमलोग बिहार के साथ झारखंड भी घूमते थे।’ उन्होंने कहा, ‘नीतीश 1989 में सांसद बने। इसके बाद रेल मंत्री और मुख्यमंत्री। रेलमंत्री बनने के बाद भी महीने में दो बार हमारे घर आते। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी आते रहे। जबसे इनकी तबीयत खराब हुई है, हमारा मिलना कम हो गया है।’ अवधेश अपने जीवन के दुख को याद करते हुए कहते हैं, ‘2019 में एक रोड एक्सिडेंट में मेरे पोते की मौत हो गई। पहले उन्होंने फोन किया और पूरा जिला प्रशासन घंटे भर में मेरी मदद के लिए मेरे घर पर हाजिर हो गया। अगले दिन नीतीश खुद घर आए। एक घंटे तक रुके। हौसला बढ़ाया। बार-बार पूछते रहे कोई जरूरत हो तो बताओ। वे आ गए थे, इससे ज्यादा मुझे और क्या चाहिए।’ दोस्त की पैरवी सुनी, घाट बनाकर कर सपना पूरा किया नीतीश कुमार की मंडली के एक अहम किरदार थे मुन्ना सरकार। सब साथ में बख्तियार के सीढ़ी घाट पर गंगा नदी में नहाते थे। कभी नीतीश और मुन्ना सरकार ने साथ में बख्तियारपुर के सीढ़ी घाट को खूबसूरत घाट और पर्यटन स्थल बनाने का ख्वाब देखा था। नीतीश कुमार ने न केवल इसे अपना ड्रीम प्रोजेक्ट बनाया। बल्कि आज बख्तियारपुर का सीढ़ी घाट एक खूबसूरत टूरिस्ट स्पॉट है। घाट से दूर गई गंगा को भी वो उस घाट तक ले आए हैं। इसे और बेहतर बनाने के प्रयास में जुटे हैं। अवधेश कुमार कहते हैं कि इनके दोस्तों ने जितनी पैरवी की इन्होंने इसे प्राथमिकता से पूरा करवाया। सीएम बनने के बाद भी गांव का न्योता मिलते ही पहुंच जाते हैं नीतीश कुमार के गांव कल्याणबीघा में हमारी मुलाकात अवधेश महतो से हुई। वे कहते हैं, ’नीतीश कुमार आज भी एक ग्रामीण का फर्ज अदा करते हैं। गांव में अगर उनके जानने वाले शादी और शोक जैसे कार्यक्रम में बुलाते हैं तो वे जरूरत आते हैं। कोई भोज का न्योता देता है तो वे आए हैं। अवधेश ने कहा, ‘गांव की पूरी तस्वीर बदल दी। जिस गांव में कभी सड़क पर घुटने भर कीचड़ था। आज वहां चौड़ी और चिकनी सड़क है। बिजली, थाना, अस्पताल, सिंचाई, खेल का मैदान, आईटीआई केंद्र, सबकुछ। जो कुछ भी दिख रहा है सबकुछ नीतीश कुमार के कारण ही है।’ नीतीश कुमार के घर के ठीक सामने जयेश कुमार का घर है। उनके पिता कभी नीतीश कुमार के पक्के साथी हुआ करते थे। उन्होंने कहा, ‘2012 में अपने गांव में उन्होंने सहज वसुधा केंद्र खोला था। इसका फीता काटने खुद नीतीश कुमार आए थे।’ जयेश कुमार ने बताया, ‘बात 2013 की है। मेरे पिता को कैंसर हो गया था। उस समय कैंसर के मरीजों को सरकार की तरफ से 50 हजार रुपए की मदद मिलती थी। हमलोग आवेदन दिए, लेकिन हमें दौड़ाया जा रहा था।’ उन्होंने कहा, ‘तब हम सीधा स्वास्थ्य विभाग के सचिव के पास चले गए। उन्हें बताया कि हम सीएम के गांव के हैं। इसके बाद भी परेशान किया जा रहा है। सेक्रेटरी ने अधिकारी को बुलाकर फटकार लगाई। इसके तुरंत बाद हमलोगों को पैसा मिल गया था। नहीं तो बहुत दौड़ाया जा रहा था।’


